गोलियां किसी की सगी नही है

विडंबना देखिए..कुछ साल पहले सड़क पर होने वाले कथित इंसाफ का उत्सव.."सीरिया,कांगों,सूडान,इराक,पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देशों में मनाया जाता था,आज हमारे देश में भी लोग कुछ इसी तरह से खुश हो रहे हैं"...नितिन सिन्हा

गोलियां किसी की सगी नही है

नितिन सिन्हा (संपादक : खबरसार) 

गोलियां मुसोलिनी और गांधी में फर्क नहीं कर पाई।।उन्होंने लिंकन और कैनेडी को भी नहीं पहचाना,,,फिर भिंडरावाले से लेकर इंदिरा और राजीव के गले भी मिल गईं,,,यहां तक कि वो शेख मुजीबुर्र और बेनजीर के सीने में धड़धड़ाते हुए घुसा दी गई।। इन्ही गोलियों ने स्व.नंद कुमार पटेल जी से लेकर महेंद्र कर्मा के बदन में भी सुराख किया था।। कुछ साल पहले ही गोलियों ने बेबाक लेखिका मरहूम गौरी लंकेश तक को शांत कर दिया था।। आज इन्ही गोलियों ने अपने साथ 35 साल तक  खेल खेलने वाले स्वयंभू माफिया अतीक अहमद का सर भी छेद दिया।

अर्थात समाज सुधार,सत्ता,राजनीति,प्रशासन,प्रतिस्पर्धा,आतंक और व्यापार के अलावा कथित जन क्रांतियों में भी गोलियां का अपना अलग स्थान और खूनी इतिहास रहा है।।

इसलिए गोलियां शोक और चिंता का सबब तो बन सकती,परंतु सभ्य समाज में किसी उत्सव का कारण कभी नहीं बननी चाहिए।।।

अतः होसके तो विकास और अतीक की षड्यंत्र कारी हत्या पर मनन कीजिए,,सरकारी सुरक्षा पर सवाल उठाईए,,परंतु ऐसे मूर्खों की तरह त्योहार मानना कतई उचित नही है।। क्यूंकि लोकतंत्र में न्यायपालिका को ही सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है।।