ओडिशा के व्यंजनों के लिए जीआई टैग की मांग
ओडिशा से कांग्रेस सांसद सप्तगिरि उलाका ने राज्य की प्रसिद्ध पाक एवं जनजातीय विरासत को संरक्षित करने के उद्देश्य से छेना गाजा, दहीबड़ा आलूदम, पखाला भात, छेना झिल्ली और कोरापुट कॉफी को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्रदान करने की मांग की है।
सांसद ने यह मुद्दा लोकसभा में नियम 377 के तहत उठाया।
शुक्रवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर अपनी प्रस्तुति साझा करते हुए उलाका ने कहा कि ओडिशा की समृद्ध खाद्य परंपराएं और वनों पर आधारित उत्पाद, जो पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं, नकल के खिलाफ किसी प्रकार के संरक्षण से वंचित हैं।
उन्होंने कहा कि जीआई मान्यता मिलने से न केवल स्थानीय कारीगरों, किसानों और विक्रेताओं की आजीविका सुरक्षित होगी, बल्कि ओडिशा की संस्कृति और पारंपरिक स्वादों का संरक्षण भी संभव हो सकेगा।
सांसद ने छेना गाजा को “एक कालजयी ओड़िया मिठाई” बताते हुए कहा कि यह कुशल कारीगरों द्वारा हस्तनिर्मित होती है और इसका बनावट व स्वाद राज्य के लिए विशिष्ट है। वहीं, दहीबड़ा आलूदम को उन्होंने “कटक की प्रसिद्ध स्ट्रीट डिश और ओडिशावासियों की सांस्कृतिक भावना” बताया।
उन्होंने यह भी कहा कि छेना झिल्ली, जो “निमापड़ा की शान और मुंह में घुल जाने वाले स्वाद के लिए प्रसिद्ध है”, को पारंपरिक विधि और असली स्वाद बनाए रखने के लिए जीआई संरक्षण की आवश्यकता है।
उलाका ने सारा पापुड़ी, जिसे “ग्रामीण ओडिशा की जड़ों से जुड़ी पारंपरिक मिठाई” बताया, और सरसातिया, जो “वन उपज से बनी एक दुर्लभ जनजातीय व्यंजन” है, की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने तर्क दिया कि जीआई संरक्षण से इन व्यंजनों की विशिष्ट रेसिपी और नाजुक पाक परंपराओं को सुरक्षित रखा जा सकेगा, जो स्वदेशी ज्ञान और आजीविका से गहराई से जुड़ी हैं।
उन्होंने पखाला भात को ओडिशा की पारंपरिक किण्वित चावल की डिश और राज्य की खाद्य संस्कृति का सशक्त प्रतीक बताते हुए कहा कि इसकी सांस्कृतिक पहचान और शुद्धता बनाए रखने के लिए इसे भी जीआई टैग मिलना चाहिए।
इसके अलावा सांसद ने कोरापुट कॉफी का मुद्दा भी उठाया, जो पूर्वी घाट में जनजातीय किसानों द्वारा जैविक तरीके से उगाई जाती है। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर इसकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए जीआई दर्जा मिलने से उत्पादकों को उचित आय और मजबूत ब्रांड पहचान मिलेगी।
वर्तमान में कोरापुट कॉफी अराकू वैली अरेबिका कॉफी के साथ संयुक्त रूप से जीआई टैग साझा करती है।
उलाका ने कहा,
“ये व्यंजन केवल भोजन नहीं हैं, बल्कि समुदायों, कारीगरों और जनजातीय किसानों की विरासत हैं। जीआई मान्यता से प्रामाणिकता की रक्षा होगी, आजीविका को बढ़ावा मिलेगा और राष्ट्रीय स्तर पर ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान सशक्त होगी। मैं सरकार से आग्रह करता हूँ कि समयबद्ध तरीके से जीआई सुविधा प्रक्रिया शुरू की जाए और स्थानीय उत्पादक समूहों व जनजातीय सहकारी समितियों को सहयोग दिया जाए। ओडिशा के स्वाद और विरासत को वह सम्मान मिलना चाहिए जिसके वे हकदार हैं।





