ग्रामांचलों में स्वास्थ्य सुबिधा का आभाव

ग्रामांचलों में स्वास्थ्य सुबिधा का आभाव

इन दिनों ग्रामांचलों में हो रही ताबडतोड़ क्लिनिको कि सीलिंग से स्थानिये ग्रामीणों को काफी परेशानियों का सामना करना पड रहा है | ये गरीब ग्रामीण कम खर्चे में छोटीमोटी उपचार पा जाते थे जिसके लिए अब मोटी रकम खर्च करनी पड़ेगी |

यहाँ एक ब्लाक का उदाहरण दे कर अपनी बात रखना चाहूँगा | हम चलते है सुंदरगढ़ जिले के नुआगांव ब्लाक में इस ब्लाक में कुल २० पंचायते है ,इन २० पंचायतों कि इतनी बडी आबादी के बीच सिर्फ एक समुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हाथीबारी में है जहाँ आप को समय से ही चिकित्सक मिलेंगे ,और सोरडा,नुआगांव,लोआराम में प्राथमिक स्वस्थ्यकेंद्र है जिनमे सालो भर चिकित्सक लगभग नदारत ही रहते है | इन स्वास्थ्य केन्द्रों पर फार्मासिस्ट या अन्य कर्मचारी ही रोगियों को देखने का काम करते है,वे भी हमेशा उपलब्ध नहीं होते |

ऐसे में इन क्षेत्रों में क्लिनिक खोल कर स्वास्थ्य सेवा दे रहे लोग इन ग्रामीणों के लिए काफी सहायक सिद्ध होते है,रात-अँधेरे या आपातकालीन स्थिति में यही स्वस्थ्यकर्मी जिन्हें मिडिया ने झोला-छाप डाक्टर कि संज्ञा दे रखी है जरुरत मंद लोंगों को प्राथमिक उपचार दिया करते है ,कई बार मरीज़ के पास कम पैसे या पैसे ना होने पर भी इन्ही स्वास्थ्य कर्मियों कि वजह से उपचार मिल पाता है |

ऐसा नहीं है कि इन क्षेत्रों में केवल अप्रसिक्षित लोग चिकित्सा सेवाए दे रहे है कई पैरामेडिकल,शिक्षित चिकित्सक,अवकास प्राप्त.एन.एम्  भी अपनी सेवाए दे रहे है ,पर कुछ कम शिक्षित बंगालियों की वजह से सभी को शक कि निगाहों से देखा जा रहा है | 

इन दिनों लगभग हर घर में कोई न कोई सदस्य अस्वस्थ मिलेगा ऊपर से कोरोना का कहर ऐसे में बड़े अस्पतालों से भी जो मरीज़ चिकित्सा कराकर घर लौट रहे है उन्हें भी कई दिनों तक घर में इंजेक्शन,सलाईन,या मरहम पट्टी कि जरुरत पड रही है ,जिसे पूरा करने के लिए गाँव में क्लिनिक खोले स्वास्थ्य कर्मी सहायक और सस्ते साबित होते है |

ऊपर उल्लेखित प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में रक्त जाँच कि सुबिधा भी उपलब्ध नहीं है जिसे इन अंचलों में सेवाए दे रहे लैब तकनिशियन पूरा करते थे | वर्तमान समय में बुजुर्गों को मधुमेह और रक्तचाप जांच कि बराबर जरुरत पड़ती है ,विद्यार्थियों और अन्य कामों के लिए रक्त वर्ग परिक्षण ( Blood Groop ) जांच कि जरुरत पड़ती है, इनके क्लिनिक सील होने से अब लोंगों को ३५-५० किलोमीटर का सफ़र तय कर राउरकेला जाना होगा और इस ५० रुपये कि जांच के लिए २००-३०० रूपए अतिरिक्त खर्चने होंगे ,अगर किसी बच्चे का जाँच कराना हो तो दो लोंगो का दिन भर का समय भी बर्बाद होगा सो अलग  |

चिंता का विषय यह है कि एक लम्बे लॉक डाउन से लोंगों कि आर्थिक स्थिति ऐसे ही मंद पड़ी है ,सार्वजनिक यातायात व्यवस्था पूरी तरह से बंद पड़ी है ,मरीजों कि तादात के मुकाबले १०८ एम्बुलेंस संख्या कि कमी कि वजह से हर किसी को यह सुबिधा आवश्यकता पड़ने पर नहीं मिल पा रही है ऊपर से  इन क्षेत्रों पर निजी वाहनों कि भी बहुत कमी है | सामान्य दिनों में ये वाहन इन इलाकों से १०००-१५०० तक के किराये पर राउरकेला के अस्पतालों तक जाते थे जो लॉक डाउन कि वजह से दुगने किराये पर जाते है | वजह भी है क्योकि वापसी में सवारी मिलेगी नहीं और पुलिस जुर्माना ना कर दे इसका भी डर बना रहता है |

ऐसे में सामान्य बिमारियों के लिए यही क्लिनिक संचालक किराये से भी कम खर्च पर चिकित्सा सुबिधा मुहैया करते थे |जिससे कृषको का समय और पैसा दोनों बचता था |

स्वास्थ्य सुबिधा पाना हर नागरिक का मौलिक अधिकार भी है और जरुरत भी ऐसे में प्रशासन को इन ग्रामीणों को हो रही स्वास्थ्य  असुबिधाओं को किस तरह दूर किया जाए इसके प्रति ध्यान देने कि जरुरत है | 

इसका एक उपाय यह भी हो सकता है कि ग्रामांचलों में निजी क्लिनिक खोल कर सेवाये दे रहे इन स्वास्थ्य कर्मियों को ही और अधिक प्रशिक्षित कर इन्ही क्षेत्रो में स्वास्थ्य सेवाए देने कि अनुमति प्रदान कर दी जाये जिससे सरकारी चिकित्सकों कि कमी से जूझ रहे इन बीमार क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुबिधाये सुलभ किया जा सके | ऐसा होने पर ग्रामांचलों में स्वास्थ्य सुबिधाओं कि कमी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है और यह सम्भव भी है |