पूंजीवादी आताताइयों के विरूद्ध विद्रोह की याद दिलाता भूमकाल दिवस

भारत के वास्तविक जननायक और महान क्रान्तिकारियों में से एक अमर शहीद गुण्डाधुर के नेतृत्व में तत्कालीन सम्राज्यवादी आताताइयो से संघर्ष की गौरवशाली वर्षगाँठ आज 10/2 के दिन "भूमकाल" दिवस            

पूंजीवादी आताताइयों के विरूद्ध विद्रोह की याद दिलाता भूमकाल दिवस

नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार) 

यद्यपि भूमकाल संघर्ष को हुए वर्षों बीत गए,परन्तु उसकी प्रासंगिकता आज के परिवेश में भी उतनी ही सार्थक बनी हुई है.जितनी तब के पूंजीवादी शासकों के खिलाफ थी।। तब भी शोषक/शासक वर्ग आदिवासियों के सम्मान और उनकी संस्कृति के साथ उनके अस्तित्व को मिटाने की साजिशे रचने में लगी हुई थी।

तब से लेकर आज तक देश के किसी नागरिक ने यह नही देखा कि कभी हमारे आदिवासी/वनवासी भाई बहन कथित सभ्य समाज के शहरों/कस्बों और उनके संसाधनों में जबरदस्ती कब्जे का प्रयास करते रहे। बजाए इसके शोषक वर्ग ने उनके जगलों,गांवों को लूटने का काम पूरी ताकत से किया। यही नहीं अपने अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई लड़ने वाले वनवासी भाई_बहनों को देश द्रोही,आतंकवादी और माओवादी नाम दे दिया।

आज पुनः काले अंग्रेजों (शोषक वर्ग)से मुक्ति हेतु अस्तित्व की लड़ाई(भूमकाल) को एक बार फिर से नव गुण्डाधुरों के नेतृत्व में लड़े जाने का समय आ चुका है..

बशर्ते इस लड़ाई में हिंसा की जगह प्रतिरोध का माध्यम संगठित रहकर लोकतांत्रिक या संवैधानिक तरीको के सांथ चुना जाए.."जिसमे जनपक्षीय पत्रकारिता,शिक्षा के प्रति जागरूकता,देश के संवैधानिक मुलभुत अधिकारो की पूरी जानकारियां और आम चुनावों में बढ़ चढ़ कर भाग लिया जाए...

इतना सब कुछ इसलिए जरूरी है,क्योंकि दुर्भाग्य से ये काले अंग्रेज अब गोरे-विदेशी नही हैं,,बल्कि हमारे ही समाज का दूषित और शोषक वर्ग का हिस्सा है...और अपनों से अपने अधिकारों के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई में हिंसा की जगह नहीं होती।। हो सकता है संघर्ष बड़ा और कड़ा हो,लेकिन संवैधानिक तरीकों से लड़ कर जितने में कोई संशय नहीं है।।