जन्मदिन बिशेष चन्द्रशेखर पुर्व प्रधानमंत्री
युवा तुर्क से जननायक तक चंद्रशेखर की जीवन यात्रा और उनका समाजवाद
धर्मेंद्र सिंह, प्रदेश प्रमुख, सारांश दैनिक, उत्तर प्रदेश
सत्रह अप्रैल की सुबह जब देश चंद्रशेखर को याद करता है, तो वह किसी कुर्सी पर बैठे प्रधानमंत्री को नहीं, एक पूरे युग के जमीर को नमन करता है। बलिया के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे वे दिल्ली की सत्ता के शिखर तक पहुंचे पर रास्ते भर अपनी चप्पल की धूल नहीं झाड़ी। संसद ने उन्हें ‘युवा तुर्क’ का नाम दिया, गांव ने ‘अपना चंद्रशेखर’ कहकर गले लगाया। उनके लिए राजनीति महलों का रास्ता नहीं था, खेत की पगडंडी थी। सादगी उनका ओढ़ना-बिछौना था, ईमानदारी उनकी लाठी थी और जनसेवा उनकी मंजिल।
उनका समाजवाद विश्वविद्यालयों की मोटी किताबों से नहीं निकला था। वह मड़ई की फूस, हल की मूठ और मजदूर की हथेली की लकीरों से जन्मा था। पचास के दशक में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की साइकिल पर जब वे निकले, तब से उनका एक ही नारा था: आजादी तब पूरी होगी जब आखिरी आदमी के चूल्हे में आग जलेगी। 1964 में राज्यसभा की दहलीज पर पहला कदम रखा तो दिल्ली की ठंडी दीवारें एक ऐसी तपिश से रूबरू हुईं जो खेतों की लू से आई थी। आपातकाल आया तो लोकतंत्र की गर्दन पर छुरा रख दिया गया। चंद्रशेखर ने उन्नीस महीने जेल की कोठरी चुनी, पर जुबान पर ताला नहीं लगाया। सलाखों के पीछे से उनकी आवाज और बुलंद होकर निकली। बाहर आए तो टूटी हुई जनता पार्टी को जोड़ने वाले कारीगर बने।
1983 की पदयात्रा इस देश के भूगोल पर लिखा गया एक प्रेमपत्र था। आजादी के आंदोलन के पश्चात किसी राजनेता का ऐसा आंदोलन कन्याकुमारी से दिल्ली तक चार हजार किलोमीटर नापते हुए उन्होंने भारत को पैरों से पढ़ा। बिवाई फटे पांव और आंखों में बसा हुआ गांव का दर्द लेकर जब वे राजपथ पर पहुंचे, तब दिल्ली ने जाना कि समाजवाद भाषणों में नहीं, पसीने की बूंद में टपकता है। 1990 में प्रधानमंत्री की कुर्सी मिली तो देश की तिजोरी खाली थी और विदेशी कर्ज दरवाजे पर खड़ा था। सात महीने का छोटा कार्यकाल, पर फैसला हिमालय सा बड़ा। कुर्सी बचाने के लिए देश का भविष्य गिरवी नहीं रखा। सोना गिरवी रखा, पर देश का माथा झुकने नहीं दिया। यही था उनका समाजवाद: संकट में कमजोर की ढाल बन जाना और राष्ट्र को अपने नाम से बड़ा मान लेना।
आज समाजवाद की परिभाषा बदल गई है। चंद्रशेखर के समय वह एक तप था, आज वह अवसर और एक नारा है। वे संसाधनों के बंटवारे की लड़ाई लड़े थे, आज सत्ता के बंटवारे की सौदेबाजी होती है। उनके लिए गरीब एक धड़कता हुआ दिल था, आज वह चुनावी गणित का आंकड़ा बन गया है। उन्होंने कभी अपने बेटे को उत्तराधिकार में दिल्ली की सत्ता नहीं सौंपी। न जाति की दीवार उठाई, न धर्म की दुहाई दी। उनका सीधा हिसाब था: भूख का मजहब नहीं होता और बेरोजगारी की कोई जाति नहीं होती।
चंद्रशेखर की विरासत किसी पार्टी के दफ्तर में कैद नहीं है। वह हर उस नौजवान की रगों में दौड़ती है जो हुक्मरानों की आंख में आंख डालकर सवाल पूछता है। वह हर उस नेता की परछाई में बसती है जो काफिला छोड़कर अकेला भी सच के साथ खड़ा हो जाता है। आपातकाल में लोकतंत्र की लौ को हथेली से ढक लेने वाले ‘युवा तुर्क’ की आत्मा आज भी कह रही है कि राजनीति सौदा नहीं, साधना है।
उनके बेटे नीरज शेखर आज उनके नाम को आगे बढ़ा रहे हैं, पर चंद्रशेखर का समाजवाद वंश का मोहताज कभी नहीं था। वे एक मशाल हैं। जो भी गांव की चौपाल, खेत की मेड़ और मजदूर की झोपड़ी के लिए आवाज उठाएगा, जो सरकार की आंख में आंख डालकर हिसाब मांगेगा, ‘युवा तुर्क’ का झंडा उसी के हाथ में सबसे ज्यादा फबेगा। जब तक एक भी पेट भूखा है और एक भी आवाज खामोश है, तब तक चंद्रशेखर का समाजवाद अधूरा है। उनकी जयंती पर असली श्रद्धांजलि यही होगी कि हम सादगी को दिखावा नहीं, स्वभाव बनाएं और जनसेवा को पद की सीढ़ी नहीं, जीवन का शिखर मानें। यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है।





