अत्याचार के अंत का नाम है विजयदशमी
विजयदशमी केवल एक तिथि नहीं है एक चेतना है यह उस शाश्वत सत्य का उत्सव है कि चाहे अंधकार कितना भी संगठित हो *कितना भी बलशाली* *विद्वान और सत्तासंपन्न हो* *अंततः पराजित होता है शरद नवरात्रि में नौ दिनों* *तक शक्ति की आराधना के बाद दसवें दिन विजय का उत्सव मनाया जाता है इसी दिन* *मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अत्याचार अन्याय पाप अहंकार और बल के घमंड में चूर लंकापति रावण का वध किया था।

रावण एक प्रवृत्ति है एक व्यक्ति नहीं
तुलसीदास जी ने लिखा है "रावण रथी विरथ रघुवीरा" रावण रथ पर था साधन संपन्न था और राम पैदल थे साधनहीन थे फिर भी विजय राम की हुई क्यों क्योंकि रावण के पास सब कुछ था पर धर्म नहीं था और राम के पास कुछ नहीं था पर धर्म था आज के संदर्भ में रावण को समझना आवश्यक है। लंकापति को दशानन कहा गया उसके दस सिर थे ये दस सिर केवल भौतिक सिर नहीं थे ये मनुष्य के भीतर व्याप्त दस कूबुद्धियों दस विकारों के प्रतीक हैं। राम ने एक रावण को नहीं मारा इन दस विकारों को मारा और इसलिए हर वर्ष हमें रावण जलाना पड़ता है क्योंकि ये विकार हर वर्ष हमारे भीतर जन्म लेते हैं।
दस सिरों में छिपे दस विकार
पहला सिर है काम अनियंत्रित वासना रावण विद्वान था शिवभक्त था, पर परस्त्री पर उसकी दृष्टि पड़ी, सीता जो जगत जननी हैं ,साक्षात लक्ष्मी हैं ।उन पर कुदृष्टि यह काम ही उसके विनाश का प्रथम बीज बना। आज समाज में भी हर शोषण इसी काम रूपी रावण का रूप है।
दूसरा सिर है क्रोध जिसने अपने ही भाई कुबेर की लंका छीन ली। जिसने ऋषियों की तपस्या भंग की। क्रोध में व्यक्ति विवेक खो देता है। रावण ने क्रोध में आकर सीता को अशोक वाटिका में बंद रखा, हनुमान की पूंछ में आग लगवाई ,उसी आग में उसकी सोने की लंका जल गई।
तीसरा सिर है लोभ तीनों लोकों को जीतने की इच्छा जो है उससे संतोष नहीं, लंका सोने की थी पर उसे देवताओं का स्वर्ग भी चाहिए था। आज का भ्रष्टाचा,र काला ,धन, जमीन हड़पना यही लोभ रूपी रावण है।
चौथा सिर है मोह अपने पुत्र अपने परिवार अपनी सत्ता से अंधा मोह रावण जानता था कि राम साक्षात नारायण हैं। मंदोदरी ने, माल्यवंत ने, विभीषण ने बार बार समझाया पर पुत्र मोह और सत्ता मोह में उसने किसी की नहीं सुनी।
पांचवा सिर है मद और अहंकार मैं ही ब्रह्मा हूँ। मैंने वेदों को जीत लिया है। अहंकार ही रावण का सबसे बड़ा सिर था ।वह जानता था कि उसकी मृत्यु मनुष्य और वानर से हो सकती है ,पर अहंकार में उसने मनुष्य और वानर को तुच्छ समझा।
छठा सिर है मत्सर यानी ईर्ष्या देवताओं की उन्नति से जलना ,ऋषियों के यज्ञ से चिढ़ना, दूसरों की खुशी बर्दाश्त न होना।
सातवां सिर है बल का घमंड कौन है राम एक वनवासी, तपस्वी, सत्ता सेना संपत्ति का घमंड, रावण के पास अतुल्य बल था ।शिव का दिया चंद्रहास खड्ग था ।ब्रह्मा का वरदान था, पर बल का घमंड ही उसे ले डूबा।
आठवां सिर है अन्याय रावण ने धर्म के सारे नियम तोड़े, वेदपाठी होकर भी अधर्म किया। ऋषियों से कर वसूलना, स्त्रियों का हरण करना, यही अन्याय है । गरीब की थाने में नहीं सुनी जाती तो वह अन्याय रूपी रावण ही जीवित है।
नौवां सिर है पाप जानबूझकर किया गया अधर्म, सीता हरण केवल अपराध नहीं महापाप था।
दसवां सिर है अत्याचार निर्बलों पर अत्याचार, रावण के राज में प्रजा दुखी थी। जेहि जेहि देश धेनु द्विज पावहि नगर गांव पुर आगि लगावहि।*
रामत्व से ही रावणत्व का वध संभव है ।
श्रीराम ने इन दसों का वध कैसे किया ।केवल बाण से नहीं अपने चरित्र से। राम कथा केवल युद्ध कथा नहीं, जीवन निर्माण की कथा है।

बाल लीला से नींव पड़ी
अयोध्या के राजमहल में जन्म लेकर भी ऋषियों के आश्रम में जाना ।विश्वामित्र के साथ ताड़का, सुबाहु, मारीच का वध ।बाल्यावस्था में ही राम ने सिखाया कि राजा का पुत्र भी समाज के लिए लड़ता है। आज के शासकों के पुत्र विदेशों में पढ़ते हैं राम वन में राक्षसों से लड़ रहे थे। यहीं से अत्याचार के विरुद्ध खड़े होने की शिक्षा शुरू होती है।
धनुष यज्ञ शक्ति और शील का संगम
जनकपुर में शिव धनुष बड़े बड़े राजा स्वयं रावण भी उसे हिला नहीं सका। रावण ने बल लगाया, अहंकार लगाया ।राम ने प्रणाम किया और धनुष को ऐसे उठाया जैसे फूल उठाया हो। सीख यह है कि शक्ति को *अहंकार से नहीं विनम्रता से जीता जाता है। आज राजनीति में जो शक्ति प्रदर्शन है वह रावणत्व है। जो शील से शक्ति को साधता है वह रामत्व है सीता ने राम को वरा क्योंकि सीता शांति है समृद्धि है वह उसी के पास जाती है जो विनम्र है।
वनगमन त्याग ही राजधर्म है
अयोध्या का राज्याभिषेक तैयार था उसी रात वनवास की आज्ञा ।कैकेयी ने वर मांगा ,दशरथ वचनबद्ध थे। राम चाहते तो विद्रोह कर सकते थे ।भरत चाहते तो सेना ले सकते थे, पर राम ने पिता के वचन के लिए चौदह वर्ष का वन स्वीकार किया यह है भारतीय राजधर्म। सत्ता का त्याग आज जहां एक कुर्सी एक पद एक टिकट के लिए भाई भाई का गला काट रहा है वहां राम ने हंसते हंसते राजपाट छोड़ दिया। रावण ने दूसरे का राज छीना राम ने अपना राज छोड़ दिया यही दो संस्कृतियों का अंतर है।
सीताहरण नारी अपमान ही विनाश का कारण
पंचवटी में शूर्पणखा प्रसंग और फिर मारीच का मायामृग बनना। सीता ने सोने के मृग की इच्छा की, यह मानवीय दुर्बलता है। रावण ने साधु का वेश धारण किया आज भी पाप साधु के वेश में ही आता है। सीता हरण हुआ यह केवल एक स्त्री का हरण नहीं था। यह भारतीय संस्कृति पर प्रहार था ।रावण ने सोचा वह देह को हर (अपहरण )रहा है ।पर वह तो छाया को हर रहा था ।असली सीता तो अग्नि में पहले ही प्रवेश कर चुकी थीं। संदेश स्पष्ट है नारी का अपमान करने वाली सभ्यता कितनी भी शक्तिशाली हो उसका विनाश निश्चित है।
रावण मरण अधर्म का अंत
इसके बाद राम ने वानरों आदिवासियों वनवासियों की सेना बनाई। निषादराज गुह ,शबरी, जटायु, सुग्रीव ,हनुमान ,जामवंत ये कोई राजा नहीं थे। ये समाज के अंतिम छोर पर खड़े लोग थे ।राम ने अभिजात्य वर्ग की नहीं वंचित वर्ग की सेना बनाई ।लंका पर आक्रमण से पहले राम ने समुद्र से तीन दिन तक प्रार्थना की ।यह है मर्यादा शक्ति होने पर भी विनय जब समुद्र नहीं माना तब बाण उठायाऔर फिर युद्ध सत्तासी दिनों तक चला। रावण के एक एक सिर कटते थे, फिर उग आते थे, क्योंकि कुबुद्धि एक बार में नहीं मरती काम को मारो तो क्रोध उग आता है ।क्रोध को मारो तो लोभ उग आता है। अंत में राम ने नाभि में बाण मारा नाभि अहंकार का केंद्र है अहंकार मरा तो रावण मरा।
आज के समय में विजयदशमी का अर्थ
विजयदशमी हमें यही सिखाती है कि हर व्यक्ति को अपने भीतर के रावण को मारना है ।बाहर का पुतला तो हम हर साल जला देते हैं। पर भीतर का रावण हमारी वासना हमारा क्रोध हमारा भ्रष्टाचार हमारी जाति का अहंकार हमारे पद का घमंड वह जिंदा रहता है।
श्रीराम ने रावण को मारकर विभीषण को राज दिया लंका की संपत्ति नहीं लूटी यह है विजय का आदर्श विजय बदला नहीं परिवर्तन है।आज जब देश में अत्याचार अन्याय पाप अहंकार और बल के घमंड की घटनाएं दिखती हैं। चाहे वह किसी भी रूप में हों, किसी गरीब पर अत्याचार हो ,किसी बेटी के साथ अन्याय हो, सत्ता का अहंकार हो ,धन बल का घमंड हो, तो समझिए रावण अभी मरा नहीं है।इसलिए विजयदशमी पर केवल मेले में जाकर रावण दहन देखना पर्याप्त नहीं । संकल्प लीजिए कि मैं अपने भीतर के एक रावण को चाहे वह क्रोध हो लोभ हो या अहंकार आज मारूंगा यही सच्ची विजयदशमी होगी।राम राज्य कोई स्वर्ग से नहीं उतरेगा वह हमारे राम बनने से आएगा रावण को गाली देना आसान है राम बनना कठिन है।।
"धर्मेन्द्र सिंह (प्रदेश प्रभारी- सारांश दैनिक) की अपनी व्याख्या"





