भगवान् परसूराम केवल ब्राह्मणों के या सबके

परसूराम जयंती बिशेष

भगवान् परसूराम केवल ब्राह्मणों के या सबके

क्या ‘दादा’ कहकर भगवान परशुराम को बांध दिया हमने? क्या वे ब्राह्मणों के  या सबके ?  सहस्रबाहु वध परशुराम-लक्ष्मण संवाद से राममय हो जाने तक की यात्रा घर-घर पहुंचे। 

अक्षय तृतीया के पावन दिन कल भगवान परशुराम की जयंती पर पूरा शहर राममय भी हुआ और परशुराममय भी। सुबह से ही मंदिरों में घंटे बजे। दोपहर होते-होते गलियां अबीर और जयकारों से पट गईं। जगह-जगह भव्य शोभायात्राएं निकलीं। हाथों में भगवा ध्वज, माथे पर चंदन और जुबान पर एक ही नाम था। कोई उन्हें न्याय का देवता कह रहा था तो कोई श्रद्धा से दादा परशुराम कहकर शीश नवा रहा था। युवाओं की टोलियां फरसा लेकर चलीं। बुजुर्गों ने कथा मंडप सजाए। माताओं-बहनों ने भंडारे में प्रसाद बांटा। बच्चों ने झांकियों में धनुष-बाण उठाया। पूरा माहौल ऐसा बना मानो त्रेतायुग लौट आया हो। पर इसी उल्लास के बीच एक सवाल भी हवा में तैरता रहा। क्या दादा कहकर हमने भगवान परशुराम को एक दायरे में बांध दिया है? क्या वे केवल ब्राह्मणों के होकर रह गए हैं या सबके हैं? इस सवाल का उत्तर खोजने के लिए हमें परशुराम को कथा से निकालकर जीवन में लाना होगा। उन्हें रामलीला से निकालकर घर-घर पहुंचाना होगा। क्योंकि जब तक परशुराम केवल कथा में रहेंगे, तब तक उनका फरसा अन्याय पर नहीं चलेगा।

भगवान परशुराम को समझने के लिए पहले उनका परिचय जरूरी है। वे भगवान विष्णु के दस अवतारों में छठे अवतार माने जाते हैं। सप्त चिरंजीवियों में उनका नाम है। इसका अर्थ है कि वे आज भी सशरीर इस धरती पर विद्यमान हैं। पिता ऋषि जमदग्नि थे और माता रेणुका थीं। उनका बचपन का नाम राम था। कैलाश पर भगवान शिव की घोर तपस्या की। भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्हें अपना परशु यानी फरसा भेंट किया। उसी दिन से वे राम से परशुराम हो गए। परशुराम का व्यक्तित्व अद्भुत है। वे जन्म से ब्राह्मण थे पर कर्म से पूर्ण क्षत्रिय। शास्त्रों का ज्ञान उन्हें कंठस्थ था और शस्त्रों का संधान उनकी भुजाओं में बसता था। इसीलिए हमारे ऋषियों ने उन्हें ब्रह्म-क्षत्रिय कहा। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसमें वेद की ऋचाएं भी हैं और युद्ध की हुंकार भी है। उनके जीवन का मूल मंत्र था कि धर्म की रक्षा के लिए यदि हाथ में शस्त्र उठाना पड़े तो वह भी धर्म ही है। अन्याय सहना उनके शब्दकोश में नहीं था। वे मानते थे कि सहना भी पाप है और अन्यायी को दंड न देना उससे भी बड़ा पाप है।

अब प्रश्न उठता है कि एक ब्राह्मण कुल में जन्मे बालक में यह क्षत्रिय तेज आया कहां से। इसका उत्तर पुराणों में मिलता है। परशुराम के नाना राजा प्रसेनजित थे। माता रेणुका क्षत्रिय कुल की कन्या थीं। इससे भी महत्वपूर्ण कथा ऋषि ऋचीक के दो चरु की है। कथा है कि ऋचीक ने अपनी पत्नी सत्यवती और सास के लिए दो अलग चरु तैयार किए। एक चरु में ब्राह्मणोचित गुण डाले और दूसरे में क्षत्रियोचित तेज भरा। उद्देश्य था कि सत्यवती ब्राह्मण पुत्र जने और उसकी माता क्षत्रिय पुत्र जने। पर विधि का विधान देखिए। भूलवश दोनों स्त्रियों ने एक-दूसरे का चरु खा लिया। परिणाम यह हुआ कि सत्यवती की मां गाधि की पत्नी के पुत्र विश्वामित्र में तप और ब्रह्मतेज आया। वे राजा से ऋषि बन गए। और सत्यवती के पुत्र जमदग्नि में क्षत्रिय तेज आ गया। वे ऋषि होकर भी तेजस्वी और योद्धा प्रवृत्ति के हुए। यही तेज कई गुना बढ़कर उनके पुत्र परशुराम में प्रकट हुआ। फिर भगवान शिव से युद्ध-कला और परशु मिलने के बाद तो परशुराम साक्षात काल बन गए। अधर्मियों के लिए यम और धर्म के लिए रक्षक।

परशुराम के जीवन का सबसे निर्णायक प्रसंग कामधेनु गाय से जुड़ा है। जमदग्नि ऋषि के आश्रम में कामधेनु नाम की दिव्य गाय थी। यह कोई साधारण गाय नहीं थी। मान्यता है कि कामधेनु हर मनोकामना पूरी करती थी। जो मांगो वही दे देती थी। एक बार हैहय वंश का प्रतापी राजा सहस्रबाहु अर्जुन अपनी विशाल सेना के साथ जमदग्नि के आश्रम पहुंचा। ऋषि ने कामधेनु के प्रताप से पूरी सेना का भव्य आतिथ्य किया। राजा सहस्रबाहु चकित रह गया। उसने ऋषि से कामधेनु मांग ली। ऋषि जमदग्नि ने विनम्रता से मना कर दिया। कहा कि यह गाय आश्रम की संपत्ति है। यज्ञ और अतिथि सेवा के लिए है। पर सत्ता के मद में चूर सहस्रबाहु ने ऋषि की बात नहीं मानी। उसने बलपूर्वक कामधेनु को ले जाने का प्रयास किया। विरोध करने पर तलवार निकालकर ऋषि जमदग्नि का वध कर दिया। आश्रम में हाहाकार मच गया। माता रेणुका विलाप करने लगीं।

जब परशुराम आश्रम लौटे तो पिता का रक्तरंजित शव देखकर उनका धैर्य टूट गया। माता के आंसू देखकर उनके भीतर का ज्वालामुखी फट पड़ा। उन्होंने उसी क्षण परशु उठाकर प्रतिज्ञा ली। कहा कि जब तक पृथ्वी से ऐसे अहंकारी, अधर्मी और गौ-ब्राह्मण विरोधी क्षत्रियों का नाश नहीं कर दूंगा, तब तक चैन से नहीं बैठूंगा। इसके बाद परशुराम महेंद्र पर्वत से उतरे और सीधे माहिष्मती नगरी पहुंचे। वहां सहस्रबाहु अर्जुन से भीषण युद्ध हुआ। परशुराम ने अपनी परशु से सहस्रबाहु की हजार भुजाएं काट डालीं और उसका वध कर दिया। पर बात यहीं खत्म नहीं हुई। सहस्रबाहु के पुत्रों ने फिर से जमदग्नि आश्रम पर हमला किया। इस बार उन्होंने माता रेणुका के सामने ही ऋषि का सिर काट दिया। यह सुनकर परशुराम का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे 21 बार पृथ्वी को ऐसे आततायी क्षत्रियों से विहीन करेंगे।

अब यहीं से वह विवाद शुरू होता है जिसने परशुराम को सीमाओं में बांधने की कोशिश की। कहा जाता है कि परशुराम ने 21 बार समस्त क्षत्रियों का संहार किया। पर क्या यह सच है? शास्त्रों का गहराई से अध्ययन करें तो बात कुछ और निकलती है। पुराणों में बार-बार ‘हैहय वंश’ और ‘अधर्मी क्षत्रियों’ के संहार की बात है। ‘समस्त क्षत्रियों’ के विनाश का अर्थ विद्वान प्रतीकात्मक मानते हैं। यदि परशुराम ने सचमुच सभी क्षत्रियों को मार डाला होता तो त्रेतायुग में महाराज दशरथ कहां से आते। जनक जैसा विदेह राजा कहां से होता। राम और लक्ष्मण का जन्म ही कैसे होता। द्वापर में भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, शल्य, भगदत्त जैसे महारथी कहां से आते। सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि स्वयं परशुराम ने भीष्म को, द्रोणाचार्य को और कर्ण को शस्त्र विद्या दी। अंगराज कर्ण को तो ब्रह्मास्त्र तक दिया। यदि उनका लक्ष्य क्षत्रिय मात्र का नाश होता तो वे अपने ज्ञान को क्षत्रिय पुत्रों को क्यों सौंपते। इससे स्पष्ट है कि उनका संहार चयनित था। केवल उनके विरुद्ध था जो अधर्म के रास्ते पर थे। जो गाय, ब्राह्मण, स्त्री और निर्बल पर अत्याचार करते थे। जो सत्ता के नशे में धर्म को पैरों तले रौंदते थे। ‘21 बार’ का अर्थ भी 21 पीढ़ियों से लगाया जाता है। कुछ विद्वान इसे 21 बड़े सैन्य अभियानों का संकेत मानते हैं। क्योंकि एक ही जीवन में 21 बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कर संहार करना व्यावहारिक नहीं लगता। परशुराम का उद्देश्य आतंक का नाश था, वर्ण का नहीं।

परशुराम को न्याय का देवता यूं ही नहीं कहा जाता। उन्होंने पिता की हत्या का बदला लिया। पर बदला लेकर रुके नहीं। उन्होंने व्यवस्था बदली। आततायी शासकों का अंत कर धर्मपरायण राजाओं के लिए रास्ता साफ किया। इसके बाद उन्होंने एक और अद्भुत काम किया। उन्होंने समुद्र को पीछे धकेलकर कोंकण, केरल और गोवा की नई भूमि बनाई। उस पूरी भूमि को उन्होंने ब्राह्मणों और ऋषियों को दान कर दिया। ताकि वहां धर्म का शासन चल सके। इसीलिए वे भूमिदाता कहलाए। भृगुवंशी, चितपावन और सारस्वत ब्राह्मण आज भी उन्हें अपना कुलपुरुष मानते हैं। पर क्या इतने से ही परशुराम को एक वर्ग का मान लेना ठीक है? 

यहीं पर हमें ‘दादा’ शब्द पर ठहरना होगा। आज हर दूसरा युवा परशुराम को दादा परशुराम कहता है। सोशल मीडिया पर स्टेटस लगते हैं। गाड़ियों पर स्टिकर चिपके हैं। इसमें प्रेम है। अपनापन है। श्रद्धा है। पर कहीं अनजाने में हम उन्हें छोटा तो नहीं कर रहे। दादा शब्द घर के मुखिया के लिए आता है। दादा परिवार का होता है। पर क्या भगवान परशुराम केवल एक परिवार के हैं। क्या वे केवल एक जाति के हैं। यदि हां, तो फिर उन्होंने भीष्म को धनुर्विद्या क्यों सिखाई। कर्ण को क्यों अपनाया। कर्ण तो सूतपुत्र कहलाता था। पर परशुराम ने उसकी वीरता देखकर उसे गले लगाया। उसे अपना सर्वश्रेष्ठ शस्त्र दिया। इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि परशुराम की दृष्टि में योग्यता का सम्मान था, जन्म का नहीं। उनका फरसा अन्यायी पर चलता था, उसकी जाति पूछकर नहीं चलता था। इसलिए दादा शब्द उन्हें सीमित नहीं करता, बल्कि व्यापक बनाता है। बशर्ते हम दादा का अर्थ समझें। दादा सबका होता है। पूरे कुनबे का होता है। वह डांटता भी है और बचाता भी है। परशुराम वैसे ही दादा हैं। वे सबके हैं। जो धर्म के रास्ते पर है, परशुराम उसके साथ हैं। जो अधर्म पर है, परशुराम का फरसा उसके विरुद्ध है। चाहे वह किसी भी वर्ण, किसी भी जाति, किसी भी पद पर हो।

इस बात को सबसे अच्छे से समझाता है परशुराम-लक्ष्मण संवाद। रामायण की यह घटना केवल एक प्रसंग नहीं है। यह दो युगों का मिलन है। एक अवतार का दूसरे अवतार से संवाद है। जनकपुर में सीता स्वयंवर हुआ। भगवान राम ने शिव धनुष तोड़ दिया। धनुष टूटने की गूंज से परशुराम की समाधि टूट गई। वे क्रोध में भरे जनकपुर पहुंचे। सभा में आते ही गरजे। पूछा कि मेरे आराध्य शिव का धनुष किसने तोड़ा। उनका तेज ऐसा था कि बड़े-बड़े राजा कांप गए। लक्ष्मण से उनकी ठन गई। लक्ष्मण ने व्यंग्य किया। परशुराम ने फरसा उठा लिया। लगा कि अभी अनर्थ हो जाएगा। पर तभी राम सामने आए। उन्होंने विनम्रता से परशुराम को प्रणाम किया। अपना परिचय दिया। परशुराम ने राम की आंखों में देखा। देखते ही पहचान गए। समझ गए कि मेरा काम पूरा हुआ। जिसे धर्म की स्थापना करनी थी, वह आ गया। उन्होंने अपना धनुष राम को दिया। कहा कि अब इसकी तुम्हें जरूरत है। और खुद तपस्या के लिए महेंद्र पर्वत लौट गए। यह प्रसंग बताता है कि परशुराम अहंकारी नहीं थे। वे धर्म के सेवक थे। जैसे ही धर्म का नया रक्षक आ गया, उन्होंने सत्ता हस्तांतरित कर दी। लक्ष्मण का संवाद भी महत्वपूर्ण है। लक्ष्मण क्षत्रिय थे। परशुराम ब्राह्मण। पर टकराव वर्ण का नहीं था। टकराव तेज का तेज से था। और समाधान राम ने निकाला। राम ने दोनों को जोड़ दिया। यही राममय हो जाना है।

परशुराम राममय हो गए। अपना फरसा रख दिया और राम को धनुष सौंप दिया। यही संदेश है। कि जब तक हम वर्ण, जाति, वर्ग में बंटे रहेंगे, तब तक परशुराम कथा बनकर रह जाएंगे। जिस दिन हम राममय हो जाएंगे, उस दिन परशुराम घर-घर पहुंच जाएंगे। क्योंकि रामलीला में ही परशुराम की लीला का जोड़ है। आप कोई भी रामलीला देख लीजिए। धनुष यज्ञ के बिना रामलीला पूरी नहीं होती। और धनुष यज्ञ में परशुराम का आना जरूरी है। बिना परशुराम के राम का धैर्य प्रकट नहीं होता। बिना परशुराम के लक्ष्मण का तेज सामने नहीं आता। बिना परशुराम के सीता स्वयंवर का महात्म्य पूरा नहीं होता। इसका अर्थ यह हुआ कि रामकथा परशुराम के बिना अधूरी है। और परशुराम की कथा राम के बिना अधूरी है। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक ने अन्याय का नाश किया। दूसरे ने धर्म की स्थापना की। एक ने रास्ता साफ किया। दूसरे ने उस पर महल बनाया।

इसलिए हमें परशुराम को कथा से निकालकर व्यवहार में लाना होगा। उन्हें केवल अक्षय तृतीया पर पूजकर भूल नहीं जाना है। उनका फरसा प्रतीक है। वह प्रतीक है अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का। आज समाज में नशा है, भ्रष्टाचार है, बहन-बेटियों पर अत्याचार है, गौ हत्या है, निर्बलों का शोषण है। क्या इन सबके विरुद्ध फरसा उठाना सिर्फ ब्राह्मण का काम है? नहीं। यह हर उस व्यक्ति का काम है जो खुद को सनातनी कहता है। जो खुद को भारतीय कहता है। परशुराम ने सिखाया कि शस्त्र उठाना पाप नहीं है। अन्याय देखकर चुप रहना पाप है। उन्होंने सिखाया कि विद्या दान में वर्ण मत देखो। योग्यता देखो। उन्होंने कर्ण को विद्या दी। उन्होंने भीष्म को अजेय बनाया। उन्होंने द्रोण को आचार्य बनाया। ये तीनों जन्म से ब्राह्मण नहीं थे। पर कर्म से ब्राह्मण से कम नहीं थे। यही परशुराम का सबके होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।

आज जरूरत है कि हम दादा परशुराम को बंधनमुक्त करें। उन्हें घर के एक कोने से निकालकर चौराहे पर लाएं। उन्हें जाति के बंधन से निकालकर धर्म के सिंहासन पर बैठाएं। जब हम कहें दादा परशुराम, तो उसका अर्थ हो सबका दादा। न्याय का दादा। धर्म का दादा। फरसे वाला दादा जो गलत पर वार करे। जब यह भाव जागेगा, तब परशुराम कथा नहीं रहेंगे। वे व्यवस्था बन जाएंगे। तब अक्षय तृतीया पर निकली शोभायात्रा केवल एक दिन की भीड़ नहीं रहेगी। वह साल भर चलने वाला अभियान बन जाएगी। अन्याय के विरुद्ध अभियान। नशे के विरुद्ध अभियान। भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान।

परशुराम जयंती पर हमें संकल्प लेना होगा। कि हम शस्त्र और शास्त्र दोनों साधेंगे। कि हम अन्याय पर मौन नहीं रहेंगे। कि हम योग्यता का सम्मान करेंगे, चाहे वह किसी भी घर में जन्मी हो। कि हम अपने बच्चों को परशुराम-लक्ष्मण संवाद सुनाएंगे। ताकि वे सीखें कि तेज का जवाब विवेक से कैसे दिया जाता है। कि हम राममय होंगे। क्योंकि राममय होना ही परशुराममय होना है। राम ने मर्यादा सिखाई। परशुराम ने मर्यादा तोड़ने वालों को दंड देना सिखाया। दोनों मिलकर ही पूर्ण धर्म बनते हैं।

अंत में फिर वही बात। परशुराम सबके हैं। वे फरसा लेकर इसलिए खड़े हैं ताकि किसी निर्बल को रोना न पड़े। वे चिरंजीवी हैं। इसका अर्थ है कि वे आज भी हैं। कहीं न कहीं। शायद हमारे भीतर। जरूरत है तो बस उन्हें जगाने की। जिस दिन हर घर में एक परशुराम जग जाएगा, उस दिन किसी दादा को जाति में बांधने की जरूरत नहीं पड़ेगी। उस दिन पूरा समाज ही एक कुटुंब बन जाएगा। और उस कुटुंब के मुखिया होंगे दादा परशुराम। सबके दादा। न्याय के दादा। धर्म के दादा।