मौत पर सियासत का स्याह रंग
मौत पर सियासत का स्याह रंग — खबर से पहले खबरदार होना जरूरी
तेरह मई की सुबह एक खबर आई और पूरे देश का मन भारी हो गया। जब किसी घर का चिराग बुझता है तो सबसे पहले शोक की चादर ओढ़ी जाती है, पर हमने क्या देखा? सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पहले ही फैसले सुनाए जाने लगे। किसी ने पत्नी को कठघरे में खड़ा कर दिया, किसी ने परिवार के रिश्तों की परतें उधेड़नी शुरू कर दीं। पर मूल सवाल तो यह है कि जैविक दस्तावेज कुछ भी कहें, प्रतीक मुलायम सिंह के पुत्र ही थे। क्या जीते जी उन्हें वह स्थान, वह सम्मान मिला जिसके वे हकदार थे? सैफई के आंगन में उनकी जगह को लेकर हमेशा कानाफूसी रही। आज जब वे पंचतत्व में विलीन हो गए, तो मुखाग्नि किसने दी इस पर बहस छिड़ गई। पर जिस व्यक्ति को जीते जी पूरा अपनापन न मिल सका, उसकी चिता की अग्नि पर हक जताने से क्या फर्क पड़ता है?
सवाल यह है कि क्या किसी की मौत का सच व्हाट्सएप फॉरवर्ड और प्राइम टाइम डिबेट से तय होगा? डॉक्टर की रिपोर्ट आने से पहले ही हत्या, साजिश और विरासत के बंटवारे की कहानियां चलाना पत्रकारिता नहीं, संवेदनहीनता है।
राजनीति में रिश्ते जटिल होते हैं। पर एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके खून के रिश्ते, सौतेले रिश्ते और ससुराल के फर्ज पर बहस करना मर्यादा के खिलाफ है। जिसने अंतिम संस्कार की अग्नि दी, उसने एक दामाद का नहीं, एक इंसान का फर्ज निभाया।
विरासत का सच यह है कि सियासत में कुर्सी और जमीन बंटती है, नाम नहीं बंटता। मुलायम सिंह यादव का नाम उनके काम से बना है। और प्रतीक? *शरीर तो पंचतत्व में विलीन हो गया, पर समाज की स्मृति से वे विलीन नहीं होंगे। इतिहास में उनका नाम रहेगा - एक ऐसे पुत्र के रूप में जिसे रिश्तों की कसौटी पर बार-बार तौला गया।
मीडिया और सोशल मीडिया को समझना होगा कि मौत ब्रेकिंग न्यूज नहीं होती, ब्रेक लेने का समय होती है। किसी रोती हुई पत्नी के आंसुओं को पिक्सल में तौलना और परिवार की निजी कहानी को मसाला बनाकर परोसना, यह पत्रकारिता को गर्त में ले जा रहा है।
इसलिए भोंपू बजाने से पहले जरा ठहरिए। जिसे जाना था वह चला गया। राजनीति में विरासत बांटी नहीं जाती, कमाई जाती है। और सम्मान? वह तो जीते जी मिल जाए तो इंसान जी जाता है, वरना मरने के बाद श्रद्धांजलि का क्या मोल?





