जीवनदायी पहाडी़ झरने में घुलता बिष
पश्चिम सिंहभुम: देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए उद्योगों का होना आवश्यक है, और उद्योगों के लिए कच्चामाल। हमारे देश को स्टील, और लोहा के क्षेत्र में मजबूती प्रदान करती लौह अयस्क की खाने देश के विकास के लिए अति आवश्यक है। वही दूसरी ओर यही खाने स्थानीय लोगों के लिए तकलीफदेह साबित हो रही है।
झारखंड के पश्चिम सिंहभूभ जिला में स्थित चिड़िया लौह अयस्क की खान से जुड़ा ऐसा ही एक मामला प्रकाश में आया है।
पहाडियाँ,झरनो और जंगल से पूर्ण प्रकृति की गोद में बसी पश्चिम सिहभूम जिला का यह अंचल बहुत ही सुंदर और मनोरम है।
इन अंचलो में बसने वाले लोग आज भी नदियों और झरनो पर निर्भर है। दुःख की बात यह है कि अमृत तुल्य जीवनदायनी नदियाँ और झरने लौह अयस्क खान की वजह से बिषैले होते जा रहे है।
बरसात के मौसम में नदी और झरना से निकला पानी लाल व प्रदूषित हो जाता है, लेकिन अफसोस इस बात का है कि जनवरी के सुहाने ठंड के मौसम में भी झरना का पानी लौह अयस्क की वजह से लाल हो गई है। स्थानीय ग्रामीण इस झरने का प्रदूषित पानी उपयोग करने के लिए मजबूर है।
'पक्षिमी सिंहभूम जिला अन्तर्गत सारंडा के कलैता गांव क्षेत्र से गुजरने वाली प्राकृतिक झरने का पानी साफ-स्वच्छ है।लेकिन इनदिनो लौह अयस्क खान की वजह से झरने का पानी लाल रंग में रंग कर प्रदूषित हो गया है।
इस झरने के पानी का इस्तेमाल कलैता, मर्चीगडा़, जुम्बईबुरु आदि गांवों के ग्रामीण पीने ,खेती करने, नहाने, धोने,पालतू जानवर को नहाने - धोने, प्यास बुझाने और जंगल के सभी जीव जन्तु करते है।
स्थानीय ग्रामीणों को भय है कि इस नाले के लाल पानी के उपयोग से वह विभिन्न रोगों से ग्रसित हो सकते है। उल्लेखनीय है कि यह झरना किरीबुरु थाना क्षेत्र स्थित सारंडा जंगल की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित एक प्राकृतिक झरना है। झरना का उद्गम स्थल से निकलने वाला जल हर तरह से निर्मल एवं स्वच्छ रहता है। बीच रास्ते में यह जल कहीं खान से निकलने वाली लौह अयस्क के संपर्क में आकर लाल हो रही है। उक्त गांव के लोग इस झरने के लाल पानी से घर के कपड़े, बर्तन धोने के अलावे स्नान करने व पालतू पशुओं के प्यास बुझाने के लिए करते है वहीं जगली जनवार भी इसका सेवन करते हैं।
स्थानीय ग्रामीणों द्वारा
झरने के बगल में एक छोटा गढ्ढा खोदकर जिसे स्थानीय भाषा में "चुआं"कहते है, बनाकर इस लाल पानी को प्राकृतिक तरीके से चुआँ में रिसकर आया साफ पानी लेकर उसे भोजन पकाने व पीने के लिए उपयोग करते हैं।
झरने के पानी में लौह अयस्क मिश्रण होने से आसपास की उपजाऊ भूमि बंजर होती जा रही है। और इस पानी के उपयोग से स्थानीय लोगों के साथ पालतू पशु भी विभिन्न रोंगो से ग्रसित होकर नाना प्रकार के कष्ट उठा रहे है।





