लोकसभा में नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक 2026 मत-विभाजन में गिरा
लोकसभा में नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक 2026 मत-विभाजन में गिरा
शाह बोले: महिलाओं के साथ विपक्ष का अन्याय, महिलाएं माफ नहीं करेंगी
सत्ता और विपक्ष दोनों को सियासी झटका
लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पर हुई वोटिंग में पक्ष में 298 वोट पड़े और विरोध में 230। दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 वोट जरूरी थे। 54 वोट कम पड़ने से विधेयक गिर गया। सदन की कुल सदस्यता का बहुमत तो मिल गया पर संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई का आंकड़ा नहीं छू पाया, इसलिए बिल पास नहीं हो सका। गृह मंत्री अमित शाह ने नतीजे के बाद कहा कि ये महिलाओं के साथ विपक्ष का अन्याय है और महिलाएं इसे माफ नहीं करेंगी।
सत्ता पक्ष के लिए ये सीधी सियासी चोट है। 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम 454 वोट से पास हुआ था। इस बार परिसीमन जोड़ने पर वही आंकड़ा 298 पर सिमट गया। साफ हो गया कि NDA अपने सांसदों के अलावा बाहर से गिने-चुने वोट ही जुटा पाया। 2014 के बाद भाजपा की पहचान फ्लोर मैनेजमेंट की रही है। इतने वोट से चूक जाना बताता है कि न विपक्ष टूटा, न अपने सारे सांसद सदन में लाए जा सके। ‘मोदी है तो मुमकिन है’ का नारा इस हार से कमजोर पड़ा। महिला वोट बैंक में भी दरार तय है क्योंकि जनता के बीच संदेश यही जाएगा कि भाजपा ने परिसीमन की शर्त लगाकर महिला आरक्षण खुद रुकवा दिया। दक्षिण भारत का गणित और उलझ गया। DMK और BRS पहले से कह रहे थे कि नया परिसीमन दक्षिण के साथ अन्याय है। वोटिंग का नतीजा बताता है कि पूरा दक्षिण विपक्ष के साथ खड़ा हो गया। बंगाल और तमिलनाडु में आने वाले चुनावों में भाजपा के लिए बचाव मुश्किल होगा। 2029 का सपना भी बिखर गया। 850 सीटों वाली नई संसद और ‘नए भारत’ की बात इसी बिल पर टिकी थी। बिल गिरने से 2029 का चुनाव भी पुरानी 543 सीटों पर ही होगा और विपक्ष कहेगा कि सरकार बड़ी-बड़ी बात करती है, करती कुछ नहीं।
विपक्ष के लिए भी ये जीत जश्न वाली नहीं है। 230 वोट जुटाकर उसने एकजुटता तो दिखाई पर अपने दामन पर महिला आरक्षण विरोधी का ठप्पा भी लगवा लिया। 2023 में कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष ने 454 वोट से बिल पास कराया था। आज उसी विपक्ष ने बिल गिरा दिया। भाजपा अब हर मंच पर पूछेगी कि पहले हाँ और अब ना क्यों। OBC उप-कोटे की मांग पर अड़ी सपा और राजद के लिए भी मुश्किल बढ़ी। बिल गिरने के बाद भाजपा कहेगी कि इन्हें OBC की चिंता नहीं, सिर्फ सरकार गिराने की थी। OBC महिला वोटर के सामने संकट है कि उसका रास्ता किसने रोका। DMK और BRS अपने राज्यों में जरूर हीरो बनेंगे कि उन्होंने सीटें घटने से बचा लीं, पर हिंदी पट्टी में वही दल महिला विरोधी दिखेंगे। राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ने की उनकी कोशिश को झटका लगेगा। जीत के बाद भी विपक्ष के पास जनता के सवाल का जवाब नहीं है कि महिला आरक्षण अब कब और कैसे आएगा। सिर्फ गिरा देना समाधान नहीं होता, इसका ठीकरा भी उसी पर फूटेगा।
असल नुकसान संसद और देश का हुआ। 1996 से लटका बिल 2023 में पास होकर उम्मीद जगा गया था। परिसीमन से जोड़ते ही फिर गिर गया। जनता का भरोसा दोनों पक्षों से उठेगा कि दिल्ली में काम कम, लड़ाई ज्यादा होती है। परिसीमन भी अब अगली जनगणना तक टल गया। उत्तर भारत की बढ़ी आबादी को प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा और दक्षिण को डर रहेगा कि देर-सबेर सीटें घटेंगी। इस झगड़े का फायदा क्षेत्रीय दल उठाएंगे। BJD, YSRCP, TDP ने बिल का समर्थन किया था। अब ये दल भाजपा और कांग्रेस दोनों को घेरेंगे कि राष्ट्रीय दल राज्यों का हित नहीं देखते।
आगे सरकार के पास रास्ता यही बचा है कि परिसीमन को अलग करके 2023 वाला महिला आरक्षण बिल नोटिफाई करे और श्रेय ले, या फिर जरूरी वोट का इंतजाम करके अगले सत्र में दोबारा आए। विपक्ष को अब साबित करना होगा कि वह महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं, सिर्फ परिसीमन के फॉर्मूले के खिलाफ था। 298-230 का ये नतीजा फिलहाल दोनों के लिए हार जैसा है। सत्ता पक्ष वादा पूरा न कर पाने के लिए घिरेगा और विपक्ष महिला विरोध के आरोप में।





