फर्जी प्रमाणपत्र पर नौकरी कर रही है पूर्व पार्षद इंदुराय
बिसरा पंचायत अंचल में बिसरा के मस्जिद चौक के निकट स्थित सरकारी हिन्दी उच्च प्राथमिक विद्यालय को लेकर साराँश दैनिक में 26 नवम्बर 2023 को एक खबर प्रकाशित की गई थी, जिसका शीर्षक था "क्या बिसरा हिंदी स्कूल में पढा़ रहे है फर्जी शिक्षक "।
नीचे दिए गए लिंक पर जा कर उस खबर को पढ़ा जा सकता है,जिसका शीर्षक है-"क्या बिसरा हिंदी स्कूल में पढा़ रहे है फर्जी शिक्षक "
https://saranshdainik.com/क्या-बिसरा-हिंदी-स्कूल-में-पढा़-रहे-है-फर्जी-शिक्षक
साराँश दैनिक में प्रकाशित यह खबर सच साबित हुई। बिसरा स्थित इस स्कूल (सरकारी हिन्दी उच्च प्राथमिक विद्यालय) में कार्यरत राउरकेला के गोपबंधूपाली निवासी अध्यापिका इंदु राय का प्रमाण पत्र फर्जी साबित हुआ है।
सुचना का अधिकार के तहत बिसरा प्रखंड के खंड़ शिक्षा अधिकारी कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार पूर्व पार्षद इंदुराय ने अध्यापिका के पद पर जिस शैक्षणिक योग्यता के आधार पर नौकरी पाई है, और उन्होने स्वयं को जिस "कलपतरू वाणी बिहार संस्कृत विद्यालय - बसंती कालोनी "से हाई स्कूल परिक्षा पास करना बताया है वह कलपतरू वाणी विहार संस्कृत विद्यालय की वास्तविकता जाँच करने पर पता चला की इस नाम का कोई विद्यालय है ही नहीं। इस बात की पुष्टि खंड़ शिक्षा अधिकारी कार्यालय - बिसरा प्रखंड़ द्वारा भी किया जा चुका है।
इंदुराय के संबंध में राउरकेला नगरपालिका द्वारा इस बात की पुष्टि की गई है कि वह एक बार चुनाव जीतकर गोपबंधुपाली की पार्षद बनी थी।
अध्यापिका के पदपर इंदुराय की नियुक्ति सर्वशिक्षा अभियान के तहत 12-08-2008 को की गई थी। इंदुराय के प्रमाणपत्रो की जांच वर्तमान जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआई आफ स्कूल) कपीलेंद्र मिश्रा ने की थी।

यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि कपिलेंद्र मिश्रा ने एक ऐसे प्रमाण पत्र को किस तरह स्वीकृति दे दी जिसपर अंकित विद्यालय का कोई अस्तित्व ही नहीं है। क्या कपिलेंद्र मिश्रा ने किसी दवाव में ऐसा किया होगा या किसी लालच वस यह जाँच का बिषय है।
या फिर क्या इंदुराय की नियुक्ति में राजनेताओ का हाथ था,ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि इंदुराय चुनाव जीतकर गैपबंधुपाली की पार्षद हुई थी।
अगर ऐसा है तो इस राजतंत्र का खुलकर बिरोध करने की आवश्यकता है। क्योंकि ऐसा कर इंदुराय ने एक योग्य उम्मीदवार का हक ही नहीं मारा है बल्कि कानून और समाज के साथ छल किया है, ऐसी अध्यापिका अपने विद्यार्थीयों को किस तरह की शिक्षा देती होगी इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि पिछले 16 साल से अध्यापिका के पदपर नौकरी कर रही इंदुराय की वास्तविकता का पता शिक्षा विभाग को अबतक कैसे नहीं हो पाई ,या फिर सब जानकर भी अंजान बनी रही संबंधित विभाग क्या इस बिषय को लेकर संबंधित अधिकारियों / विभाग पर जाँच नही होनी चाहिए? क्या दोषियो पर कार्यवाही नहीं होनी चाहिए।





