जिनकी शहादत से हम सुरक्षित है उनके लिए हमने क्या किया
नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार)
आज से चार साल पहले 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में शहीद हुए उन 44 जाबाज़ों को कोटि-कोटि नमन,जो षड्यंत्रकारी कायरता पूर्ण हमले में शहीद हुए थे।
पुलवामा में शहीदों ने पीठ पीछे छुपकर हमला करने वाले कायर चरमपंथियों के कथित फिदायीन हमले में अपनी शहादत दी थी.पुलवामा 2019 देश के शांतिकाल में बिना दुश्मन से लड़े इतनी बड़ी संख्या में सैनिको/जवानों के शहादत की सबसे बड़ी घटना थी..हमले के बाद जहां एक ओर पूरा देश कागजी शेर कही जाने वाली केंद्र सरकार के विरुद्ध आक्रोश में था,तो वहीं दूसरी ओर, मीडिया मैनेज करने वाली केंद्र सरकार और उसके असफल सूचना तंत्र पर भी कई सवाल उठ रहे थे.ये सभी ऐसे सवाल थे जिनमें से अधिकांश का सरकार ने अब तक जवाब नहीं दिया है.और शायद आगे देना भी नही चाहेगी।
पुलवामा हमले के बाद केंद्र सरकार के खिलाफ उठे सवालों में यह कुछ प्रमुख सवाल थे, जिनका पूछा जाना हर जागरूक भारतीय नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी बनती है......
हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल ने कहा था कि -हमें इंटलीजेंस इनपुट तो मिले थे,लेकिन उसे 'नज़रअंदाज़' किया गया।
1.ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि अगर हमले से जुड़ी इंटेलीजेंस जानकारियां मिली थीं तो उन्हे गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया?
2.इस जानलेवा लापरवाही के लिए आखिर दोषी किसे ठहराया गया.?
3.क्या निर्दोष 44 जवानो के जान की सुरक्षा केंद्र सरकार या सिस्टम की जिम्मेदारी नही थी.?
4.इतने बड़े हमले की तैयारी में महीनों का समय लगता है,अगर इस दौरान सेना को या गृह मंत्रालय को ऐसे किसी हमले की कोई भनक नहीं लगती है तो ये क्या भारत के ख़ुफ़िया तंत्र और केंद्र सरकार पूरी तरह से निक्कमी है.?
5.जम्मू-श्रीनगर हाइवे उन सड़कों में शामिल है जहां देश के सबसे कड़े सुरक्षा मानक लागू हैं.इस हाइवे में थोड़ी-थोड़ी दूरी में सभी आम गाड़ियों की कड़ी जांच की जाती है.ऐसे में आख़िर विस्फोटक से भरी कोई गाड़ी हाइवे की कड़ी सुरक्षा को चकमा कैसे दे सकी?
6.250-300 किलोग्राम विस्फोटक आख़िर हमारे देश भारत में आया कैसे,और अगर बाहर से नहीं आया तो इतनी भारी मात्रा में विस्फोटक हमलावरों के हाथ किस तरह से लगा.?
7.78 गाड़ियों के काफ़िले को एक साथ ले जाने के पीछे ख़राब मौसम को कारण बताया जा रहा है.तो क्या 2547 जवानों की संख्या वाले इस बड़े काफ़िले को एयरलिफ़्ट नहीं किया जा सकता था.?
8.तमाम खतरों के बावजूद वर्षों से जवानों के डिप्लॉयमेंट के उक्त तरीके को क्यों नही बदला गया.?
रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल डी.एस हुड्डा ने साल 2016 में भारत की ओर से पाकिस्तान पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक का नेतृत्व किया था.पुलवामा हमले के बाद उन्होंने सवाल उठाया कि *"ये संभव ही नहीं है कि इतनी ज़्यादा मात्रा में विस्फ़ोटक सामग्री बिना किसी बड़े सरकारी तंत्र की सहायता के सीमा पार से हमारे देश के अंदर आ जाए.जरूर घर के भेदियों ने इस हमले में आतंकियों को सहयोग किया है।"
क्या टीबी और मोइबल स्क्रीन में मजबूत और सक्षम दिखने वाली केंद्र सरकार आज तक उन भेदियों को खोजने की क्षमता नही रखती ?
खैर इन तमाम सवालों के बीच आपको जो भी लगे परन्तु मेरी अपनी सोंच है कि पुलवामा हमले के पीछे बड़ी शर्मनाक सच्चाई यह है कि देश मे महंगाई,चरमराती अर्थव्यवस्था,सम्प्रदायिक/जातीय दंगों का दौर,असफल विदेश नीति,बैंको का बढ़ता npa,बेरोजगारी की मार,किसानों की असंतुष्टि और निरन्तर बढ़ते सरकार विरोधी प्रदर्शन जैसे बड़े मुद्दों बीच घटी पुलवामा हमले की यह घटना जिनमें 44 शहीद जवानों निर्मम हत्या की गई थी,इस घटना ने केंद्र सरकार को न केवल इन सरकार विरोधी मुद्दों से अगले कुछ महीनों के लिए मुक्ति दिला दी थी,बल्कि अपनी कुर्बानी के बूते शहीद जवानों ने दुबारा बड़ी बहुमत से कागजी शेर दिखने वाली राजनीतिक पार्टी को केंद्र में दोबारा से बड़ी बहुमत के साथ सरकार बनाने का माहौल और मौका भी दे दिया था।

देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था कि किसी राजनीतिक पार्टी की सरकार ने पुलवामा हमले में अपनी नाकामियों की जिम्मेदारी भले ही न ली हो परन्तु पहली बार शर्मनाक ढंग से पुलवामा शहीदों और बालाकोट की कथित सर्जिकल स्ट्राइक्स के नाम पर सरकार के पक्ष में कुछ मतलबी भिख मंगो ने पूरी निर्लज्जता से सत्ताधारी पार्टी के लिए वोट जरूर मांगा था। ऐसा शर्मनाक कृत्य देश के राजनीतिक इतिहास में पहला और लजा देने वाला काम था।
विशेषज्ञों कि माने तो इस घटना के पीछे इंटलीजेंस फेलुवर से ज्यादा राजनीतिक षड्यंत्र के साक्ष्य देंखने को मिलते हैं।। फिलहाल इतना देख लीजिए कि पुलवामा हमले के बाद फ़र्ज़ी राष्ट्रवादियों की सरकार तो दुबारा बहुमत से तो चुनी जाती है।। परन्तु भाजपा सहित पुलवामा हमले की दुहाइयाँ देने वाली देश की तमाम राजनीतिक पार्टियों ने विगत लोकसभा चुनाव में करोड़ो अरबो रुपए अपने चुनाब प्रचार-प्रसार में खर्च किए परन्तु किसी भी राजनीतिक दल ने पुलवामा शहीदों के परिजनों की मदद करना उचित नही समझा।।
आज भी बिना किसी सरकारी सहायता के शहीदों के परिवार अपने पालक के अभाव में जीवन का कठिनतम संघर्ष कर रहे हैं।। क्या ये शर्मनाक आचरण नही है..?
कुछ शहीदों के परिजनों की सच्चाई आपके सामने पेश कर रहा हूँ,सोंचिये देशभक्ति के दावे में अपना सीना ठोंक-ठोंक कर चिल्लाने वाले हम-आप ने देश के शहीदों और उनके परिजनों के प्रति कितनी जिम्मेदारी रखते हैं।

"गौर से देखिए ये उन्ही शहीदों का परिवार है जिनकी शहादत के बूते भाजपा और कांग्रेस की सरकारें देश-प्रदेश में चुनी भी गई।"

"परन्तु सोंचिये क्या बदले में सरकार,सिस्टम और खुद हमने इनके साँथ कितना न्याय किया.?? उनके पीछे उनके परिजनों को कितना सम्मान दिया.."
वैसे आज 14 फरवरी का दिन है।। हम हमारे बच्चे आज के दिन को वेलेंटाइन डे के रूप में याद रखते है।। याद रखना भी चाहिए पर एक निवेदन है कि आज के दिन आप खुद और अपने मित्रों सहित बच्चों को पुलवामा हमले के शहीदों के विषय में जरूर बताएं,उन्हें याद कर दो मिनट की मौन श्रद्धान्जलि अवश्य दें और दिलवाएं।। उन्हें यह भी बताए कि कैसे हमारे सैनिकों ने हमारे बेहतर कल के लिए अपने आज का बलिदान दिया था। क्योंकि सब से बड़ा सच तो यही है कि "हमारी खुशहाली भी हमारे जांबाजों की शहादत के निरन्तर चलते सिलसिले पर टिकी हुई है।"
*कब तक शहादत दें वीर जवान,*
भारत माँ की रक्षा में।
*क्या कोई फर्ज नहीं बनता,*
हमारा भी उनकी सुरक्षा में।।
*सर काट ले जाते हैं दुश्मन*
हमारे वीर जवानों का।।
*मुँह ताकते रहते है,हम बेईमान*
सिस्टम चलाने वालों का।।





