करदाता: व्यवस्था का मुख्य आधार या उपेक्षित मोहरा

करदाता: व्यवस्था का मुख्य आधार या उपेक्षित मोहरा

देश की वर्तमान आर्थिक नीतियों और कल्याणकारी योजनाओं के केंद्र में जनकल्याण एक महत्वपूर्ण पहलू है। सरकार द्वारा गरीबों को मुफ्त राशन, विभिन्न योजनाओं के तहत वित्तीय सहायता और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए चलाई जा रही योजनाएं सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से आवश्यक हैं। लेकिन इसके साथ ही, इस पूरी व्यवस्था की रीढ़ यानी 'करदाता' (Taxpayer) की स्थिति पर भी गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। आज यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि जो वर्ग देश के खजाने को भरता है, उसे बदले में क्या मिल रहा है? यह विडंबना भारतीय करदाता के जीवन का कड़वा सच बनती जा रही है। व्यवस्था की यह विडंबना किन पहलुओं पर आधारित है?

अहम योगदान, लेकिन उपेक्षा: देश के बजट और विकास कार्यों का एक बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों से आने वाले राजस्व से चलता है। इसके बावजूद, करदाता को न तो सामाजिक सुरक्षा का पर्याप्त सुरक्षा कवच मिलता है और न ही समाज या प्रशासन में वह सम्मानजनक पहचान मिलती है जिसका वह हकदार है। जीवनभर ईमानदारी से टैक्स चुकाने वाला नागरिक जब अपने कामकाजी जीवन से अवकाश ग्रहण करता है, तो सरकार और व्यवस्था की तरफ से उसे कोई विशेष सामाजिक सुरक्षा या पेंशन का संबल नहीं मिलता। महंगाई के इस दौर में वरिष्ठ नागरिकों को अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है। करदाता भारी-भरकम टैक्स चुकाने के बाद भी टूटी सड़कें, प्रदूषित हवा, असुरक्षित सार्वजनिक स्थल और भ्रष्टाचार से ग्रस्त सरकारी दफ्तरों का सामना करने के लिए विवश होता है। उसे अपनी हर बुनियादी जरूरत (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा) के लिए दोबारा अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है। कर चुकाना नागरिक का कर्तव्य है, लेकिन क्या सरकार का यह दायित्व नहीं है कि वह करदाता के जीवन को भी सुगम, सुरक्षित और गरिमामय बनाए? वर्तमान प्रणाली में संबंध पूरी तरह से 'एकतरफा' प्रतीत होता है, जहां कर्तव्य करदाता का है और अधिकार केवल व्यवस्था के पास हैं।

लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा तभी सार्थक हो सकती है जब समाज के हर वर्ग का संतुलन बना रहे। गरीबों का उत्थान जरूरी है, लेकिन इसके लिए देश की अर्थव्यवस्था को गति देने वाले 'मिडिल क्लास' और करदाताओं को बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता। सरकार और नीति-निर्माताओं को इस असंतुलन को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे—जैसे करदाताओं के लिए विशेष स्वास्थ्य बीमा, सेवानिवृत्ति के बाद सामाजिक सुरक्षा योजनाएं और प्रशासनिक तंत्र में उन्हें उचित सम्मान देना। यदि करदाता ही खुद को ठगा हुआ महसूस करेगा, तो दीर्घकाल में देश की आर्थिक नींव डगमगा सकती है।

एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण केवल मुफ्त योजनाओं के सहारे नहीं, बल्कि हर नागरिक के श्रम, ईमानदारी और उसके अधिकारों के परस्पर सम्मान से होता है। समय आ गया है कि देश का पेट भरने और अर्थव्यवस्था को संबल देने वाले करदाता को भी उसकी गरिमा और सुरक्षा का अधिकार मिले।