राष्ट्रवाद के नाम पर कहाँ चला गया लोकतंत्र
नितिन सिन्हा (संपादक-खबरसार)
राष्ट्रवाद के नाम पर कहाँ चला गया लोकतंत्र*आइए समझे इस संकलित लेख से,,
आज जब देश की कथित लोकप्रिय हिन्दू वादी सरकार किसी भी असफल नीति के लिए विपक्ष के द्वारा घेरी जाती है,,तो सरकार और उसके नेता अपनी गलती को छुपा कर उसका दोष बड़ी चालाकी से नेहरू जी या पिछले सरकारों के नाम पर डाल लेते हैं.
जबकि संकलित लेख उस समय की आदर्श लोकतंत्र का उदाहरण पेश करता है,जिसे सामने रख कर आप आज की राजनीतिक
व्यवस्था से कर सकते हैं कि आज हम कहाँ पर खड़े हैँ???_
*नैतिकता : तब और अब*
तारीख 16 दिसंबर और साल था 1957. कांग्रेस सांसद फिरोज गांधी के अर्जेंट नोटिस पर लोकसभा स्पीकर ने उन्हें बोलने की इजाजत दे दी l फिरोज उठे और अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दियाl
फिरोज गांधी ने आरोप लगाया कि वित्त मंत्री के कहने पर एलआईसी ने बोगस शेयर खरीदे l इसके बदले कांग्रेस को 2.5 लाख रुपए का चंदा मिला l पंडित नेहरू इससे तिलमिला गए और जांच कराने की बात कही l उन्होंने मुंबई हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश एमसी छागला को जांच का जिम्मा सौंपा l
दरअसल उस दौर में कोलकाता के कारोबारी और शेयर बाजार के सटोरिए हरिदास मूंदड़ा की नॉन परफॉर्मिंग कंपनी के शेयर भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) ने 1 करोड़ 26 रुपये मे खरीद लिया। जांच हुई तो सामने आया कि हरिदास मूंदड़ा ने सरकारी तंत्र का इस्तेमाल करके एलआईसी को अपनी संदेहास्पद कंपनियों के शेयर्स ऊंचे दाम पर खरीदने पर मजबूर किया था और इसकी वजह से एलआईसी को नुकसान झेलना पड़ा था।
नेहरू जी ने इस घोटाले की सुनवाई जनता के सामने करवाई थी l भारत में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी केस की सुनवाई जनता के सामने हुई हो। सुनवाई के लिए कोर्ट रूम के बाहर बड़े-बड़े लाउडस्पीकर लगाये गए ताकि जो लोग अंदर बैठकर कार्यवाही देख न पाएं वे कम-से-कम इसे सुन सकें। बताते हैं कि बड़ी तादाद में लोग यह सुनवाई देखने और सुनने जुटते थे। जब जज साहब फटकार लगाते तो लोग जोर जोर से तालियां बजाते थे। छागला ने ओपन कोर्ट में 24 दिनों तक जांच की l इसमें तब के बेहद काबिल और नेहरू के पसंदीदा वित्त मंत्री टी टी कृष्णमचारी, वित्त सचिव और एलआईसी के चेयरमैन घेरे में आ गए l फरवरी 1958 में तीनों की कुर्सी चली गई और मूंदड़ा को 22 साल की सजा मिली थी l लेकिन उसी देश मे आज कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही l
"अभी तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री से जुड़ी घटना का उल्लेख बाकी है" क्रमशः





