जवानों की आत्महत्या पर कब बात करेगा देश

जवानों की आत्महत्या पर कब बात करेगा देश

नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार) 

विडंबना देखिए स्वयंभू देशभक्तों से भरे हमारे देश भारत में पिछले एक दशक से सिर्फ "धर्म पर राजनीति या धर्म की राजनीति पर ही चर्चाएं  होती रही है।।" इसके अलावा महंगाई,बेरोजगारी,चुनावों में धांधलियों सहित कानून व्यवस्था को लेकर कई विषयों पर आंदोलन किए गए।

परंतु इस बीते एक दशक में तकरीबन 1400 जवानों की आत्महत्याओं पर कभी कोई बात करने को तैयार नही हुआ।। फिर भी हम अपने आप को देशभक्त कहते नही थकते हैं।।

क्योंकि मुझे अब निजी अनुभव के आधार पर ऐसा लगने लगा है,कि देश के ज्यादातर आम नागरिकों के पास अपनी जरूरतों की पूर्ति से ऊपर सोचने समझने की इच्छा नही रही है। वहीं सेना अर्धसेना और पुलिस के अफसरों और जवानों के साथ_साथ देश प्रदेश की सरकारो को भी हर साल विभिन्न कारणों से 120/140 के बीच आत्महत्या करने वाले जवानों के जान की चिंता नहीं  है। तभी तो इस गंभीर समस्या के लिए कभी कोई प्रदर्शन या आंदोलन नही किया गया। कभी कहीं सड़के बंद नही की गई,न ही कभी संसद या विधानसभा का घेराव हुआ।।

तभी तो जवानों की आत्महत्याओं की घटना के आंकड़े समय के साथ क्रमश: बढ़ते गए। हमारे पास इस राष्ट्रीय समस्या पर बात करने का समय नहीं है,और सरकार के पास इन घटनाओं को रोकने की नीति बनाने की नियत नही है।। सत्ता में बैठे लोगों को इस बात की अच्छी जानकारी है,कि देश में बेरोजगारी का ऐसा आलम है कि हर साल 100/150 जवान मर भी जाते है,तो भी उनकी जगह नई भर्तियों में शामिल होने के लिए हजारों की संख्या में युवा पुनः मैदान में आ खड़े हो जाएंगे।