हिन्दी पत्रकारिता दिवस बिशेष

हिन्दी पत्रकारिता दिवस बिशेष

हमारा देश भारत विविधता में एकता और अखण्डता  के लिए  विश्व प्रसिद्ध  है। हमारे देश की संस्कृति  और भाषा का विश्व में एक अलग ही पहचान  हैं, पर अफसोस इस बात का है कि अपने ही देश में हमारी मातृभाषा उपेक्षा का शिकार है ।ऐसा नही है कि मीडिया के विभिन्न स्रोतों का उपयोग सिर्फ समाचार प्राप्ति के लिए ही लोगों द्वारा किया जाता है । एक समय ऐसा भी था जब लोग और विशेषकर विद्यार्थी वर्ग अपनी भाषा को समृद्ध और शब्दकोश को सुदृढ़ करने के लिए पत्र पत्रिकाएँ पढ़ा करते थे।
 किसी भी देश के लिए मीडिया, जनसंवाद का एक सशक्त माध्यम होता है इसलिए मीडिया की भी यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह जिस भाषा में सूचना या विचार जनता के बीच प्रेषित करे उसकी  शुद्धता को यथासम्भव  बनाए रखने का प्रयास करे। आज भारत में हिन्दी पत्रकारिता एवं लेखन के क्षेत्र में मातृभाषा हिन्दी में विदेशी भाषा के शब्दों का अनावश्यक मिश्रण भाषा की मौलिकता पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है जिससे बचा जाना अतिआवश्यक है।
अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रेषित होने वाले हिन्दी के समाचारों में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है, जिससे प्रयोग की जाने वाली भाषा हिन्दी के बजाए हिंग्लिश हो गई है। इसके कारण आम बोलचाल में हिन्दी के शब्द अब कम होने लगे हैं क्योंकि अंग्रेजी अभिजात्य वर्ग की और अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी  'हिंग्लिश' नव अभिजात्य वर्ग की भाषा समझी जाती है । इन सब कारणों से आजकल प्रेषित होने वाली हिन्दी समाचारों में  बहुतायत में अंग्रेजी के शब्दों का जैसे एमएलए (विधायक), चेयरमेन (अध्यक्ष),  डिपार्टमेंट (विभाग), गवर्नमेंट (सरकार), मिनिस्टर (मन्त्री) आदि प्रयोग होता है। हिन्दी भाषी पत्रकार भी अपने लेखन और वक्तव्यों में हिंग्लिश का धड़ल्ले से प्रयोग कर रहे हैं। अपने ही देश में उपेक्षित हिन्दी के शब्द हिन्दी की भाषा को कमजोर बनाने का काम कर रही है।हिन्दी के कुछ पत्रकारों द्वारा हिन्दी का शुद्ध लेखन और उच्चारण  ना कर पाना एक दुखद विषय है। ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने से एक ओर जहाँ पत्रकारिता का बहुआयामी विकास हुआ है वहीं दूसरी ओर सिर्फ समाज में प्रसिद्धि पाने और धनार्जन करने के लिए के लिए पत्रकारिता के क्षेत्र में उतरने वाले पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों की उपेक्षा कर हिन्दी पत्रकारिता मे "चांद में दाग" होने की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने से छपाई और वितरण का खर्च तो बचता ही है साथ ही वेबपोर्टल के माध्यम से जनता तक पहुँच आसान हो जाती है । सोशल मीडिया के आने से समाचार पोर्टल,युट्यूब चैनल,फेसबुक पेज,आदि स्थानीय और राष्ट्रीय पटल पर  आए दिन कुकुरमुत्तों की तरह  पनपने लगे हैं, पर इन पोर्टेलों में ठोस एवं पुष्ट विषय वस्तु का अभाव होता है। इस क्षेत्र से कुछ ऐसे लोग भी जुड़ने लगे हैं जिनका पत्रकारिता से कोई लेना देना नहीं  है और ना ही ये प्रशिक्षित होते हैं। यही वजह है कि इनके द्वारा प्रेषित हिन्दी के समाचारों में कई भाषाई त्रुटियाँ होती है।