बारूद में खाक होता पुतला पर समाज के सीने में जिंदा है रावण

बारूद में खाक होता पुतला पर समाज के सीने में जिंदा है रावण

भारत वर्ष के कई मैदानों में हर साल की तरह इस साल भी हुआ असत्य पर सत्य की जीत का शंखनाद; मगर भ्रष्टाचार, महिला अपराध, महिलाओं द्वारा महिलाओं को मिली कानूनी अधिकार की आड़ में किया जाने वाला अपराध और साइबर ठगी के सुलगते सवालों के बीच टटोलना होगा अपना ही जमीर। 

आज विजयादशमी के महापर्व पर आस्था, परंपरा और उल्लास के एक अनूठे संगम की साक्षी बने है देश के कई मैदान । इन मौदानो में रावण दहन की तमाम प्रशासनिक व सामाजिक तैयारियों के बीचपूरी पूरी हुई रावण दहन करने की परंपरा। सभी लोगों ने ऊंचे पुतले के चिथड़े उड़ते देखे और हर कोई एक-दूसरे को 'असत्य पर सत्य की विजय' की बधाइयां दी।

परंतु, इस पूरे जलसे और बारूदी धुएं के बीच एक अत्यंत चुभता, निष्पक्ष और बेचैन कर देने वाला सवाल हर संवेदनशील नागरिक के जेहन में कौंध रहा है। जिस रावण को हम हर साल करोड़ों रुपये के पटाखे लगाकर जलाते हैं, वह तो त्रेतायुग में ही भगवान श्रीराम के बाणों से मोक्ष पा चुका था। फिर आज हम किसे जला रहे हैं? और उससे भी बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि जो लाखों लोग उस पुतले का दहन देखने तालियां पीटते खड़े रहते हैं, क्या वे अपने भीतर के दुर्गुणों, लालच और वासना को मारकर वहां पहुंचे हैं? या फिर यह सिर्फ एक रस्म अदायगी है, जहां बाहर का पुतला जलकर राख हो जाता है और हमारे भीतर का रावण मंद-मंद मुस्कुराते हुए सुरक्षित घर लौट आता है?

रावण दहन कोई आधुनिक तमाशा नहीं, बल्कि यह सनातन संस्कृति के उस सर्वोच्च नैतिक दर्शन की याद दिलाता है जहां अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित माना गया है। रामायण के पन्नों को निष्पक्षता से पलटें, तो लंकापति रावण कोई मामूली सत्ताधीश नहीं था। वह चारों वेदों का ज्ञाता, शास्त्रों का मर्मज्ञ, महान शिव तांडव स्तोत्र का रचयिता और त्रिकालदर्शी महाविद्वान था। उसकी लंका सोने की थी और उसकी शक्ति के आगे दिशाएं कांपती थीं। मगर ऐसे महापराक्रमी और ज्ञानी का समूल विनाश क्यों हुआ?

वजह थी— मर्यादा का उल्लंघन, परस्त्री के प्रति दूषित वासना और अपनी सत्ता का असीमित अहंकार। जब रावण ने माता सीता का छल से हरण किया, तब उसने एक अक्षम्य पाप को जन्म दिया। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई किसी जमीन के टुकड़े या स्वर्ण सिंहासन को हथियाने के लिए नहीं की थी। वह युद्ध धर्म की पुनर्स्थापना और मानवता की मर्यादा की रक्षा का महासंग्राम था। प्रभु श्रीराम ने रावण को पश्चाताप के कई मौके दिए, लेकिन जब बुद्धि पर अहंकार का पर्दा पड़ जाता है तो विनाश ही एकमात्र मार्ग बचता है। अंततः दशमी के दिन श्रीराम ने रावण की नाभि में अमृत कुंड को सुखाते हुए अपने दिव्य बाण का संधान किया और अधर्म का वह विशालकाय स्तम्भ धराशायी हो गया। उसी दिन से समाज को यह अमर संदेश देने के लिए रावण दहन की परंपरा शुरू हुई कि पद, प्रतिष्ठा, ज्ञान और दौलत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अगर चरित्र भ्रष्ट हो गया तो अंत सर्वनाश ही होगा।

यह एक नग्न और कड़वा सच है कि आज का समाज एक भयानक पाखंड के साए में जी रहा है। हम साल के 364 दिन समाज में अनीति, झूठ, बेईमानी और शोषण का तांडव देखते हैं, कई बार खुद उसका हिस्सा बनते हैं, और विजयादशमी के दिन एक बेजान बांस और कागज़ के ढांचे को जलता देखकर यह मुगालता पाल लेते हैं कि हमने बुराई को समाप्त कर दिया। अगर पुतले को जलाने से बुराई खत्म हो जाती, तो इस देश में हर साल अपराधों का ग्राफ क्यों बढ़ रहा है? आखिर यह कौन सी मानसिकता है जो मैदान में रावण के जलने पर सीटी बजाती है, लेकिन सड़क पर उतरते ही खुद किसी दुर्दांत रावण की तरह व्यवहार करने लगती है?

यह सवाल कलेजे को चीर देता है कि जिस देश में अभी कल तक नवरात्र की नवमी पर कन्याओं के पैर धोकर उन्हें जगदम्बा मानकर पूजा गया, उसी देश में महिलाओं और मासूम बच्चियों की चीखें क्यों नहीं थम रहीं? क्या हम भूल गए कि रावण ने माता सीता का हरण तो किया था, मगर अशोक वाटिका में उन्हें बिना उनकी मर्जी के स्पर्श तक नहीं किया था। आज के वहशी दरिंदों ने तो उस रावण की मर्यादाओं को भी पाताल में धकेल दिया है।

अस्पतालों से लेकर स्कूलों तक, सुनसान गलियों से लेकर घरों की चहारदीवारी तक— मासूम बच्चियों और युवतियों के साथ होने वाली दरिंदगी, बलात्कार, एसिड अटैक और हत्या की घटनाएं बताती हैं कि समाज में हवस का रावण कितने खुलेआम तांडव कर रहा है। वे दरिंदे भी तो हमारे ही समाज का हिस्सा हैं, वे भी आज नए कपड़े पहनकर रावण दहन देखने खड़े होंगे। क्या उनके अंदर का रावण मरा? जब तक इस देश की बेटी आधी रात को बिना किसी डर के, बेखौफ होकर सड़क पर सिर उठाकर नहीं चल सकती, तब तक किसी भी मैदान में रावण का पुतला जलाना सिर्फ और सिर्फ एक खोखला ढोंग है।

अधर्म केवल देह की हिंसा में नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक सड़न में भी है जो एक आम आदमी की हड्डियों तक को निचोड़ रही है। हम किसी विभाग या किसी निष्ठावान अधिकारी पर व्यक्तिगत लांछन नहीं लगाते, लेकिन यह व्यवस्था की वह नंगी हकीकत है जिसे हर नागरिक रोज झेलता है। एक अदद राशन कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, जमीन का नामांतरण या किसी योजना का लाभ लेने के लिए आम आदमी को दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते चप्पलें घिसनी पड़ती हैं।

सवाल यह है कि अगर तंत्र इतना ही पारदर्शी और ईमानदार है, तो हर सरकारी दफ्तर के इर्द-गिर्द बिचौलियों और एजेंटों की समानांतर दुकान क्यों सजती है? क्यों एक गरीब, बेसहारा और अनपढ़ नागरिक सीधे टेबल तक पहुंचने से डरता है और एजेंट का सहारा लेने को मजबूर होता है? किसी जरूरतमंद की लाचारी पर अपनी जेबें भरने वाले, फाइलों को दबाकर रिश्वत की सौदेबाजी करने वाले क्या किसी रावण से कम हैं? टेबल के नीचे से जाने वाला वह हर नोट किसी गरीब के बच्चों की भूख और उसके हक का खून है। व्यवस्था में कुंडली मारकर बैठा यह लालच का रावण देश की जड़ों को दीमक की तरह चाट रहा है।

न्याय व्यवस्था समाज की अंतिम उम्मीद होती है, जहां एक पीड़ित इंसाफ की आस लेकर पहुंचता है। मगर आज के दौर में रंजिश, ब्लैकमेलिंग और अवैध वसूली के लिए थानों में झूठे मुकदमे दर्ज कराने की प्रवृत्ति एक गंभीर कैंसर बन चुकी है। किसी शरीफ इंसान को फर्जी केस में फंसाकर उसका जीवन, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और उसके पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया जाता है।

कानून की किताबों में, चाहे वह पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता की धारा 182 या 211 रही हो, या वर्तमान में लागू भारतीय न्याय संहिता (BNS) के कड़े प्रावधान— पुलिस और लोकसेवक को गुमराह कर झूठी शिकायत दर्ज कराने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई का स्पष्ट अधिकार मौजूद है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन धाराओं का इस्तेमाल न के बराबर होता है। पुलिस महकमा झूठे षड्यंत्रकारियों पर तत्काल नकेल कसने से आखिर क्यों कतराता है? जब किसी बेकसूर की चीखें थानों की दीवारों से टकराकर लौट जाती हैं और पैसे या रसूख के बल पर सच को दबा दिया जाता है, तब खाकी की मर्यादा पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। क्या वहां भी किसी के भीतर का रावण सच का गला घोंट रहा है। 

समय के साथ अपराध के हथियार बदल गए हैं। त्रेतायुग में रावण ने छल के लिए सोने के हिरण का रूप धरा था, आज का अपराधी मोबाइल स्क्रीन और इंटरनेट के अदृश्य जाले के पीछे छिपकर वही मायावी खेल खेल रहा है। आज साइबर फ्रॉड देश का सबसे घातक और खूनी हथियार बन चुका है। खून-पसीने से सींची गई जिंदगी भर की कमाई, बुजुर्गों की पेंशन, और बेटियों की शादी के लिए जमा एक-एक रुपया मोबाइल पर आए एक लिंक, एक फर्जी कॉल या एक डिजिटल अरेस्ट की धमकी से सेकंडों में गायब हो जाता है।

लोग अवसाद में आकर आत्महत्याएं कर रहे हैं। न चोरी रुकी, न डकैती थमी, न कत्ल के सिलसिले बंद हुए, और अब साइबर अपराध ने घर बैठे लोगों की जिंदगी तबाह करना शुरू कर दिया है। यह कौन सा रावण है? यह वह अदृश्य और निर्दयी रावण है जो बिना कोई अस्त्र उठाए, सिर्फ अपनी मक्कारी से हंसते-खेलते परिवारों को सड़क पर ला खड़ा करता है। समाज में पसरा यह अंधी कमाई का लालच इस बात का सबूत है कि नैतिकता पूरी तरह वेंटिलेटर पर चली गई है।

आज शाम जब रायगढ़ का आकाश नटवर स्कूल, रामलीला मैदान और मिनी स्टेडियम में उठने वाली लपटों से लाल हो जाएगा, पटाखों का शोर कान के पर्दों को फाड़ देगा और चंद मिनटों में रावण का भीमकाय ढांचा जलकर मिट्टी में मिल जाएगा, तब तालियां बजाकर अपने घरों को लौटने से पहले एक पल के लिए ठहरिएगा।

उस राख के ढेर की तरफ देखकर खुद से यह सवाल जरूर पूछिएगा कि क्या कल सुबह इस शहर की सड़कें महिलाओं के लिए महफूज होंगी? क्या कल सरकारी दफ्तरों से दलाल गायब हो जाएंगे? क्या कल किसी गरीब का हक छीनना बंद हो जाएगा? क्या साइबर ठग अपनी उंगलियों को रोक लेंगे? अगर जवाब 'ना' है, तो समझ लीजिए कि हमने आज सिर्फ बांस और कागज का एक पुतला जलाया है, असली रावण तो हमारे आसपास, हमारे समाज में और कई बार हमारे अपने ही सीने के भीतर अट्टहास कर रहा है।

दशहरा सिर्फ एक रस्म नहीं, आत्मशुद्धि का महासंकल्प है। रावण को मैदानों में नहीं, अपने भीतर के अहंकार, लोभ, वासना और भ्रष्टाचार की नाभि में मारिए। जिस दिन समाज का हर नागरिक किसी पराई स्त्री के सम्मान की रक्षा को अपना धर्म मान लेगा, जिस दिन एक अधिकारी बिना घूस के फाइल को मुस्कुराकर आगे बढ़ा देगा, और जिस दिन हम दूसरों के हक पर डाका डालना बंद कर देंगे— यकीन मानिए, उसी दिन इस देश में भगवान श्रीराम का सच्चा राज आएगा और विजयादशमी का पर्व अपनी वास्तविक सार्थकता को हासिल करेगा।