निजीकरण से देश का हित या अहित
पत्रकार,कभी भी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से चुनी गई सरकार से नही लड़ता है।। बल्कि वो निर्वाचित सरकार के जड़ को दीमक की तरह खोखला करने में लगे भ्रष्ट,निरंकुश,और तानाशाह शासन प्रणाली से संघर्ष करता है... ताकि आम जनों का भरोसा लोकतंत्र पर बनी रहे।लेकिन विडंबना देखिए निर्वाचित सरकार और उसके मंत्री सत्ता गंवाते तक इसे समझ नही पाते हैं।।।
नितिन सिन्हा (संपादक-खबरसार)
आप सरकारी तंत्र के दोष गिनाकर निजीकरण की प्रक्रिया का समर्थन कैसे कर सकते है..?
देश की वर्तमान सरकार जिस तरह से हर क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा दे रही है आने वाले 3 से 4 सालों में भारत का आम नागरिक बोलोविया की जनता की तरह निजीकरण के विरोध में सड़कों पर खड़ा मिलेगा।।
यकीन नही आता तो महज 20 साल पिछे जाकर "बोलिविया में निजीकरण की रफ्तार और उसका दुष्परिणाम"पढ़िए..
सन 1990 के दशक में बोलिविया सरकार के द्वारा पहले देश की सम्पदा फिर धीरे-धीरे सब कुछ निजी क्षेत्र को क्रमवार तरीके से दिया गया। इस दौर में देश मे निजीकरण की सरकारी प्रक्रिया बड़े जोरों पर थी। दशक के अंतिम चरण में आखिरकार सरकार ने पानी का भी निजीकरण कर दिया । 1999 में एक मल्टीनेशनल कंपनी को पानी के सर्वाधिकार बेच दिए गए। शुरवाती कुछ दिनों को छोड़कर पानी के रेट इतने बढ़ गए कि देश मे हाहाकार मच गया।औसतन प्रति मास आधा वेतन लोग पानी के लिए खर्च करने लगे।।
लोग नहरों से पीने का पानी भर कर लाने लगे तो नहरों नदियों पर फ़ौज और पुलिस की तैनाती करवा दी गई।दु खी जनता बारिश का इंतजार कर रही थी तो नया आदेश आ गया कि कोई भी आदमी बारिश का पानी इकठ्ठा न करे ये इस कम्पनी का है।पानी इकठ्ठा करने पर चोरी का केस दर्ज होगा।खैर लोगो के आंखों की पट्टी खुली तो जमकर विरोध हुआ। अनेकों लोगों को गोलियों से भून दिया गया।
क्योंकि पुलिस और फ़ौज कहने के लिए तो सरकार के नियंत्रण में थी पर सरकार जब पूंजीपतियों की जेब में हो तो इस तरह के हालात बनने स्वभाविक थे। वैसे तो बोलिविया जल युद्ध का पूरा विवरण है NCERT के दसवीं कक्षा के किताब में भी वर्णित है।।

परन्तु हम कुछ सीखने या सबक लेने के लिए नही बल्कि परीक्षा में नम्बर लेने के लिए विषय वस्तु को याद करते है| ध्यान रखें निजीकरण आर्थिक विकास शायद करा दे पर नागरिकों की समृद्धि के लिए सरकारी संस्थाओं की उपादेयता हमेशा बनी रहेगी ...
निजीकरण को समझाने का इस दुःखद तस्वीर के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है.....
निजीकरण का सीधा मतलब है अपने हक़ को पूंजीपतियों के हवाले कर देना...
हिन्दू-मुस्लिम,मन्दिर-मस्जिद और राजनीतिक भ्रष्टाचार की आड़ लेकर सत्ता में आई भारत की वर्तमान सत्तारुण पार्टी ने देश को तत्कालीन बोलिविया बनाने का विचार कर लिया है।। जहां स्वत: जनता के विद्रोह के बाद पूर्ववत स्थिति बन जाएगी।। परन्तु तब यहा पर भी विरोध की बड़ी कीमत आम नागरिक को ही चुकाना होगा। अतः सरकारी तंत्र के दोषों को गिना कर अंधे निजीकरण को सही मत ठराइये।।
बोलिविया बनाम भारत में सरकारी निजीकरण ......
कुछ निजीकरण के समर्थक इस बात को लेकर तर्क करते है कि बोलिविया की बात अलग है भारत मे लोकतांत्रिक व्यवस्था है यहां निजीकरण इस हद तक नही होगा कि सरकार के हाँथो से सब कुछ निकल जाए।। उन्हें बताना चाहूंगा कि बोलिविया में भी निजीकरण एक दो दिन या महीने में नही हुआ था। वहां की तत्कालीन सरकार भी वर्तमान में भारत सरकार की तरह धीरे-धीरे लगभग 10 सालों में निजीकरण को देश की व्यवस्था पर पूरी तरह हावी किया था।। सरकार के द्वारा लिए गए निजीकरण के शुरवाती फैसलों के प्रति लोग लम्बे समय तक निष्क्रिय बने रहे,उन्हें ऐसा लग रहा था कि सरकार ऐसे फैसले देशहित में ले रही है। परन्तु जल्द ही उनका भरम टूटा,जब सरकार ने देश मे उपलब्ध पानी को भी एक करार के तहत निजी कम्पनी को सौंप दिया।।
जिसके विरोध में आम जनो के द्वारा ऐतिहासिक हक की लड़ाई लड़ी गई। इसे लड़ने वाले कई बेगुनाहों की जान तक चली गई।। निजीकरण को लेकर आम लोगों के जबरदस्त विरोध से बने हालातों पर काबू पाने के लिए पुलिस को अपने ही देशवासियों पर गोलियां तक चलानी पड़ी. जिसमें बहुत से बेगुनाह लोग मारे गए.इसके चलते साल 2000 के अप्रैल महीने तक हालात कुछ ये थे कि कोचाबांबा समेत कई शहरों की व्यवस्था पूरी तरह से ठप हो गई.
इस स्थिति को देखते हुए सरकार को जल प्रणाली के निजीकरण के अपने फैसले को वापस लेना पड़ा.सरकार ने आम लोगों के द्वारा पहुंचाई गई क्षति के हरजाने के रूप में अदालत में एक याचिका भी दायर की,जिसे भी अज्ञात कारण से सरकार को वापिस लेना पड़ा.
बोलिविया में पैदा हुए इन हालातों को देखते हुए बहुत से देशों ने इसकी निंदा भी की थी.
तब के हालात सीधे-सीधे उस ओर इशारा कर रहे थे कि मौजूदा सरकार लोगों के मौलिक अधिकार देने में पूरी तरह से नाकामयाब साबित हुई थी. नतीजतन देश में हालात इस कदर बेकाबू हुए,कि लोगों को सड़क पर उतरना पड़ा और अंततः सरकार को आप किया फैसला वापस लेना पड़ा।। पर बाद भी काफी समय तक यह जंग जारी रही. जिसके चलते साल 2006 में एक जल मंत्रालय स्थापित किया गया.
इसके 3 वर्ष बाद साल 2009 में बोलीविया के संविधान के तहत जल प्रणाली के निजीकरण की संभावना में छूट दिए जाने का प्रावधान भी दर्ज किया और सरकार ने 2010 में संयुक्त राष्ट्र महासभा से इस अधिकार की सफलतापूर्वक मान्यता भी प्राप्त की।
Battle for Water Rights. (Pic: Truthout)
बोलिविया में निजीकरण के विरोध छिड़ी इस जंग ने दुनिया के समक्ष एक उदाहरण पेश किया,जो ये दिखाता है कि सिर्फ पानी ही नही बल्कि देश की प्राकृतिक सम्पदा पर कड़ा पहरा नहीं लगाया जा सकता.जिस तरह पीने के पानी पर सभी का बराबर का हक है.उसी तरह प्राकृतिक संसाधनों और देश की सार्वजनिक व्यवस्था(कृषि, परिवहन,बैंकिंग,दूरसंचार, शिक्षा,चिकित्सा)पर भी सभी का एक समान अधिकार है।। यदि इन व्यवस्थाओं का निजीकरण कर दिया जाए तो न केवल इसका दुष्प्रभाव आम जनो के जन-जीवन पर पड़ेगा बल्कि देश में आपसी सँघर्ष(गृह युद्ध/विद्रोह)की सम्भावनाएं भी काफी बढ़ जाएगी।





