माया की निद्रा में प्रशासन भागीरथ बने सुदामा

विषय: लुप्त हो रही पौराणिक नदियों को बचाने की लड़ाई अब भूख हड़ताल तक

माया की निद्रा में प्रशासन भागीरथ बने सुदामा

जब नदियां मरती हैं तो संस्कृति मरती  है नदी सिर्फ पानी की धारा नहीं होती। वह सभ्यता की नस है। बस्ती और आसपास का इलाका इस मामले में सौभाग्यशाली रहा है कि यहां मनोरमा, कुआनो, रामरेखा जैसी पौराणिक नदियां बहती हैं। पर आज यही नदियां अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही हैं। गाद से पटी, नालियों के जहर से काली, अतिक्रमण से सिकुड़ी। और इन्हें बचाने की मांग को लेकर पिछले चार दिन से चल रहा प्रदर्शन अब भूख हड़ताल में बदल गया  है ।प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिला प्रशासन को “गहरी निद्रा” से जगाने के लिए समाजसेवी चन्द्रमणि पांडे ‘सुदामा’ के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा है। मांग तीन हैं:

एक पौराणिक नदियों में जल प्रवाह बहाल हो

दूसरा प्रदूषण मुक्ति के लिए ठोस कार्ययोजना बने* 

तीसरा गाद निकालकर गहराई बढ़ाई जाए

चार दिन तक धरना-प्रदर्शन के बाद जब प्रशासन नहीं चेता, तो आंदोलनकारियों ने भूख हड़ताल शुरू कर दी।बताते चलें कि *कौन हैं चन्द्रमणि पांडे ‘सुदामा’

चन्द्रमणि पांडे हर्रैया विधानसभा से  पूर्व प्रत्याशी रह चुके हैं। जनसरोकार के मुद्दों पर मुखर हैं। आरोप-प्रत्यारोप के बीच उनकी छवि “भ्रष्टाचार के दुश्मन और सामाजिक कार्यों में अग्रणी” की बनी है। कहा जाता है कि सामाजिक मुद्दों पर सरकार से भी टकरा जाते हैं, इसलिए वे संगठन में “हजम नहीं हो रहे।” जनसामान्य में उन्हें ‘सुदामा’ नाम से पुकारा जाता है।

मनोरमा: उद्दालक की गंगा, आज बेहाल क्यों
सीता जी के मन को रमने वाले राम जी के प्राकट्य में सहाय मनोरमा को ‘उद्दालक की गंगा’ कहा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इसी के पावन तट पर मखौड़ा धाम स्थित मख क्षेत्र में ऋषि श्रृंगी ने महाराज दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था। यज्ञ कुंड से अग्निदेव प्रकट हुए और पायस दिया, जिसके पान से राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न का प्राकट्य हुआ। ऐसी मोक्षदायिनी, मन को रमाने वाली मनोरमा का आज हाल बेहाल है।

वर्तमान स्थिति: 5 बड़े संकट
1. प्रदूषित जल- नगरों की नालियां, उद्योगों का दूषित जल, कई गांवों में शौचालय का बहाव सीधे नदी में जल काला, बदबू, जलीय जीवन समाप्त
2. गाद और उथलापन- दशकों से सिल्ट सफाई नहीं, गहराई 2-3 फीट बची बाढ़ में ओवरफ्लो, गर्मी में सूखा
3. अतिक्रमण तटों पर अवैध कब्जे, खेती, निर्माण नदी की चौड़ाई घटी, प्रवाह बाधित
4. उद्गम स्थल पर उपेक्षा स्रोत पर जलागम क्षेत्र में तालाब सूखे, चेकडैम टूटे नदी में पानी आना ही बंद
5. प्रशासनिक उदासीनता बजट आता है, कागज पर खर्च होता है, धरातल पर जीरो आस्था और पर्यावरण दोनों का नुकसान

सामाजिक तनाव की वजह भी बनी मनोरमा

प्रदूषण और अतिक्रमण का असर सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं। आरोप है कि पिछले दिनों हर्रैया थाना क्षेत्र के चफवा बाजार में मनोरमा से जुड़े विवाद के कारण साम्प्रदायिक हिंसा फैलते-फैलते बची। प्रशासन के “हाथ-पांव फूल गए थे”। जब नदी मरेगी तो समाज भी बंटेगा — यह चेतावनी है।

कुआनो, रामरेखा का भी यही हाल

मनोरमा अकेली नहीं। कुआनो नदी, रामरेखा नदी — सभी पौराणिक धाराएं विलुप्ति की कगार पर हैं। इन्हें एक “भागीरथ” की जरूरत है। भागीरथ यानी वह जो गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाया था। आज जरूरत ऐसे जन-भागीरथों की है जो इन नदियों में फिर से अविरल धारा लाएं।

सरकार की योजनाएं कहां है

1. नमामि गंगे: मुख्यतः गंगा और सहायक नदियों पर फोकस। मनोरमा, कुआनो जैसी छोटी पौराणिक नदियां उपेक्षित। 
2. अमृत सरोवर: तालाबों के जीर्णोद्धार की योजना है, पर नदी के कैचमेंट से नहीं जोड़ा गया। 
3. मनरेगा  गाद निकालने, चेकडैम बनाने के लिए पर्याप्त, पर जिले में इच्छाशक्ति नहीं। 
4. *राज्य नदी संरक्षण निदेशालय*: कागज पर गठित, जमीन पर निष्क्रिय।

जीरो टॉलरेंस का दोहरा चेहरा

एक तरफ सरकार “विरासत भी, विकास भी” का नारा देती है। अयोध्या, काशी, मथुरा का विकास हो रहा है। पर राम के जन्म से जुड़ी पुत्रेष्टि यज्ञ की साक्षी मनोरमा मरणासन्न है। यह विरोधाभास है। ‘सुदामा’ का आरोप है कि भ्रष्टाचार के कारण नदियों के नाम पर आने वाला पैसा “गर्भ में ही हजम” हो जाता है। यानी योजना बनने से पहले ही बंदरबांट।

प्रशासन का ढुलमुल रवैया क्यों

1. जवाबदेही का अभाव: सिंचाई, ग्राम्य विकास, पंचायतीराज, प्रदूषण बोर्ड — सबकी जिम्मेदारी, पर जवाबदेही किसी की नहीं। 
2. मॉनिटरिंग नहीं: ड्रोन सर्वे, सैटेलाइट मैपिंग, थर्ड पार्टी ऑडिट नहीं। 
3. राजनीतिक इच्छाशक्ति: नदी बचाने से तत्काल वोट नहीं मिलता, इसलिए प्राथमिकता में नीचे। 
4. ठेकेदारी संस्कृति: गाद निकालने के नाम पर जेसीबी से मिट्टी बेचने का खेल।

भूख हड़ताल: गांधीवादी रास्ता, पर कब तक

चन्द्रमणि पांडे ‘सुदामा’ का भूख हड़ताल पर बैठना बताता है कि लोकतांत्रिक तरीके खत्म हो रहे हैं। ज्ञापन, धरना, प्रदर्शन के बाद जब सुनवाई न हो तो अनशन अंतिम हथियार बचता है। पर सवाल है: क्या जिला प्रशासन किसी जनप्रतिनिधि की जान जोखिम में डालकर ही जागेगा?

आगे का रास्ता: 12 सूत्रीय भागीरथ योजना

1. नदी पुत्र अधिनियम : मनोरमा, कुआनो, रामरेखा को “जीवित इकाई” का दर्जा, जैसा उत्तराखंड में गंगा-यमुना को मिला। 
2. डिमार्केशन: राजस्व नक्शे से नदी की मूल चौड़ाई निकालकर पैमाइश। अतिक्रमण हटाओ अभियान। 
3. गाद नीलामी पारदर्शी: निकाली गई सिल्ट की ई-नीलामी, पैसा नदी खाते में। 
4. एसटीपी अनिवार्य: नदी में गिरने वाले हर नाले पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट। 
5. चेकडैम श्रृंखला: उद्गम से संगम तक हर 5 किमी पर छोटे चेकडैम। मनरेगा + कॉर्पोरेट CSR। 
6. नदी न्यास: संत समाज, पर्यावरणविद, प्रशासन, जनप्रतिनिधि का संयुक्त न्यास। सुदामा जैसे लोगों को शामिल करें। 
7. वार्षिक ऑडिट आईआईटी बीएचयू या बीबीएयू से नदी स्वास्थ्य रिपोर्ट। 
8. कल्चरल मैपिंग: मखौड़ा धाम, ऋषि श्रृंगी आश्रम, पुत्रेष्टि यज्ञ स्थल को पर्यटन सर्किट से जोड़ें। इससे संरक्षण को आर्थिक बल मिलेगा। 
9. जीआईएस पोर्टल: जनता के लिए लाइव डैशबोर्ड — जल स्तर, प्रदूषण स्तर, खर्च। 
10. दंडात्मक प्रावधान: नदी में कचरा/केमिकल डालने पर 1 लाख जुर्माना + 6 माह कैद। 
11. जैविक खेती बफर जोन:  नदी के दोनों तरफ 100 मीटर तक रासायनिक खाद प्रतिबंध। 
12. भागीरथ सम्मान: हर साल नदी बचाने वाले नागरिक को जिला स्तर पर सम्मान, 1 लाख पुरस्कार।

जिला प्रशासन से 5 तात्कालिक मांगें

1. डीएम बस्ती 48 घंटे में भूख हड़ताल स्थल पर पहुंचकर वार्ता करें। 
2. मनोरमा, कुआनो, रामरेखा की ड्रोन मैपिंग 15 दिन में सार्वजनिक हो। 
3. पिछले 5 साल में नदी संरक्षण पर खर्च का श्वेत पत्र जारी हो। 
4. चफवा जैसी घटनाएं रोकने के लिए अंतर-धार्मिक नदी संरक्षण समिति बने। 
5. मॉनसून से पहले गाद निकालने का टेंडर और थर्ड पार्टी मॉनिटरिंग शुरू हो।

 निद्रा तोड़ो, वरना इतिहास माफ नहीं करेगा

मनोरमा सिर्फ बस्ती की नदी नहीं, सनातन आस्था की धमनी है। जिस तट पर राम के जन्म का यज्ञ हुआ, वह आज नाले में बदल जाए — इससे बड़ा सांस्कृतिक अपराध क्या होगा? ‘सुदामा’ आज भागीरथ प्रयास कर रहे हैं। पर अकेले सुदामा गंगा नहीं ला सकते। प्रशासन, सरकार, समाज — तीनों को जगना होगा।

माया रूपी निद्रा सबकी आंखों में है: नेता की, अफसर की, ठेकेदार की, और हमारी-आपकी भी। अगर अब भी नहीं जागे तो अगली पीढ़ी हमें पूछेगी — “राम की नदी कहां गई?” और हमारे पास जवाब नहीं होगा।