ठेले गुमटी में नाम बनाम मुहब्बत की दुकान
संकलित लेख : नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार)
भारतीयों में फूट डालने के लिए फिरंगी सरकार एक नया हुक़्म लाई -
"हिंदू चाय अलग बनेगी, मुसलमान चाय अलग बनेगी"
चाय आई:
हिंदू चाय ... जो हिंदू रसोइए द्वारा बनाई जाती
मुसलमान चाय ... जो मुसलमान रसोइए द्वारा बनाई जाती
फिर वो चाय कैदियों में बांट दी जाती ...
ऑब्वियसली, हिंदू चाय हिंदू कैदियों को,
और मुसलमान चाय मुस्लिम कैदियों को
लेकिन भारतीय क्रांतिकारी उसे एक बड़े बर्तन में मिला देते, और फिर उसे आपस में बांटकर पी जाते !
दिल्ली का लाल किला !
आजाद हिंद के क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करके यहीं बंद किया गया था।

लाल किला ट्रायल शुरू होने वाला था।
सहगल, ढिल्लन, शाहनवाज़ की मशहूर तिकड़ी भी यहीं बंद थी ...
जिनका मुकदमा लड़ने के लिए नेहरू ने दशकों बाद अपना वकील वाला चोगा निकाला था।
महात्मा गांधी उन क्रांतिकारियों से मिलने गए।
आजाद हिंद फौज के लोगों ने गांधी जी को बताया, यहां सुबह हांक लगाई जाती है कि हिंदू चाय तैयार है। मुसलमान चाय आ गई है।
क्रांतिकारियों ने बताया, *ये लोग हमको रोज़ सुबह बांटते हैं, जबकि हमारे अंदर कोई भी मंशा नहीं होती, हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं है, फिर भी सरकार का हुक़्म है कि हिंदू चाय अलग बने और मुसलमान चाय अलग बने।*
गांधी जी ने उनसे पूछा, फिर आप क्या करते हैं ?
क्रांतिकारियों ने कहा - *"हमने एक बड़ा सा बर्तन रखा है और उसमें हिंदू चाय और मुसलमान चाय मिला देते हैं और फिर बांट के पी लेते हैं !"*
लाल क़िले से लौटने के बाद गांधी ने बयान दिया - "सुभाष चंद्र बोस एक राष्ट्रवादी नेता हैं और उनका सबसे बड़ा योगदान एक पूरा संगठन खड़ा करना और उसमें हिंदू मुसलमान का भेद मिटा देना है। इसके लिए मैं उन्हें सैल्यूट करता हूं !"
आजाद हिंद फौज के सभी सैनिक बरी हो गए तो कैप्टन प्रेम सहगल, कर्नल गुरुबख्श सिंह ढिल्लन और मेजर जनरल शाहनवाज खान के साथ कई सैनिक गांधी जी से मिलने गए। कर्नल ढिल्लन ने अपनी आत्मकथा ‘फ्रॉम माय बोन्स’ में लिखा है, गांधी जी ने मुस्कुराते हुए पूछा, ”तुम तीनों में से ब्रह्मा, विष्णु महेश कौन-कौन है।”
कर्नल ढिल्लन ने कहा, ”आपने तो हमें इतना बड़ा बना दिया। अब आप ही यह भी तय कर दीजिए।” सब लोग एक साथ हंसने लगे।
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हिंदू चाय, मुसलमान चाय का फिरंगी दौर एक बार फिर से लौट आया है !
नफरत करने के हजार बहाने हैं ! प्रेम और शांति चाहने के भी उतने ही हैं !
अब यह आप पर है कि आप कौन सा बहाना चाहते हैं ... नफरत करने का बहाना या मुहब्बत करने का बहाना ?
*नफरत के बाजार में..., मुहब्बत की दुकान तब से लगती रही है..,,आज फिर लगाने का समय आ गया है,,ताकि सांप्रदायिक नाशुक्रों को उनकी असलियत दिखा दी जाए,,






