सहायक आरक्षक और गोपनीय सैनिक भी इंसान हैं साहब

कांग्रेस सरकार का वायदा था,सहायक आरक्षकों और गोपनीय सैनिकों को सीधे आरक्षक बनाया जायेगा,,10 सालों के संघर्ष को लगा झटका

सहायक आरक्षक और गोपनीय सैनिक भी इंसान हैं साहब

नितिन सिन्हा (संपादक -खबरसार) 

रायपुर/बस्तर/कोंडागांव..

लगता है छ ग में नक्सलियों से उनकी मांद में घुसकर सीधा लोहा लेने वाले छ ग पुलिस के बहादुर सहायक आरक्षक/गोपनीय सैनिक हर बार की तरह फिर एक बार जनता/खुद से चुनी हुई सरकार और उसके असंवेदनशील सिस्टम से ठगे जा रहे हैं।

जी हां हम बात कर रहे हैं, राज्य के नक्सल मोर्चों पर तैनात छग पुलिस के  सहायक आरक्षक और गोपनीय सैनिकों की।। जो माओवादी प्रभाव वाले हिंसा ग्रस्त क्षेत्रों में अपनी जान की चिंता किए बगैर बर्बर नक्सलियों से सीधी टक्कर लेते हैं। मुख्य रूप से सहायक आरक्षकों/गोपनीय सैनिकों की भर्ती डी.आर.जी. ग्रुप में अधिक होती है। इसके अलावा पुलिस अफसरों की इच्छा से सहायक  आरक्षक अन्य कार्यों में भी लगाए जाते हैं। लेकिन ज्यादातर सहायक आरक्षको को नक्सली गतिविधियों वाले क्षेत्र में राज्य पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बल के साथ या फिर अकेले अपने दम पर आपरेशन चलना होता हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो राज्य के तमाम नक्सल ऑपरेशनों में सहायक आरक्षक या गोपनीय सैनिक ही मुख्य भूमिका में होते हैं। इसलिए सबसे ज्यादा शहादत भी इन्ही की होती है। वहीं नक्सल मोर्चों में घायल होने वाले लोगों में भी इनकी संख्या अधिक होती है। 

नक्सली अपनी भाषा में सहायक आरक्षकों और गोपनीय सैनिकों को ऐसा बलि का बकरा कहते हैं जिसकी फिक्र बकरे के मालिक को भी नहीं होती हैं। कमोबेश गोपनीय सैनिकों के मामलों में ऐसा सर्वाधिक बार होता है, कि उनका अपना विभाग नक्सलियों के द्वारा उनके पकड़े जाने या मारे जाने पर भी उन्हें अपना नही मानता है। सच कहे तो पुलिस विभाग में सबसे बुरी स्थिति गोपनीय सैनिकों की होती है। उन्हे विभाग के बड़े अधिकारी किसी जिंदा चारे की तरह इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद इन्हें अधिकारी बिना किसी पूर्व सूचना के कभी भी बर्खास्त कर सकते हैं। उनकी सेवा भी बेहद कम वेतन में मात्र 55 वर्ष की आयु तक के लिए ली जाती है। गोपनीय सैनिकों की बर्खास्तगी समय सेवा मुक्ति के बाद उन्हें न तो पेंशन दिया जाता है,न ही उनकी सुरक्षा को लेकर विभाग जिम्मेदार होता है।।

कुछ इसी तरह नक्सल मोर्चों पर तैनात हजारों सहायक आरक्षक और गोपनीय सैनिक जानलेवा परिस्थियों लंबी सेवा देने के बाद पदोन्नति की बात जोह रहे हैं। इसके अलावा वर्ष 2013 से सहायक आरक्षक अपनी पदोन्नति की मांग राज्य सरकार से लगातार कर रहे हैं।

सहायक आरक्षकों की समस्याओं को लेकर पुलिस सुधार आंदोलन के सूत्रधार पूर्व आरक्षक राकेश यादव बताते है कि वर्ष 2017/18 में जब पुलिस परिवार का ऐतिहासिक आंदोलन सुर्खियों में था इस दौरान तत्तकालीन विपक्षी पार्टी काग्रेस ने आंदोलन का हिस्सा बनते हुए,आंदोलनकारी पुलिस कर्मियों को इस बात के लिए आश्वस्त किया था,कि राज्य में उनकी सरकार के बनते ही पुलिस परिवार की सभी जायज मांगों को लागू करने के अलावा सहायक आरक्षकों और गोपनीय सैनिकों को सीधे आरक्षक के पद पर पदोन्नति दी जाएगी।

बावजूद इसके राज्य में 4.5 साल से कांग्रेस की सरकार है लेकिन पुलिस परिवार की एक भी मांग पूरी नहीं की गई न ही सहायक आरक्षकों और गोपनीय सैनिकों को पदोन्नति का लाभ दिया गया।

इधर कोंडागांव पुलिस अधीक्षक कार्यालय से जारी निर्देश पत्र में  जिला स्ट्राइक फोर्स में भर्ती के लिए सहायक आरक्षकों के लिए शारीरिक दक्षता परीक्षा का आयोजन करने को कहा गया हैं। यह परीक्षा 24 जुलाई 2023 से 4 अगस्त 2023 तक पुलिस परेड ग्राउंड में आयोजित की जा रही है। यहां यह जानना जरूरी है कि पुलिस के कई सहायक आरक्षक और गोपनीय सैनिक इस शारीरिक दक्षता परीक्षा में इस वजह से भाग नही ले पाएंगे,क्योंकि वो नक्सल मुठभेड़ में या तो घायल होकर दिव्यांग हो चुके है या सहायक आरक्षक की सेवा करते हुए उनकी उम्र अधिक हो चुकी है। 

इस वजह से जिले और राज्य के सहायक आरक्षकों और गोपनीय सैनिकों में वापस से गहरी निराशा घर कर गई है। वही वे इस बात के लिए  भी आश्वत हो चुके है,कि राज्य सरकार और उसके गृह मंत्री उनकी समस्याओं की तरफ नजर भी नही डालेंगे।।