बाबासाहेब डाक्टर भीमराव अम्बेडकर एक विचारधारा नहीं बल्कि नये भारत के शिल्पकार थे

बाबासाहेब डाक्टर भीमराव अम्बेडकर एक विचारधारा नहीं बल्कि नये भारत के शिल्पकार थे

डॉ. भीमराव आंबेडकर की 135वीं जयंती पर उन्हें याद करना केवल पुष्पांजलि नहीं, वैचारिक उत्तरदायित्व है। बाबासाहेब का सूत्र था’ शिक्षा से चेतना, चेतना से आंदोलन, आंदोलन से संगठन। उनका अंतिम लक्ष्य जाति का विनाश था, जाति का स्थायीकरण नहीं। 1936 में ‘Annihilation of Caste’ ( जाति का विनाश) में उन्होंने साफ लिखा कि जाति श्रम-विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है। समाधान बताया — अंतरजातीय विवाह, सहभोज और आर्थिक-सामाजिक लोकतंत्र। 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में उन्होंने चेतावनी दी थी कि 26 जनवरी 1950 से हम विरोधाभास में जीएंगे: राजनीति में एक व्यक्ति-एक वोट की समानता होगी, पर सामाजिक-आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी। यह विरोधाभास जितनी जल्दी खत्म हो, उतना अच्छा।

इस कसौटी पर देखें तो ‘Educate’   ( शिक्षा)के मोर्चे पर देश आगे बढ़ा है। 1951 में अनुसूचित जाति साक्षरता दर 10.3% थी, जो जनगणना 2011 में 66.1% हो गई। यूडीआईएसई 2021-22 के अनुसार एससी बच्चों का उच्च प्राथमिक स्तर पर नामांकन 94.8% है। बाबासाहेब की पहली जीत यहीं दिखती है। पर ‘Agitate’(आंदोलन )अब अदालतों और आरक्षण-रोस्टर तक सिमट गया है, और ‘Organise’ (संगठन)का अर्थ अक्सर चुनावी गठबंधन हो गया है। 1956 में बाबासाहेब ने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया बनाई थी — कैडर आधारित, विचार आधारित। आज आरपीआई के कई गुट हैं, और अधिकांश किसी न किसी सत्ता-गठजोड़ में शामिल हैं। बाबासाहेब ने बाईस प्रतिज्ञाएं दी थीं — अधिकार के साथ कर्तव्य की बात की थी। आज का सार्वजनिक विमर्श अक्सर अधिकार पर रुक जाता है, कर्तव्य पर मौन हो जाता है।

यह भी सच है कि आंबेडकर सबको चाहिए। केंद्र सरकार ने महू, लंदन, नागपुर, दिल्ली, मुंबई को ‘पंचतीर्थ’ घोषित किया। लगभग सभी दल ‘संविधान सम्मान’ की बात करते हैं। पर क्या बाबासाहेब केवल दलितों के नेता थे? वे श्रम मंत्री रहते ट्रेड यूनियन कानून लाए, महिला श्रमिकों के लिए मातृत्व लाभ तय किया, कोयला खदान में काम के घंटे आठ किए। रिजर्व बैंक की कल्पना हिल्टन यंग कमीशन में उनके शोध-पत्र से निकली। दामोदर वैली प्रोजेक्ट, हीराकुंड बांध, केंद्रीय जल-विद्युत आयोग — ये उनकी अर्थ-दृष्टि थी। संविधान में नीति-निदेशक तत्व, वित्त आयोग, निर्वाचन आयोग, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक जैसी संस्थाओं पर उनकी छाप है। उन्हें केवल ‘दलित आइकन’ के खांचे में बंद करना, उनके योगदान को सीमित करना है। आंबेडकरवाद से भारत का भला तभी होगा जब उसे पूरा पढ़ा जाए। उनका अर्थशास्त्र ‘राज्य समाजवाद’ था — आधारभूत उद्योग, बीमा, कृषि में राज्य की भूमिका। साथ ही वे ‘लिबर्टी, इक्वालिटी, फ्रेटरनिटी’ फ्रांस के क्रांति से सबक लेते हुए बुद्ध, कबीर, फुले से जोड़ते थे। यदि ‘जय भीम’ बोलकर ‘जय परिवार’ चलाया जाएगा, तो लाभ नहीं होगा। यदि ‘समता’ को ‘सब्सिडी’ से निकालकर ‘समता कोक्ष उद्यमिता’ से जोड़ा  जाए जाए, तो होगा।

अस्पृश्यता कानूनन 26 जनवरी 1950 को अनुच्छेद 17 से खत्म हुई। 1955 का अस्पृश्यता निवारण अधिनियम और 1989 का एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून बने।   2022 के अनुसार एससी/एसटी के खिलाफ 57,582 मामले दर्ज हुए। संख्या चिंता देती है, पर इसका एक अर्थ यह भी है कि रिपोर्टिंग बढ़ी है। गांव में मंदिर-प्रवेश, तालाब-पानी, सहभोज पर हालात पहले से बदले हैं। पर छुआछूत ने रूप बदला है। किराये पर कमरा देने से इनकार, मैट्रिमोनियल साइट पर ‘कास्ट नो बार’ लिखकर फोन पर सरनेम पूछना, नियुक्ति में उपनाम देखकर पूर्वाग्रह — यह ‘सोशल अनटचेबिलिटी (अस्पृश्यता’) है। यह मानसिकता की दरार है। इसे कानून पूरी तरह नहीं मिटा सकता। इसे शिक्षा, आर्थिक हिस्सेदारी और अंतरजातीय संवाद ही कम करेगा  यह वही रास्ता  है जो बाबासाहेब ने बताया है।

‘संविधान बचाओ’ नारा तब सार्थक है जब वह प्रस्तावना पढ़ने से आगे जाकर अनुच्छेद 21 की गरिमामय जीवन की गारंटी गांव तक पहुंचाए। यदि दलित छात्र की स्कॉलरशिप दो साल लटके, बैकलॉग पद दस साल खाली रहें, सफाई कर्मचारी सीवर में मर जाए, तो संविधान की भावना घायल होती है। ऐसे में नारा केवल रैली में गूंजे और फाइल में दब जाए, तो वह राजनीतिक रणनीति बनकर रह जाता है। बाबासाहेब ने कहा था कि संविधान कितना भी अच्छा हो, चलाने वाले बुरे हों तो बुरा साबित होगा ही।

यहां मनुस्मृति का संदर्भ समझना जरूरी है। मनुस्मृति की अपनी ऐतिहासिक महत्ता है। वह उस युग की रचना है जब राजधर्म, वर्ण-व्यवस्था और दंड-नीति राजसत्ता के आधार थे। प्राचीन भारत में स्मृतियां विधि-संहिताओं का काम करती थीं। राजा के लिए कर्तव्य, प्रजा के लिए आचार, अपराध के लिए दंड — मनुस्मृति ने अपने समय के समाज को एक ढांचा दिया। इसलिए इतिहास के विद्यार्थी के लिए उसका अध्ययन महत्वपूर्ण है। पर लोकतांत्रिक भारत का आधार संविधान है, जो ‘हम भारत के लोग’ से शुरू होता है और जन्म के बजाय नागरिकता, समानता और वैयक्तिक स्वतंत्रता को केंद्र में रखता है। अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता देता है, अनुच्छेद 15 जाति, धर्म, लिंग के आधार पर भेद रोकता है, अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को दंडनीय बनाता है। सुप्रीम कोर्ट कई निर्णयों में स्पष्ट कर चुका है कि संविधान ही सर्वोच्च विधि है। ऐसे में मनुस्मृति का आज की शासन-व्यवस्था में कोई वैधानिक स्थान नहीं है।

फिर भी चुनावों के समय मनुस्मृति का नाम बार-बार उछाला जाता है। उसके श्लोकों को कोट करके एक पक्ष को ‘मनुवादी’ और दूसरे को ‘आंबेडकरवादी’ घोषित करने की होड़ लगती है। सच यह है कि आम नागरिक की दैनिक जिंदगी में मनुस्मृति की धाराएं नहीं चलतीं, आईपीसी और सीआरपीसी चलती है। इसलिए जब मनुस्मृति को तूल दिया जाता है तो उसका उद्देश्य अक्सर सामाजिक सुधार कम, राजनीतिक ध्रुवीकरण और वोट समेटना अधिक होता है। बाबासाहेब ने 25 दिसंबर 1927 को महाड में मनुस्मृति जलाई थी। वह प्रतीक था — उस व्यवस्था का नकार जो जन्म से इंसान की हैसियत तय करती थी। पर वे वहीं नहीं रुके। हिंदू कोड बिल का मसौदा तैयार किया, श्रम कानून बनाए, रिजर्व बैंक की रूपरेखा दी। यानी नकार के बाद निर्माण किया। आज यदि कोई केवल मनुस्मृति को गाली देकर रुक जाए और विकल्प न दे, तो वह बाबासाहेब की राह नहीं, भीड़ की राह है।

इसलिए आंबेडकर को आगे रखना है तो मनुस्मृति से लड़ने की जगह संविधान को जीना होगा। आरक्षण को सीढ़ी रहने दो, छत मत बनाओ। क्रीमी लेयर, उप-वर्गीकरण, समयबद्ध समीक्षा पर ईमानदार बहस हो। बाबासाहेब ने खुद आरक्षण को सीमित अवधि के लिए माना था। दलित उद्यमिता को बढ़ाओ। स्टैंड-अप इंडिया, वेंचर कैपिटल फंड फॉर एससी, मुद्रा योजना को दलित बस्ती तक ले जाओ। चंद्रभान प्रसाद कहते हैं कि कैपिटल बनो, तभी कैपिटलिज्म से लड़ पाओगे। अंतरजातीय विवाह को कानूनी-आर्थिक सुरक्षा दो। डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन अंतरजातीय विवाह पर 2.5 लाख रुपये की सहायता देता है। यह सामाजिक न्याय का सबसे पक्का तरीका है। शिक्षा में गुणवत्ता लाओ। ‘जय भीम’ के साथ ‘जय विज्ञान’ बोलो। बाबासाहेब ने कहा था कि मुझे डिग्री का ढेर नहीं, डिग्रीधारी चाहिए जो समाज को रास्ता दिखाए।

आंबेडकर को समर्पित होने का मतलब है उनकी तरह पढ़ना, तर्क करना, निर्माण करना। उन्हें वोटबैंक बनाओगे तो मूर्ति की ऊंचाई बढ़ेगी, विचार की नहीं। मनुस्मृति को गाली दोगे तो तालियां मिलेंगी, बदलाव नहीं। संविधान की किताब लहराओगे तो फोटो अच्छी आएगी, पर अनुच्छेद 21 की गरिमामय जीवन सीवर साफ करने वाले के घर नहीं पहुंचेगी। बाबासाहेब का सामाजिक दर्शन बुद्ध के धम्म में समाया है — प्रज्ञा, करुणा, समता। चौदह अप्रैल को संकल्प लें कि हम उन्हें नारा से निकालकर न्याय में लाएंगे, जाति से निकालकर ज्ञान में लाएंगे, चुनाव से निकालकर चेतना में लाएंगे। क्योंकि आंबेडकरवाद दलित उत्थान का नहीं, देश उत्थान का नाम है। और देश उठेगा तो दलित स्वतः उठ जाएगा — यही बाबासाहेब का गणित था, यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। 
यह लेखक की अपनी राय है