समाजवादी नेता शरद यादव के निधन पर राजनीतिक गलियारों में शोक

समाजवादी नेता शरद यादव के निधन पर राजनीतिक गलियारों में शोक

रामप्रवेश चौधरी (संपादक) 

माननीय शरद यादव सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत संपर्क रखते थे। सुख-दुख में साथ देते थे। वे कई बार मंत्री रहे लेकिन कभी किसी स्तर पर भ्रष्टाचार का आरोप शरद यादव पर नहीं लगा।

महिला आरक्षण का लाभ केवल उच्चवर्णीय महिलाओं तक सीमित न रह जाए इस कारण वे महिलाओं को आरक्षण दिए जाने की स्थिति में उसके भीतर वंचित तबकों  की महिलाओं को आरक्षण देने की वकालत करते थे।

मधु लिमये, सुरेंद्र मोहन और जयपाल रेड्डी उनके बहुत करीबी साथी थे। उन्हें समाजवादी होने के साथ-साथ वीपी सिंह की सामाजिक न्याय टीम के सदस्य के तौर पर रामविलास पासवान, लालू यादव, नीतीश कुमार के साथ देखा जाता था। सामाजिक न्याय के मुद्दे पर उनकी समझ बहुत स्पष्ट थी। जाति व्यवस्था पर हर भाषण में गहरी चोट किया करते थे। समाजवादी होने के साथ-साथ वे कबीरवादी हो गए थे। उनके हर भाषण में कबीर के अचार विचार का उल्लेख होता था। जैसा प्रखर रूप उनका मंडल के समय था, वैसा ही रूप हाल ही में जाति जनगणना के मुद्दे पर देखने को मिला था।

मध्य प्रदेश में पैदा होकर भी उन्होंने बिहार और उत्तरप्रदेश की राजनीति पर पकड़ बनाई थी। वे जनता दल (यू) के अध्यक्ष बने। मधेपुरा ने उन्हें कभी हंसाया कभी रुलाया। जीवन के आखिरी दिन स्वास्थ्य और राजनीतिक दृष्टि से उनके लिए अच्छे नहीं रहे।

जब भी उन्हें किसी श्रद्धांजलि सभा में बुलाया जाता था तब वे हर वक्त कहा करते थे कि मरने के बाद वाहवाही करने की बजाय यदि जीते जी किसी व्यक्ति की पूछ-परख की जाए तो उसकी उम्र बढ़ सकती है।लंबी बीमारी के बाद अधिकतर साथी उन्हें छोड़ गए थे।उनकी कोठी भी छूट गई थी। जो व्यक्ति जीवन भर हजारों-लाखों लोगों की भीड़ में रहा हो उसे अकेला छोड़ दिया जाना किसी सजा से कम नहीं हो सकता। वे एकदम अकेले हो गए थे। 

जब नीतीश कुमार ने वापस भाजपा के साथ जाने का निर्णय लिया तब वे बिना भविष्य की चिंता किए अलग हो गए। अपनी पार्टी बना ली, सदस्यता भी चली गई; अंततः उन्होंने लालू यादव की पार्टी में अपनी पार्टी का विलय कर दिया था। यानी आजीवन समाजवादी राजनीति करते रहे। छात्र जीवन से ही उनका तेवर लगातार बना रहा । वे मानते थे कि मैं नहीं तो महफिल नहीं। यानी जहां पूछ-परख न हो वहां नहीं रहना चाहिए।

अब न शरद यादव रहे न ही उनकी महफिल। उनके साथ नियमित तौर पर मिलने वाले उन्हें सर्वाधिक याद करेंगे। देश उन्हें प्रखर सांसद, सामाजिक न्याय के शानदार योद्धा के तौर पर सदा याद रखेगा। जब वे बोलते थे पूरा सदन उन्हें गंभीरता से सुनता था। जनांदोलनों के सवालों और सामाजिक न्याय के मुद्दों को वे लगातार उठाया करते थे।

पहली बार छात्रनेता के तौर पर जबलपुर के सबसे बड़े नेता गोविंद सेठ को हराने वाले शरद यादव ने संसद की मियाद इमरजेंसी के दौरान बढ़ाए जाने पर मधु लिमये जी के कहने पर संसद से त्याग पत्र देकर राजनीति में सिद्धांत और नैतिकता की सर्वोच्चता को स्थापित किया था ।

बीमारी की हालत में भी वे किसान आंदोलन के लिए चिंतित रहते थे। संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले चल रहे किसान आंदोलन का उन्होंने खुलकर समर्थन किया था। नर्मदा बचाओ आंदोलन के मुद्दों को भी लगातार सदन और सड़क पर उठाया। सामाजिक न्याय के योद्धा के बतौर सभी किस्म की सामाजिक न्याय की ताकतों द्वारा उन्हें नेता माना जाता था। वे बड़े बड़े नेताओं पर दो टूक टिप्पणियां करने में भी माहिर थे। सारांश दैनिक के ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजली।