काकोरी कांड के अमर बलिदानीयो को नमन

काकोरी कांड के अमर बलिदानीयो को नमन

नितिन सिन्हा (संपादक-समाचार सार) की कलम से 

*देश के महान अमर बलिदानियों को सादर नमन.*

आज 19 दिसम्बर का दिन अमर शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल,अमर शहीद अशफ़ाक उल्ला खाँ और अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह जी का बलिदान दिवस है।।

आज ही के दिन याने 19 दिसम्बर 1927 को काकोरी के वीरों को अंग्रेजी सरकार ने फांसी के फंदे पर लटकाया था।

बताता जाता है कि 9 अगस्त 1925 को हुए काकोरी लूट कांड का मुकदमा 10 महीने तक चला था। 

काकोरी ट्रेन डकैती में 10 आदमी ही शामिल थे, लेकिन 40 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया था.अंग्रेजों की इस धरपकड़ से प्रांत में काफी हलचल मच गई थी। प. जवाहरलाल नेहरू, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े-बड़े लोगों ने जेल में क्रांतिकारियों से मुलाकात की और मुकदमा लड़ने में दिलचस्पी दिखाई.

काकोरी कांड का ऐतिहासिक मुकदमा लगभग 10 महीने तक लखनऊ की अदालत रिंग थियेटर में चला(आजकल इस भवन में लखनऊ का प्रधान डाकघर है.). इस पर सरकार का 10 लाख रुपये खर्च हुआ. छह अप्रैल 1927 को इस मुकदमे का फैसला हुआ.जिसमें जज हेमिल्टन ने धारा 121अ,120ब,और 396 के तहत क्रांतिकारियों को सजाएं सुनाईं गई। इस मुकदमे में रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खां को फांसी की सजा सुनाई गई.

जबकि शचीन्द्रनाथ सान्याल को कालेपानी और मन्मथनाथ गुप्त को 14 साल की सजा हुई.योगेशचंद्र चटर्जी,मुकंदीलाल जी, गोविन्द चरणकर, राजकुमार सिंह, रामकृष्ण खत्री को 10-10 साल की सजा हुई. विष्णुशरण दुब्लिश और सुरेशचंद्र भट्टाचार्य को सात और भूपेन्द्रनाथ, रामदुलारे त्रिवेदी और प्रेमकिशन खन्ना को पांच-पांच साल की सजा हुई.
फांसी की सजा की खबर सुनते ही जनता आंदोलन पर उतारू हो गई. अदालत के फैसले के खिलाफ शचीन्द्रनाथ सान्याल और भूपेन्द्रनाथ सान्याल के अलावा सभी ने लखनऊ चीफ कोर्ट में अपील दायर की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

*17 दिसंबर 1927 को सबसे पहले गांडा जेल में राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को फांसी दी गई.*

फांसी के कुछ दिनों पहले ही आपने एक पत्र में अपने मित्र को लिखा था, कि  *‘मालूम होता है कि देश की बलिवेदी को हमारे रक्त की आवश्यता आन पड़ी है.* 

-19 दिसंबर, 1927 को पं. रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फांसी दी गई. उन्होंने अपनी माता को एक पत्र लिखकर देशवासियों के नाम संदेश भेजा था।I  *फांसी के तख्ते की ओर जाते हुए जोर से ‘भारत माता’ और ‘वंदेमातम्’ की जयकार करते रहे. चलते समय उन्होंने कहा था -

*मालिक तेरी रजा रहे और तू ही रहे,*

*बाकी न मैं रहूं, न मेरी आरजू रहे.*

*जब तक कि तन में जान,रगों में लहू रहे*

*तेरा ही हो जिक्र या फिर तेरी ही जुस्तजू रहे.*

फांसी के दरवाजे पर पहुंचकर बिस्मिल ने कहा, *‘मैं ब्रिटिश साम्राज्य का पूर्णतः विनाश चाहता हूं.* और फिर फांसी के तख्ते पर खड़े होकर प्रार्थना और मंत्र का जाप करके वे फंदे पर झूल गए.गोरखपुर की जनता ने उनके शव को लेकर आदर के साथ शहर में घुमाया था.उनकी अर्थी पर इत्र और फूल बरसाए गए थे.

काकोरी कांड के तीसरे शहीद थे, ठाकुर रोशन सिंह जिन्हें इलाहाबाद में फांसी दी गई. उन्होंने अपने मित्र को पत्र लिखते हुए कहा था, *‘हमारे शास्त्रों में लिखा है, जो आदमी धर्मयुद्ध में प्राण देता है, उसकी वही गति होती है,जो जंगल में रहकर तपस्या करने वालों की.’*

अशफाक उल्ला खां काकोरी कांड के चौथे शहीद थे.उन्हें फैजाबाद में फांसी दी गई. वे बहुत खुशी के साथ कुरान शरीफ का बस्ता कंधे पर लटकाए हाजियों की भांति ‘लवेक’ कहते और कलाम पढ़ते फांसी के तख्ते पर गए. तख्ते का उन्होंने चुंबन किया और उपस्थित जनता से कहा, *‘मेरे हाथ इंसानी खून से कभी नहीं रंगे,मेरे ऊपर जो इल्जाम लगाया गया वह गलत है.।

 *खुदा के यहां मेरा इंसाफ होगा.’ और फंदे पर झूल गए. उनका अंतिम गीत थ₹₹₹₹

*"तंग आकर हम भी उनके जुल्म से बेदाद से"*

*"चल दिए सुए अदम जिंदाने फैजाबाद से"*