मिनपा मुठभेड़ की चौथी बरसी पर विशेष

यादें जो भूलाई नही जातीं,,,

मिनपा मुठभेड़ की चौथी बरसी पर विशेष
मिनपा मुठभेड़ की चौथी बरसी पर विशेष

नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार)

आज ही के दिन हमने हमारे शहर के एक होनहार युवा जवान के साथ 17 अन्य वीरों को खोया था। इस मुठभेड़ में 17 पुलिस जवान शहीद हुए थे।

यह घटना दो वजहों से भूलाई नही जाती,पहली वजह तो इतनी बड़ी संख्या में जवानों की विभत्स हत्या थी,,,वहीं दूसरा कारण इस दुखद घटना की जानकारी होने के बावजूद,,शहर और देश भर में अधिकांश लोगों के द्वारा जनता कर्फ़्यू के समर्थन में खुश होकर पूरी बेशर्मी से थाली ताली और घंटिया बजाकर पटाखे फोड़ना था।। जब यह उत्सव मनाया जा रहा था,तब ठीक उसी वक्त शहीद जवानों के शव क्षत_विक्षत स्थिति में उनके परिजनो के पास पहुंच रहे थे।।

जिसमें हमारे शहर के शहीद युवा प्लाटून कमांडर गीता राम राठिया भी शामिल थे। देश के बाकी जगहों की तर्ज पर हमारे शहर के भी हजारों लोगों ने शहीद राठिया जी की शहादत और उनके परिजनों के गहरे दुःख से इतर होकर जनता कर्फ़्यू के समर्थन में दीपावली जैसा उत्सव मनाना ज्यादा जरूरी समझा था।। यह सब एक साथ देखना मुझ जैसे संवेदनशील व्यक्ति के लिए बेहद तकलीफ दायक था।

ख़ैर किसी तरह वो पूरा दिन भी गुजर गया था और बाकी नक्सल हमलों की तरह मीनपा शहादत की यह घटना और शहीदों के घर गूंजती चीत्कारें भी बीते कल की बात हो चुकी थी। जनता कर्फ़्यू के उत्सव में देश के ज्यादातर लोगों ने इतनी बड़ी घटना को भी गम्भीरता से बिल्कुल नही लिया था। एक तरफ 17 शहीदों की चिताएं जल रही थी,तो दूसरी तरफ उसी समय पूरे देश में थाली,ताली और फटाकों का शोर गूंज रहा था।।

यह सब देखकर 17 शहीदों की आत्माएं जरूर कह रही थी कि आखिर कब तक और क्यों..??.हम किन्हे मार रहे हैं और किनके हांथों शहीद हो रहे हैं.?? क्या कभी यह समस्या सुलझ पाएगी ? 

हालाकि इन सभी यक्ष प्रश्नों के का उत्तर आज तक किसी को नहीं मिल पाया है।।।

क्या,,ताड़मेटला,सुकमा, मिनपा,बिजापुर,दंतेवाड़ा जैसी बर्बर हत्या ही नक्सलवाद है ? मुझे लगता है,शायद नही,, बिल्कुल नही। विचारधाराओं की भिन्नता इतनी  हिंसक लड़ाई कैसे बन सकती है ?वो भी तब जब दूसरी तरफ भी देश के नागरिक ही खड़े हों,,हालाकि यह बात दोनो पक्षों पर बराबरी से लागू होती है..? फिर भी एक सवाल मन में उठता है,नक्सली अगर ऐसी हिंसा पर उतारू है,, तो उन्हे पालने पोषने के बजाए अब तक कि तमाम सरकारों ने निर्णायक लड़ाई के आदेश क्यों नही दिए..? 

इस हमले के दौरान नक्सल अभियान में पूरी तरह से असफल रहने वाली तत्कालीन 15 साल पुरानी भाजपा सरकार तो बदल गई थी,पर तबकी चुनी नई कांग्रेस सरकार के लगभग डेढ़ साल के कथित सु-शासन में भी नक्सल मोर्चों की व्यवस्था उन्ही असफल अधिकारियों के हांथ में क्यों बनी हुई थी,,जिन्होंने पहले भी कई बड़े नक्सल हमलों में भारी शर्मिदंगी उठाई थी.?

हालाकि इस बार लग रहा था कि भले ही पिछले किसी भी बड़े नक्सल हमले का जिम्मेदार कोई पुलिस अफसर या तत्कालीन गृहमंत्री नही ठहराया गया होगा,लेकिन इस बार बड़ा नक्सल रणनीति को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। क्युकी इस बार सत्ता में एक ऐसी पार्टी थी,जिसने 2013 दरभा नक्सल हमले में अपनी पार्टी के पूरी पहली पंक्ति(21 बड़े नेताओं)को ही खो दिया था।। 

लेकिन हर बार कि तरह फिर इस बार भी दिन,हफ्ते,महीने और साल बीत गए न ही किसी के खिलाफ कोई जांच बैठाई गई न ही किसी को जिम्मेदार ठहराया गया। न ही कोई बड़ा परिवर्तन ही किया गया। जबकि इस सरकार के सत्ता में रहते हुए भी वर्ष 2021 में टेकुलगुड़ेम,वर्ष 2022 में नारायणपुर,वर्ष 2023 में अरनपुर जैसा बड़ा नक्सल हमला हुआ। 

इन सब के बीच वर्ष 2022(मलकानगिरी,कोरापुट और जगदलपुर) की एक छोटी यात्रा में मैंने देखा कि तब भी हमारे जवान नक्सल मोर्चों(कैम्पों)बचाव की ही मुद्रा में तैनात थे और जानकारी के अनुसार नक्सली पहले की तरह ही आक्रामक बने हुए थे,अब वो लगातार पुलिस कैम्पों में देशी मोर्टार और देशी राकेट लांचर से हमले कर रहे थे। कुछ पुलिस कैम्पों के ऊपर तो उन्होंने ड्रोन तक उड़ाकर चौकाया था।

हां तीन दशकों की लड़ाई में कुछ नए स्थानों में पुलिस कैम्प जरूर खुले हुए दिखे । पर यह भी उतना ही बड़ा सच था कि जितना देश ने खोया है,,उसके मुकाबले हासिल की हुई यह सफलता वाकई बहुत छोटी है।

आज भी इन क्षेत्रों में रहने वाले सामान्य लोगों तक जिम्मेदार प्रशासन और क़ानून व्यवस्था के अलावा लोकतन्त्र पर भरोसा दिला पाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। 

सच कहूं तो समय के साथ देश प्रदेश में सरकारें जरूर बदलती रही है,,पर आम जनों के साथ पुलिस/जवानों के लिए हालात जस के तस ही बने रहे हैं।

"तमाम अनसुलझे सवालों के बीच वर्ष 22 मार्च 2020 "सुकमा, मीनपा के 17 शहीद जवानों को विनम्र श्रद्धांजलि"