काम की कमी या काम से दूरी:बदलते समाज का गंभीर सवाल

काम की कमी या काम से दूरी:बदलते समाज का गंभीर सवाल

“आवश्यकता आविष्कार की जननी है”—यह पुरानी कहावत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। आवश्यकता ने मनुष्य को कठिन परिस्थितियों में रास्ते खोजने, नए साधन विकसित करने और जीवन को आसान बनाने के लिए प्रेरित किया है। लेकिन आज हमारे सामने एक अलग तरह की आवश्यकता खड़ी है—काम है, कामगार नहीं। देश की आबादी लगातार बढ़ रही है, बेरोजगारी पर बहस होती है और रोजगार के अवसर पैदा करने की मांग उठती है। इसके बावजूद खेती, घरेलू काम, होटल-रेस्त्रां, निर्माण, छोटे उद्योग, परिवहन और अनेक सेवा क्षेत्रों में कामगारों की कमी की शिकायत लगातार सुनाई देती है। यह विरोधाभास केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि हमारे बदलते सामाजिक और श्रम-संस्कृति का भी संकेत है।

कई ग्रामीण क्षेत्रों में खेत उपलब्ध हैं, जमीन है, पानी और कृषि की संभावनाएं हैं, लेकिन पर्याप्त श्रमिक नहीं मिलते। परिणाम यह है कि कुछ जगहों पर कृषि भूमि का पूरा उपयोग नहीं हो पाता। दूसरी ओर होटल और रेस्त्रां संचालक कर्मचारियों की कमी से जूझते हैं। छोटे उद्योगों को उत्पादन प्रभावित होने की चिंता रहती है और कई व्यवसायों को काम के लिए दूसरे क्षेत्रों से श्रमिक बुलाने पड़ते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके लिए केवल कामगारों को दोषी ठहराना उचित होगा? निश्चित रूप से समाज में ऐसे लोग हैं जो उपलब्ध काम को अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं मानते या नियमित मेहनत करने से बचते हैं। आसान आय की मानसिकता भी कुछ लोगों में बढ़ी है।

कामगार और काम के बीच बढ़ती दूरी के पीछे कई कारण हैं—मजदूरी कितनी है, काम कितने घंटे का है, रहने की सुविधा कैसी है, सामाजिक सम्मान कितना मिलता है, नौकरी कितनी सुरक्षित है और मेहनत के बदले मिलने वाली आय उस मेहनत के अनुपात में है या नहीं। एक मजदूर यदि शहर में दिनभर मेहनत करने के बाद भी परिवार का खर्च ठीक से नहीं चला पाता, तो वह बेहतर विकल्प की तलाश करेगा। इसी तरह युवा पीढ़ी भी केवल कोई काम करने के बजाय ऐसा रोजगार चाहती है जिसमें भविष्य की संभावना, नियमित आय और सामाजिक सम्मान हो। यह बदलाव स्वाभाविक भी है। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब काम को छोटा और बेरोजगारी को बड़ा समझने की मानसिकता पैदा हो जाती है। खेती करना, खाना बनाना, सफाई करना, मशीन चलाना, निर्माण कार्य करना या किसी रेस्त्रां में सेवा देना—ये सभी समाज की अर्थव्यवस्था को चलाने वाले महत्वपूर्ण काम हैं। किसी काम की सामाजिक प्रतिष्ठा कम करके हम उस काम की आवश्यकता को समाप्त नहीं कर सकते। इसके साथ सरकार और उद्योगों की भी जिम्मेदारी है। यदि किसी क्षेत्र में लगातार कामगार नहीं मिल रहे हैं तो केवल शिकायत करने के बजाय कौशल प्रशिक्षण, बेहतर मजदूरी, सुरक्षित कार्यस्थल, आवास, सामाजिक सुरक्षा और काम के सम्मान पर ध्यान देना होगा।

दूसरी ओर समाज को भी यह समझना होगा कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं है। सहायता और सामाजिक सुरक्षा जरूरतमंदों के लिए आवश्यक हैं, लेकिन यदि सहायता की व्यवस्था व्यक्ति को काम से दूर करने लगे, तो उसका उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है। कल्याणकारी योजनाओं का लक्ष्य लोगों को आत्मनिर्भर बनाना होना चाहिए, स्थायी रूप से निर्भर बनाना नहीं। आज आवश्यकता केवल रोजगार पैदा करने की नहीं, बल्कि काम करने की संस्कृति को मजबूत करने की है। बच्चों और युवाओं को यह समझाना होगा कि हर ईमानदार काम सम्मानजनक है। हाथ से काम करने वाला व्यक्ति किसी से कम नहीं है और श्रम से मिलने वाली आय किसी भी आसान आय से अधिक स्थायी आत्मसम्मान देती है।

“आवश्यकता आविष्कार की जननी है”—इस कहावत का अगला अध्याय शायद यही है कि जब मनुष्य को कामगार नहीं मिलेंगे, तो मशीनें उसकी जगह लेंगी। खेती में मशीनें आएंगी, रेस्त्रां में ऑटोमेशन बढ़ेगा, उद्योगों में रोबोट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल बढ़ेगा। यह तकनीकी प्रगति अच्छी बात है, लेकिन यदि समाज का बड़ा वर्ग काम से ही दूर होता गया तो रोजगार का स्वरूप और अवसर दोनों तेजी से बदलेंगे। इसलिए आज सवाल केवल यह नहीं कि “कामगार कहां हैं?” सवाल यह भी है कि “काम और कामगार के बीच दूरी क्यों बढ़ रही है?”

इस दूरी को कम करने के लिए कामगार को उचित पारिश्रमिक और सम्मान चाहिए, नियोक्ता को जिम्मेदार रोजगार व्यवस्था अपनानी होगी और समाज को श्रम के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी। देश की अर्थव्यवस्था केवल बड़े उद्योगों और सरकारी नौकरियों से नहीं चलती। खेत में काम करने वाले हाथ, रसोई में भोजन तैयार करने वाले हाथ, मशीन चलाने वाले हाथ और निर्माण में ईंट उठाने वाले हाथ भी राष्ट्र निर्माण का हिस्सा हैं। जरूरत इस बात की है कि हम काम को केवल मजबूरी नहीं, सम्मान, आत्मनिर्भरता और राष्ट्र की प्रगति का माध्यम मानें। तभी बढ़ती आबादी वास्तव में मानव संसाधन बनेगी—सिर्फ आंकड़ा नहीं।