सिविल विवाद में पुलिस हस्तक्षेप और झूठे मुकदमों की चुनौती
कानून की ताकत तभी सार्थक है, जब उसका इस्तेमाल निष्पक्षता, प्रमाण और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर हो।
कानून की रक्षा के लिए बनी व्यवस्था जब कानून की सीमाओं को लांघने लगे, तो सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक के विश्वास को होता है। भारत में सिविल और आपराधिक मामलों के लिए अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं निर्धारित हैं। संपत्ति, लेन-देन, अनुबंध, पारिवारिक या अन्य निजी विवादों का समाधान सामान्यतः सक्षम सिविल न्यायालय के माध्यम से किया जाना चाहिए। वहीं, अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस की भूमिका जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई करने की होती है।
समस्या तब पैदा होती है, जब किसी सिविल विवाद को दबाव बनाने के लिए पुलिस कार्रवाई का माध्यम बना दिया जाता है। जमीन, मकान, पैसों के लेन-देन या पारिवारिक विवाद में किसी एक पक्ष द्वारा पुलिस में शिकायत किए जाने के बाद दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने की कोशिशें कई बार सामने आती हैं। ऐसी परिस्थितियों में पुलिस को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह किसी पक्ष के निजी विवाद का निर्णायक न बन जाए। हालांकि, यह भी समझना जरूरी है कि सिर्फ किसी विवाद के सिविल स्वरूप का होना पुलिस की भूमिका को हर स्थिति में समाप्त नहीं करता। यदि उसी विवाद में धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक विश्वासघात, धमकी, मारपीट या कोई अन्य संज्ञेय अपराध होने का आरोप और उसके समर्थन में प्रथमदृष्टया आधार मौजूद हो, तो कानून के अनुसार पुलिस जांच कर सकती है। इसलिए प्रत्येक मामले में तथ्य और आरोपों की प्रकृति महत्वपूर्ण है।
चिंता का दूसरा पहलू झूठे या दुर्भावनापूर्ण आपराधिक मुकदमों का आरोप है। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति के विरुद्ध जानबूझकर गलत सूचना देकर मामला दर्ज कराया जाता है अथवा जांच के दौरान पुलिस निष्पक्षता छोड़ देती है, तो उसका असर केवल संबंधित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। गिरफ्तारी का भय, बार-बार थाने के चक्कर, सामाजिक बदनामी और आर्थिक नुकसान परिवार को भी प्रभावित कर सकते हैं। पुलिस के पास कानून लागू करने की शक्ति है, लेकिन शक्ति के साथ जवाबदेही भी अनिवार्य है। किसी शिकायत को मात्र इसलिए सही नहीं मान लिया जाना चाहिए कि वह पुलिस के पास पहुंच गई है। शिकायत की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य और दोनों पक्षों के तथ्यों को कानून के अनुरूप जांचना आवश्यक है।
इसी तरह नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि पुलिस और न्यायिक व्यवस्था का इस्तेमाल निजी दुश्मनी निकालने या दबाव बनाने के साधन के रूप में न करें। झूठी शिकायत किसी दूसरे व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने के साथ-साथ प्रशासनिक और न्यायिक संसाधनों पर भी अनावश्यक बोझ डालती है। जरूरत इस बात की है कि सिविल विवादों को उचित न्यायिक मंच पर और आपराधिक आरोपों को निष्पक्ष पुलिस जांच के माध्यम से देखा जाए। पुलिस को न तो वास्तविक अपराध की अनदेखी करनी चाहिए और न ही निजी विवादों में किसी पक्ष का दबाव-उपकरण बनना चाहिए। लोकतंत्र में पुलिस और न्यायपालिका की विश्वसनीयता केवल अपराधियों को सजा दिलाने से नहीं, बल्कि निर्दोष नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने से भी मजबूत होती है। कानून का असली अर्थ यही है कि शिकायतकर्ता को न्याय मिले, आरोपी को निष्पक्ष प्रक्रिया मिले और किसी भी व्यक्ति के साथ केवल आरोप के आधार पर अन्याय न हो।
कानून की ताकत तभी सार्थक है, जब उसका इस्तेमाल निष्पक्षता, प्रमाण और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर हो।





