रायगढ़ बनांचल में सफेद जहर का बढ़ता साम्राज्य

रायगढ़  बनांचल में सफेद जहर का बढ़ता साम्राज्य

रायगढ़ वनांचल में ‘सफेद मौत’ की आहट: क्या खाकी और खादी की सरपरस्ती में लहलहाया अफीम का काला साम्राज्य?

औद्योगिक नगरी के रूप में विख्यात रायगढ़ अब एक ऐसे 'नशीले दलदल' की ओर बढ़ रहा है, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी। जिले के तमनार और लैलूंगा क्षेत्र के घने जंगलों के बीच लहलहाती अफीम की फसल ने न केवल सुरक्षा तंत्र की नींद उड़ा दी है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी एक गहरा जख्म कर दिया है। बीते 72 घंटों में हुई तीन बड़ी कार्रवाइयों ने करोड़ों के अवैध नेटवर्क की पोल खोल दी है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन सच में 'अनजान' था या फिर यह सब 'मौन सहमति' का परिणाम है?

60 हजार पौधे और करोड़ों का कारोबार: तीन दिन की 'सर्जिकल स्ट्राइक'

मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 20 मार्च को आमाघाट में की गई कार्रवाई में 60 हजार से अधिक अफीम के पौधे बरामद किए गए। इसके तुरंत बाद लैलूंगा के मुड़ागांव और नवीन घटगांव में भी इसी तरह की खेती पाई गई। पुलिस ने अब तक मार्शल सांगा, साधराम नागवंशी सहित चार लोगों को सलाखों के पीछे भेजा है, लेकिन असली 'मास्टरमाइंड' अब भी गिरफ्त से बाहर है।

प्रशासन का 'डिफेंस': "यह प्रोफेशनल खेती नहीं है"

इस संवेदनशील मुद्दे पर रायगढ़ कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी और एसएसपी शशि मोहन सिंह ने अपना आधिकारिक पक्ष रखा है।

कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी का कहना है कि प्रशासन पिछले डेढ़ हफ्ते से सीमावर्ती क्षेत्रों का सघन विश्लेषण कर रहा है। उनके अनुसार, यह किसी बड़े गिरोह या प्रोफेशनल सिंडिकेट का काम नहीं लग रहा है, बल्कि स्थानीय किसानों ने अपनी मुख्य फसल के बाद बचे हुए रकबे में लालचवश यह खेती की है। प्रशासन अब दुर्गम इलाकों में निगरानी के लिए ड्रोन तकनीक का सहारा ले रहा है।

एसएसपी शशि मोहन सिंह ने स्पष्ट किया कि आरोपियों के खिलाफ नारकोटिक्स एक्ट (NDPS) की धारा 8B और 18 के तहत कड़ी कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने माना कि दुर्गम रास्तों और वनांचल क्षेत्र होने के कारण निगरानी में चुनौतियां हैं, लेकिन अब मुखबिर तंत्र और कोटवारों को सक्रिय कर दिया गया है।

समाजसेवी राधेश्याम शर्मा का तीखा प्रहार: "जहर तो जहर है, प्रोफेशनल क्या होता है?"

प्रशासन के इन दावों को सामाजिक कार्यकर्ता और समाजसेवी राधेश्याम शर्मा ने सिरे से खारिज करते हुए इसे 'प्रशासनिक विफलता' का सबसे बड़ा उदाहरण बताया है। शर्मा ने कलेक्टर के बयान को 'शर्मनाक' बताते हुए कहा—

"साहब! अफीम की खेती कोई एक दिन में नहीं हो जाती। महीनों तक फसल लहलहाती रही और प्रशासन सोता रहा। कलेक्टर साहब का यह कहना कि यह 'प्रोफेशनल' नहीं है, तस्करों को बचाने जैसा है। जहर चाहे एक बिस्वा में हो या सौ एकड़ में, वह मौत का ही सौदा है।"

शर्मा ने पुलिस विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि रायगढ़ का पुलिस अमला सिर्फ उद्योगपतियों की सेवा और राजनीतिक रसूखदारों की सुरक्षा में लगा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब वनांचल के 10 किलोमीटर अंदर एक आम आदमी नहीं जा पाता, वहाँ इतनी बड़ी खेती बिना पटवारी, कोटवार और स्थानीय सरपंच की मिलीभगत के कैसे संभव है?

खाकी और खादी के संरक्षण की आशंका?

इस अफीम कांड ने सियासत की बिसात भी बिछा दी है। विपक्ष का आरोप है कि छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती इलाकों (ओडिशा और आंध्र प्रदेश बॉर्डर) से जुड़े इस काले कारोबार को सत्ता पक्ष का मौन संरक्षण प्राप्त है। राधेश्याम शर्मा के शब्दों में, "भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे पर नेहरू और पूर्व सरकारों का हवाला देकर सिर्फ हल्की राजनीति कर रहे हैं, जबकि रायगढ़ की युवा पीढ़ी इस जहर की भेंट चढ़ रही है।"

अनुत्तरित सवाल: क्या ड्रोन सर्वे महज दिखावा है?

अखबार के माध्यम से हम कुछ चुभते सवाल जनता और सरकार के सामने रखते हैं:

जब फसल पक कर तैयार हो गई और बाजार में पहुंचने वाली थी, तब प्रशासन को इसकी भनक क्यों लगी?

क्या स्थानीय खुफिया तंत्र (Intelligence) पूरी तरह फेल हो चुका है?

क्यों सिर्फ छोटे किसानों और 'प्यादों' की गिरफ्तारी हो रही है? सिंडिकेट के बड़े चेहरों तक हाथ क्यों नहीं पहुंच रहे?

क्या प्रशासन 'नॉन-प्रोफेशनल' शब्द का इस्तेमाल अपनी जवाबदेही से बचने के लिए कर रहा है?

रायगढ़ में अफीम की यह फसल सिर्फ एक पौधा नहीं, बल्कि प्रशासनिक भ्रष्टाचार और लापरवाही का बीज है। अगर अब भी सख्ती नहीं दिखाई गई, तो यह औद्योगिक जिला जल्द ही 'उड़ता रायगढ़' के रूप में अपनी नई पहचान बना लेगा। एसएसपी और कलेक्टर के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी राधेश्याम शर्मा जैसे समाजसेवियों के उन आरोपों की पुष्टि करती है कि "सिस्टम के फेफड़ों में भ्रष्टाचार का धुआं भर चुका है।"