अंधेरे में देश का रोशन भविष्य एक राष्ट्रीय विडंबना और हमारी प्राथमिकताएं

अंधेरे में देश का रोशन भविष्य एक राष्ट्रीय विडंबना और हमारी प्राथमिकताएं

अंधेरे में देश का रोशन भविष्य: एक राष्ट्रीय विडंबना और हमारी प्राथमिकताएं

खेल के मैदान पर देश का सिर गर्व से ऊंचा करने वाले खिलाड़ी जब अपने ही घर में बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझते हैं, तो यह व्यवस्था पर एक गंभीर सवालिया निशान खड़ा कर देता है। ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के नुआगांव ब्लॉक के लिमडा पंचायत की रहने वाली अंतरराष्ट्रीय महिला हॉकी खिलाड़ी किरण एक्का के घर में स्थानीय विधायक के हस्तक्षेप के बाद बिजली का कनेक्शन मिलना, प्रशासन और व्यवस्था की उदासीनता का एक ऐसा जीवंत उदाहरण है, जो किसी को भी आत्ममंथन करने पर मजबूर कर दे।

प्रतिभा का सम्मान या बुनियादी हक की भीख?

किरण एक्का जैसी खिलाड़ी, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत और ओडिशा का नाम रोशन किया, उनके घर का अंधेरे में रहना इस बात का प्रमाण है कि हम अपनी खेल प्रतिभाओं को केवल मैदान पर तालियां बजाने तक सीमित रखते हैं। जब कोई खिलाड़ी देश का झंडा थामकर विदेशों में पदक जीतता है, तो उसे चारों तरफ से बधाइयां मिलती हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जब वह अपने घर लौटता है, तो उसे बिजली जैसी बुनियादी सुविधा के लिए भी जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक हस्तक्षेप का इंतजार करना पड़ता है। क्या एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी का घर रोशन होना किसी विशेष कृपा का मोहताज होना चाहिए? यह कोई उपकार नहीं, बल्कि उस खिलाड़ी का मूल अधिकार है जिसने देश की प्रतिष्ठा बढ़ाई है।

सुंदरगढ़: हॉकी की नर्सरी और प्रशासनिक उदासीनता

सुंदरगढ़ जिले को भारतीय हॉकी की 'नर्सरी' माना जाता है। इस माटी ने देश को एक से बढ़कर एक दिग्गज हॉकी खिलाड़ी दिए हैं, जिन्होंने भारत को वैश्विक पटल पर पहचान दिलाई। ऐसे उर्वर क्षेत्र से आने वाली किरण एक्का के घर तक बिजली का न पहुंचना यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर हमारी सरकारी योजनाएं और प्रशासनिक संवेदनशीलता कितनी खोखली हैं। यदि खेल और खिलाड़ियों के गढ़ में ही ऐसी स्थिति है, तो बाकी जगह क्या हाल होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

विधायक की पहल और सुधार की गुंजाइश

बीरमित्रपुर के विधायक रोहित जोसेफ तिर्की द्वारा इस मामले में त्वरित संज्ञान लेना और तत्काल बिजली मीटर लगवाना निश्चित ही एक सराहनीय कदम है। उनके इस प्रयास ने एक आदिवासी परिवार और एक प्रतिभावान खिलाड़ी के जीवन के अंधेरे को दूर किया है। हालांकि, यह घटना एक सवाल भी छोड़ती है कि क्या हर खिलाड़ी को अपने हक के लिए स्थानीय प्रतिनिधियों के हस्तक्षेप की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। 
किरण एक्का के घर आई रोशनी केवल एक घर का बल्ब नहीं जलना है, बल्कि यह हमारी उस सोई हुई प्रशासनिक व्यवस्था को जगाने का अवसर है। सरकारों और खेल विभागों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश का गौरव बढ़ाने वाले खिलाड़ियों को बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष न करना पड़े। यदि हम वास्तव में एक खेल महाशक्ति बनना चाहते हैं, तो हमें मैदान पर पसीना बहाने वाले इन नायकों का सम्मान उनके घर की चौखट तक मूलभूत सुविधाएं पहुंचाकर करना होगा, तभी हमारी व्यवस्था पर लगा यह दाग मिट सकेगा।