लगातार हो रही बरसात वरदान भी अभिशाप भी

लगातार हो रही बरसात वरदान भी अभिशाप भी

हरहर शम्भू (एम.जे) मुख्य संपादक

बारिश प्रकृति का वरदान है। खेतों में हरियाली, जलाशयों में पानी, भूजल स्तर में सुधार और तपती धरती को राहत—इन सबके पीछे बारिश की बड़ी भूमिका है। लेकिन जब बारिश लगातार होती है और व्यवस्था उसकी रफ्तार के सामने कमजोर पड़ जाती है, तो यही वरदान देखते ही देखते आफत में बदलने लगता है। इस समय लगातार हो रही बारिश ने एक बार फिर हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम बारिश के लिए वास्तव में तैयार हैं?

किसानों के लिए पर्याप्त बारिश किसी सौगात से कम नहीं। खासकर धान जैसी खरीफ फसलों के लिए पानी बेहद जरूरी है। तालाब, कुएं और जलाशय भरते हैं, भूजल को रिचार्ज होने का अवसर मिलता है और आने वाले गर्मी के मौसम के लिए पानी का संकट कुछ हद तक कम हो सकता है। प्रकृति के लिहाज से भी बारिश बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन सवाल यह है कि जब बारिश जरूरत से ज्यादा हो जाए तो हमारी व्यवस्था कितनी तैयार है? शहरों में थोड़ी देर की तेज बारिश के बाद सड़कें तालाब बन जाती हैं। नालियां जाम हो जाती हैं और पानी घरों व दुकानों में घुसने लगता है। ग्रामीण इलाकों में कच्ची सड़कें खराब होती हैं, पुल-पुलिया प्रभावित होते हैं और कई बार गांवों का संपर्क मुख्य मार्गों से टूट जाता है। सबसे बड़ी चिंता किसानों की है। जिस बारिश का किसान इंतजार करता है, वही लगातार बरसने पर उसकी मेहनत पर पानी फेर सकती है। खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहने से फसल खराब होने का खतरा रहता है। ऐसे में मौसम की मार झेल रहे किसान के सामने आर्थिक संकट और गहरा सकता है। बारिश का एक दूसरा गंभीर पहलू स्वास्थ्य से जुड़ा है। जगह-जगह जमा पानी मच्छरों के प्रजनन का कारण बनता है। डेंगू, मलेरिया और अन्य जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे समय में साफ-सफाई और स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता केवल कागजी अभियान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

दरअसल, समस्या केवल बारिश की नहीं है। समस्या हमारी तैयारी और जल प्रबंधन की भी है। हमने शहरों में प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों को संकरा किया, तालाबों और जलस्रोतों की उपेक्षा की, नालियों की नियमित सफाई को गंभीरता से नहीं लिया और कई जगह बिना पर्याप्त ड्रेनेज व्यवस्था के निर्माण कार्य होते रहे। परिणाम सामने है—बारिश होती है तो पानी सड़क पर और सड़क का पानी घरों में दिखाई देता है। अब समय आ गया है कि बारिश को केवल आपदा के रूप में देखने के बजाय इसे जल संरक्षण के अवसर के रूप में भी देखा जाए। बारिश का अतिरिक्त पानी अगर तालाबों, जलाशयों और रिचार्ज सिस्टम तक पहुंचाया जाए तो यही पानी आने वाले समय में जीवनदायी साबित हो सकता है।

प्रशासन की जिम्मेदारी है कि जलभराव वाले स्थानों की पहचान करे, नालियों और नालों की सफाई सुनिश्चित करे, कमजोर पुल-पुलियों की निगरानी करे और आपदा की स्थिति में त्वरित राहत व्यवस्था तैयार रखे। वहीं नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि वे जल निकासी के रास्तों में कचरा न डालें और बारिश के पानी के संरक्षण में सहयोग करें। बारिश को हम नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन बारिश से होने वाले नुकसान को निश्चित रूप से कम कर सकते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हर बारिश के बाद केवल नुकसान का आंकड़ा गिनने के बजाय यह भी पूछा जाए कि आखिर अगली बारिश से पहले हमने क्या तैयारी की? क्योंकि बारिश हर साल आएगी। कभी कम, कभी ज्यादा।

फैसला हमें करना है कि वह हमारे लिए वरदान बनेगी या हमारी अव्यवस्था का आईना।