अनचाहा युद्ध और बड़ा सबक
नितिन सिन्हा (संपादक खबर सार)
भारत के युद्ध इतिहास में 26 जुलाई एक ऐसी तारीख के रूप में दर्ज है,जिसके विषय में बताया जाता है कि हमने आस्तीन के सांप बने दुश्मन पाकिस्तान पर ऐतिहासिक जीत पाई थी।। लेकिन युद्ध_विजय की इस कहानी के पीछे का एक स्याह सच यह भी है, कि हर बार की तरह हमारे तत्कालीन नेताओं ने एक पारंपरिक धोखेबाज पड़ोसी पर आँख बंद कर भरोसा कर लिया था।
हमारी तब की सरकार ने संभावित पाकिस्तानी अतिक्रमण की आशंका को लेकर सैन्य विशेषज्ञों तथा ख़ुफ़िया जानकारों की सूचना को भी सिरे से नजर अंदाज कर रूटीन तौर पर भारतीय सैनिकों को अपनी चौकियां खाली कर पीछे हटने का निर्देश दे दिया था।।कुछ सैन्य जानकार बताते है कि भारतीय सेना इन दिनों 14 से 18000 फिट ऊंची ठंडी बर्फीली पहाड़ियों पर सुरक्षा संसाधनों और आधुनिक युद्ध उपकरणों की भारी कमी से भी जूझ रही थी। साथ ही तत्कालीन सरकार के मंत्रियों को देश की परमाणु क्षमता को लेकर ओवर कॉन्फिडेंस भी था। यही नहीं दुश्मन के बड़े गेम प्लान को हमारी सरकार के जिम्मेदार मंत्रियों ने छोटी_मोटी आतंकी घुसपैठ का होना मान लिया था। जिसका परिणाम यह हुआ कि 85 दिनों तक बिना रुके चले इस भयंकर युद्ध में हमारे 527 वीर सैनिक शहीद और 1363 सैनिक आहत हुए थे। वहीं फ्लाइट लेफ्टिनेंट के.नचिकेता भी वीरगति को प्राप्त हुए थे।
हमारे जवानों ने करीब ढाई महीने चले इस युद्ध में बिना थके और बिना झुके पाकिस्तानी सेना से युद्ध लड़कर उसके द्वारा धोखे से हड़पी गई हमारी अपनी जमीन वापस ले ली थीं।। यद्यपि कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना को बुरी तरह से हार का मुंह देखना पड़ा और उसे कारगिल छोड़कर वापस भागना पड़ा था।।लेकिन पाकिस्तान और चीन से संभावित युद्ध की भारतीय तैयारियों की कमी भी खुलकर सामने आई थी।।फिर भी भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी जी ने युद्ध विजय का श्रेय लेने की जगह सार्वजनिक रूप से अपनी कमियां स्वीकारते हुये,सैन्य व्यवस्था में तुरंत बड़े सुधार किए थे।।
युद्ध खत्म होने के कुछ दिन बाद ही स्व.अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार ने एक कारगिल रिव्यू कमिटी बनाई। इसकी अध्यक्षता के. सुब्रह्मण्यम ने की थी। शीघ्र ही समिति ने घटनाओं की जांच कर और भविष्य में ऐसी घुसपैठ को रोकने के उपाय सुझाए थे। रिपोर्ट 7 जनवरी 2000 को प्रधानमंत्री को सौंपी गई और 23 फरवरी 2000 को संसद में पेश किया गया था।
कारगिल युद्ध की जीत ने जहां भारतीय सेना को कठिन से कठिन परिस्थितियों में युद्ध जीतने कि कुशलता प्रदान की थी। वहीं भारत सरकार को एक ऐसा सबक सिखाया था, कि आप परमाणु शक्ति संपन्न होने के बाद भी पाकिस्तान और चीन से होने वाली क्षेत्रीय सैन्य झड़पों के अलावा बड़े पैमाने पर सैन्य आधुनिकीकरण और दोहरे मोर्चे पर लंबे समय तक युद्ध लड़ने की पूर्व तैयारिया रखने के लिए सचेत भी कर दिया था।। याद रखिए *26 जुलाई याने आज का दिन जहां हमें एक तरफ कारगिल युद्ध की सफलता के परिपेक्ष्य में "विजय_ दिवस" मनाने का अवसर देता है तो वहीं दूसरी तरफ हमारे उन वीर जवानों पर गर्व करने और याद करने का मौका देता है। जिन्होंने अपने देश के नाम अपनी जान तक कुर्बान कर दी थी।।।
अतःकारगिल विजय_दिवस की शुभकामनाओं सहित भारत के उन 527 वीर शहीदों को सादर नमन।। जो आज हमारे बीच नहीं हैं।।





