रक्षा सौदो की खानापूर्ती और सैनिक की शहादत

नितिन सिन्हा (संपादक , खबरसार)
सच तो यह है कि आज भी हमारी सेना और अर्धसेना के अलावा पुलिस के अधिकांश जवानों के पास बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं है,उनके पास सोने के लिए फायर-प्रूफ टेंट नहीं हैं,,फिर वो चाहे सीमा पर तैनात भारतीय सेना हो या घने बीहड़ जगलों में बने नक्सल मोर्चो पर डटे अर्धसैनिक बल के जवान हो,,,दोनों स्थानों में जवानों के पास जीवन उपययोगी संसाधनों का अभी भी इतना अभाव है,कि हमारे जवान कुछ बिना के बजाए हालात से समझौता करना सीख गए हैं।
यद्यपि जीवन और युद्ध उपयोगी संसाधनों के अभाव की कीमत हमेशा हमारे सैनिकों और जवानों ने अपनी बेशकीमती जान देकर चुकाई है। कई बार ऐसे मौकों में उन्होंने अपनी बेजा शहादत दी है, जहां पर वो आसानी से बचे रह सकते थे। मसलन उरी और पुलवामा से लेकर मनीपुर और अनंतनाग हमले में युद्ध उपयोगी संसाधनों का अभाव आज भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
रही बेशर्म राजनीतिज्ञों की बात तो वे लोग ऐसे हर मौकों पर मगरमच्छी आंसू बहाकर झूठी संवेदनाओं का प्रदर्शन करते हुए बड़ी आसानी से खाना पूर्ति कर लेते हैं।इसके बाद सरकार और उसका सिस्टम उसी पुराने ढर्रे पर चल पड़ता है,जिसमें जिंदा जवानों के जान की कोई गारंटी या अहमियत नहीं होती है।।
आज तक देश में जितनी भी सरकारें रही है वो और उसके मंत्री चीख-चीखकर ये दावा करते रहे है कि उनके शासनकाल में हजारों करोड़ के फलां हथियार और फलां संसाधन खरीदे गए हैं। अथवा खरीदने जा रहे हैं।। जबकि सच्चाई यह है कि हर दुसरे दिन हमारे जवान/सैनिक उन्ही चित परिचित मोर्चों पर लगातार शहीद हो रहे है।। जहां उन्ही परिस्थितियों में कई बार पहले भी उनके साथी शहीद हो चुके है। इधर सेना और सुरक्षा बल में आत्महत्या के साथ_साथ अनचाहे हादसों का सिलसिला भी जारी है।।...
सरकारों के पास अपने करोड़ या अरबपति सांसदों अथवा विधायकों की सुविधाएं,वेतन और पेंशन बढ़ाने का समय तो है,पंरतु जवानों की पुरानी पेंशन बहाली और अन्य दूसरी जायज मांगों पर विचार करने की नियत ही नही है।।
दूसरी तरफ सरकारी दावों के उलट अगर आंकड़ों पर नजर डालें। तो पाएंगे कि पिछले महज 5 सालो में 900 से अधिक जवानो की शहादत विभिन्न आतंकी,नक्सली या सीमा पर फायरिंग/हमलों में हुई है। वहीं 110 जवानों की जान अलग_अलग हादसों में तथा 500/550 सैनिकों/जवानों की मौत आत्महत्या की क्रमिक घटनाओं में चली गई है। विडंबना यह है,कि इन सभी घटनाओं को प्रभावी ढंग से रोकने या कम करनेके लिए सरकार के पास अब तक सिर्फ कागजी प्रयासों के अलावा कोई खास योजना नहीं हैं।। जबकि ऐसा किया जाना कोई कठिन काम नही है।मुझे लगता है कि हालात बयां करने के लिए उपरोक्त जानकारियां काफी है,, जबकि सरकार और उसका तंत्र रक्षा सौदों की दलाली में ही मस्त है,,,इसी वजह से सेना और सुरक्षा बल के आधुनिकरण की गति बहुत धीमी है।।
ऐसा न होकर अगर सिर्फ सरकार की नियत ही साफ हो जाए तो सेना/अर्धसेना के अधिकारी और जवानों को बुनियादी जरूरतों के साथ आवश्यक सुरक्षा संसाधनों का अभाव नहीं रहेगा।
वर्तमान स्थिति पर चिंता करें ---
जब देश मे रक्षा दलाली का ऑफिसियल रेट 2 प्रतिशत हो तो !
एक बार फिर,युद्ध का सारा कृत्रिम माहौल बनाया जाएगा, सारे प्रोपगंडा, टी वी चैनल्स पर लगातार युद्धोन्माद की खबरें दिखाई जाएंगी।।
क्योंकि गैर जरूरी...
१. रक्षा-सौदों को जायज़ करना होगा,
२. रक्षा-सौदों में जबर्दस्त दलाली खानी होगी,
३. चुनावों में हवा बनाने की कोशिश होगी,
मुख्य बात यह है कि इस देश में आज इसे हालात बन चुके है जहां सरकार जब_जब भी देश की जरूरी नीतियों में पर विफल होती है ,,
तब_तब कहीं न कहीं बड़ा आतंकी या नक्सली हमला हो जाता है,,हम और आप इसे इत्तेफाक मान लेते है,,लेकिन तमाम हमलों के पीछे का यथार्थ कुछ और ही होता हैं।।
बहरहाल,हमारी तरफ से जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग के हालिया आतंकी हमले में शहीद सैनिकों को पुनः विनम्र-श्रद्धांजली।।





