रोजो पर्व को मिली राज्य सरकार की मान्यता
रामप्रवेश चौधरी (संपादक)
ओड़िशा में खास महत्व रखने वाला रोजो पर्व को ओडिशा सरकार ने कला-संस्कृति त्योहार के रूप में मनाने का लिया निर्णय लिया है।
ओडिशा सरकार द्वारा राज्य के सभी प्रखंडो़ (ब्लाक) में रोजो त्यौहार को कला-संस्कृति त्योहार के रूप में पालन करने के लिए इस वर्ष से मान्यता दी गई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बुधवार आज बुधवार के दिन रोजो उत्सव के अवसर पर सभी ओडिशा वासियों को अपनी शुभकामनाएं दीं। महामहिम राष्ट्रपति ने ट्वीटर के माध्यम से ओडिशा वासियों को यह बधाई संदेश ओड़िया भाषा में लिखकर दिया है। जो भारतवर्ष के इतिहास में पहली बार हुआ है कि राष्ट्रपति ओडिशा वासियो को ओड़िया भाषा में लिखकर बधाई संदेश दिया हो। रोजो पर्व सुंदरगढ़ जिला के राजगांगपुर प्रखंड़ क्षेत्र में एवं समस्त जिले में धूमधाम से मनाई जा रही है।
रोजो पर्व को इस वर्ष से राज्य सरकार के द्वारा ओडिशा की कला व संस्कृति त्योहार के रूप में मान्यता प्राप्त हुई है जिसको लेकर राजगांगपुर प्रखंड़ विकास अधिकारी पीयूष लोहार के नेतृत्व में आज प्रखंड़ कार्यालय परिसर में कला प्रदर्शन करते हुए एक सभा का आयोजन किया गया। रोजो त्यौहार पर सरकार द्वारा ली गई इस निर्णय का स्वागत करते हुए प्रखंड़ विकास अधिकारी पीयूष लोहार ने उपस्थित महिलाओं को बताया कि इसे कला संस्कृति के रूप में सरकार द्वारा मान्यता दी गई है और उपस्थित प्रखंड़ अध्यक्ष महोदया ने भी उपस्थित महिलाओं के साथ इस पर चर्चा करते हुए अपने कला संस्कृति को हर संभव बचाए रखने की बात दोहराई ।
इस खुशी के अवसर को राजगांगपुर प्रखंड़ कार्यालय परिसर में स्थानीय लोगों द्वारा नृत्य संगीत के माध्यम से प्रदर्शित किया गया।
आपको बता दें कि रोजो पर्व आस्था और विश्वास का पर्व है। मान्यता है कि इसी दिन धरती माता रजोस्वला होती है। ज्येष्ठ महीना का अंतिम दिन मासांत आषाढ़ का प्रथम दिन संक्राती होता है। इसलिए ओडिशा में विशेष रुप से इस रोजो पर्व को मासांत पर्व भी कहा जाता है। यह पर्व प्रति वर्ष अंग्रेजी माह के जून महीने में 14-15 तारीख को मनाई जाती है।।किसानो के बीच इस पर्व का खास महत्व है। दो दिन तक कृषक अपने कृषि उपकरणों को व्यवहार में नहीं लाकर उसकी पूजा करते हैं। मासांत और संक्रांती दो दिनो तक धरती पर किसी भी तरह से मिट्टी काटने, हल चलाने पर संपूर्ण रूप से वर्जित होता है।
दो दिन महिलाएं किसी फल को नहीं काटती। बच्चे दिन भर झूला का आनंद लेते है,किशोरी बालिकाएं झूलने के साथ रोजो गीत गाती है। गांव के आसपास जहां भी झूला लगा रहता हैं किशोरी बालिकाएं अपने दल बनाकर वहां पहुंचती है।झूले और गीतो का प्रतिस्पर्धा चलता है जिसमें एक दूसरे दल को परास्त करने का प्रयास करते हैं। इस मौके पर किशोरी बालिकाएं दूसरे दल के गीत का जवाब देने के लिए तुरंत गीत तैयार कर गाती है। जिसे सुनने पर एक अलग ही आनंद का अनुभव होता है। रोजो के बाद किसान खेती-बाड़ी, गोड़ाई,बोआई का काम 15 दिन तक करते है। जिसे बोया हुआ बीज तुरंत अंकुर कर पौधा का रूप लेता है। इस पर्व को झारखंड उड़ीसा बंगाल में मुख्य तौर से मनाया जाता है इ स पर्व के दौरान सभी लोग नए कपड़े पहनने का आनंद लेते हैं। घरों में विभिन्न प्रकार के पकवान, मिठाइयां बनाई जाती है मिठाइयों का आदान-प्रदान पड़ोसी मित्रों व परिवार के लोगों के बीच होता है।बच्चों में काफी उत्साह देखा जाता है नए कपड़े ,झूले, मिठाइयां, बच्चों को आनंदित कर देते हैं। ओडिशा में इसे दूरदर्शन पर भी रोजो गीत के प्रतिस्पर्धा व विभिन्न प्रकार के आयोजन देखे जा सकते हैं।उड़ीसा में कई संगठनो द्वारा रोजो क्विन प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है जिसमें विजेता किशोरी को चयनकर्ताओं द्वारा रोजो क्विन पुरस्कार से सम्मानित किया जाता।





