दिहाड़ी मजदूर की बेटी भारत की हॉकी टीम की कप्तान बनी
सतीश शर्मा (खेल संपादक)
ओडिशा का सुंदरगढ़ जिला लंबे समय से भारतीय हॉकी की प्रतिभाओं की जन्मभूमि माना जाता रहा है। यह जिला देश को निरंतर अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी देता आ रहा है। यहां के गांवों की मिट्टी के मैदानों में हॉकी केवल एक खेल नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा है। इसी क्रम में अब एक और नाम उभर कर आया है —स्वीटी कुजूर।
इसी महीने जापान में आयोजित छठी अंडर-18 महिला एशिया कप हॉकी चैंपियनशिप 16 वर्ष की स्वीटी कुजूर न केवल दल में शामिल थी बल्कि उन्हें भारतीय टीम की कप्तानी भी सौंपी गई। सुंदरगढ़ जिले के लिए यह एक मायने में ऐतिहासिक क्षण था, कि यंहा के किसी खिलाड़ी को पहली बार राष्ट्रीय दल में जगह मिलने के साथ कप्तानी की जिम्मेदारी भी सौपी गई हो। उनकी कप्तानी में भारतीय टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक अपने नाम किया।
साधारण परिवार, असाधारण सपना
राजगांगपुर प्रखंड के केसरामल पंचायत के बड़काटोली गांव में जन्मी स्वीटी का परिवार आर्थिक रूप से बेहद साधारण है। पिता कमल कुजूर दिहाड़ी मजदूर हैं और परिवार की आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं है। चार बेटियों वाले इस परिवार में स्वीटी सबसे छोटी हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद माता-पिता ने बेटियों के सपनों को पंख देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनकी बड़ी बहन खुशबू कुजूर भी पानपोष स्पोर्ट्स हॉस्टल में प्रशिक्षण ले रही हैं।
स्वीटी ने बचपन में गांव के मैदानों में हॉकी स्टिक थामी और खेलना शुरू कर दिया। बाद में उन्होंने केसरामल के ग्रासरूट सेंटर में नियमित प्रशिक्षण लिया। उनकी तेज रफ्तार, आक्रामक खेल शैली और सीखने की ललक ने शुरुआती दिनों में ही प्रशिक्षकों का ध्यान आकर्षित कर लिया। साल 2024 में उनका चयन पानपोष क्रीड़ा छात्रावास में हुआ। यहां कोच पीटर सोरेन के मार्गदर्शन में उन्होंने खेल की बारीकियां सीखीं और अपने कौशल को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। सबजूनियर राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा दिखाने के बाद इस वर्ष उसे राष्ट्रीय शिविर में शामिल किया गया और फिर दल में शामिल किया गया। इस दल में उसके साथ जिले की तीन और लड़कियां - किरण एक्का, प्रिंयका मिंज और रुबीना बखला भी थीं।
जापान में आयोजित इस प्रतियोगिता में स्वीटी ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। पदार्पण के साथ ही टीम की कप्तानी मिलना किसी भी खिलाड़ी के लिए बड़ी चुनौती होती है, लेकिन उन्होंने इस जिम्मेदारी को पूरी परिपक्वता के साथ निभाया। स्वीटी बताती हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उन्हें भारतीय टीम की कप्तानी मिलेगी।
जब कप्तान के रूप में उनका नाम घोषित हुआ तो वह खुद भी आश्चर्यचकित रह गईं। स्वीटी ने बताया कि शिविर में वह सभी खिलाड़ियों के साथ सहज और मिलनसार रहती थीं। कोच रानी रामपाल उनसे अक्सर बातचीत करती थीं और संभवतः उनमें नेतृत्व की क्षमता देखी हो।
भारत ने पूरे टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन किया। सेमीफाइनल में चीन के खिलाफ मुकाबला 2-2 की बराबरी पर समाप्त हुआ, लेकिन पेनाल्टी शूटआउट में हार के कारण फाइनल का सपना टूट गया। हालांकि टीम ने निराशा को पीछे छोड़ते हुए कांस्य पदक मुकाबले में दक्षिण कोरिया को 3-0 से हराकर तीसरा स्थान हासिल किया। फारवर्ड पोजिशन पर खेलने वाली स्वीटी ने प्रतियोगिता में दल के लिए स्वंय चार गोल किये थे।
आदर्श और लक्ष्य
स्वीटी अपने जिले के भारतीय हॉकी खिलाड़ी शीलानंद लकड़ा को अपना आदर्श मानती हैं। उनका सपना है कि वह भी भविष्य में भारतीय सीनियर टीम का हिस्सा बनें और देश के लिए बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में पदक जीतें। स्वीटी का परिवार आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। पिता की दिहाड़ी मजदूरी से घर का खर्च चलता है और भविष्य की उम्मीदें बेटियों की मेहनत पर टिकी हैं। स्वीटी की उम्र अभी केवल 16 वर्ष है, इसलिए नौकरी या अन्य स्थायी अवसरों के लिए उन्हें कुछ और वर्ष इंतजार करना होगा। लेकिन परिवार को विश्वास है कि उनकी प्रतिभा और समर्पण एक दिन पूरे घर की तस्वीर बदल देंगे।





