इन मौतो का मातम या जश्न मनाए हम
नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार)
सच कहूं तो पीड़ा तो दोनो तरफ मारें जाने वाले गरीब और निर्दोष बच्चों की मौत पर होती है। यथार्थ में दोनो को ये नहीं पता होता है कि वो किसके लिए, किससे और क्यों लड़ रहे हैं ?
एक तरफ एक ही कंधे में पूरे परिवार को पालने की मजबूरी होती है,जिसके लिए हजारों युवा बच्चे अपने घर,परिवार,और गांव शहर को हजारों km पीछे छोड़कर उन जंगलों को अपना घर बना लेते हैं जो उनके ही खून का प्यासा होता है।। तो दूसरी तरफ अपनी उस जमीन,खेत,घर(जंगल),इज्जत(स्त्री धन)और प्राचीन परंपरा बचाने का भार होता है।। जिसका उपभोग उनके हाथों मारे जाने सैकड़ों बाहरी युवा कतई नहीं करने वाले थे।। फिर भी उन्हें मारना जरूरी है।। क्योंकि उन्हें ये बताया गया है,कि ये लोग तुम्हारे दुश्मन हैं,तुमसे तुम्हारा सब कुछ छीन लेंगे ?
भारत के सुदूर जगलों में अपनों के बीच सालों से चल रही खूनी लड़ाई वास्तविकता कुछ और ही है।। इसे पिछले 15 सालों से मैने अपने स्तर पर समझने का प्रयास किया है,, जितना समझ सका,उस हिसाब से कह सकता हूं,कि *दोनो तरफ के लोगों को लड़ाने वाले लोग कहीं न कहीं एक ही व्यवस्था से नियंत्रित किए जा रहे हैं। वास्तव में इस खूनी हिंसा के स्थाई समाधान के लिए न तो हमारे द्वारा चुनी गई सरकार प्रतिबद्ध है न ही नक्सली नियंत्रक इस बेनामी हिंसक युद्ध को रोकना चाहते हैं।
दरअसल में दोनो तरफ के प्रमुख लोगों के लिए देश के मजबूर युवाओं के भविष्य,उनकी ऊर्जा यहां तक कि उनके जान की कोई अहमियत नहीं हैं।। अन्यथा आज हिंसक होकर अपना घर बचाने वालों की छोटी सी मांग *(उनके संवैधानिक अधिकार पेसा एक्ट का पालन)* को मान लेने में सरकार को क्या तकलीफ है?? वही दूसरी तरफ लोगों को हथियार छोड़ कर *क्षेत्र में शिक्षा के प्रसार और लोकतांत्रिक तरीके(चुनाव,विरोध और न्यायालय)के माध्यम से अहिंसात्मक लड़ाई लड़ने में किस बात की तकलीफ है।
बंदूक या बारूद से लड़ी जा रही 40 साल पुरानी लड़ाई में उन्होंने अब तक क्या पाया है इतना विचार तो उन्हे भी करना ही चाहिए...???लेकिन दोनो में से कोई भी मानने को तैयार नहीं है, क्योंकि दोनो का फायदा लड़ाई चलते रहने से है।
देश में जब तक बेरोजगारी है तब तक *छोटी सी नौकरी के नाम पर जान देने वाले युवाओं की कमी नहीं होगी,वही जंगल के लोग जब तक अशिक्षित और मुख्य धारा से कटे रहेंगे,जल जंगल जमीन के नाम पर जान लेने और देने वालों की कमी भी नहीं होगी*.. इनके अलावा अपने_अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र में अपना प्रभाव जमाने के लिए, निर्दोष लोगों पर झूठा मुकदमा लगाकर जेल में डालना अथवा मुखबिरी के नाम पर ग्रामीणों की नृशंस हत्या करना सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा।।
चलिए तब तक आप *हम(जिन्हे अपनी दैनिक जरूरतो के लिए संघर्ष करने से फुरसत नहीं है)वो बस मूक दर्शक बन कर एक गरीब(नक्सली) की मौत पर उत्सव मनाते है तो दूसरे गरीब(जवान)के मरने पर शोक मना लेते हैं।





