नये भारत की कसौटी पर सरकार और समाज

मंत्री भाषण देता है — “जीरो टॉलरेंस”, और नीचे जेई उसी ठेकेदार से 10% ले रहा होता है।

नये भारत की कसौटी पर सरकार और समाज

“समान शिक्षा, समान नागरिक संहिता, सबका साथ-सबका विकास” — ये शब्द सुनने में जितने सुंदर हैं, जमीन पर उतने ही सवाल खड़े करते हैं। क्या ये सिर्फ चुनावी नारे हैं जिनसे वोट की फसल काटी जाती है, या वाकई नीति निर्माताओं का स्वप्न हैं जिसे हकीकत बनाना है? आज जब हर भाषण में ‘विकसित भारत 2047’ की बात होती है, तो जनता के मन में एक ही सवाल गूंजता है — परिवर्तन कब और कैसे?

नारा और स्वप्न के बीच की खाई

नारा दिशा देता है, स्वप्न प्रेरणा। पर दोनों को जोड़ने वाला पुल ‘नीति + नीयत + निगरानी’ का होता है। समान शिक्षा की बात करें तो नई शिक्षा नीति 2020 ने ढांचा दिया, पर सरकारी स्कूल में शिक्षक नहीं, लैब नहीं, और निजी स्कूल में फीस की लूट है। ‘समान नागरिक संहिता’ पर विधि आयोग की रिपोर्ट आती-जाती रहती है, पर राजनीतिक इच्छाशक्ति वोटबैंक के डर से कांप जाती है। ‘सबका साथ-सबका विकास’ का दावा है, पर NSSO के आंकड़े बताते हैं कि शीर्ष 10% के पास 57% संपत्ति है और निचले 50% के पास सिर्फ 13%। नारा तब जुमला बन जाता है जब बजट आवंटन, समयसीमा और जवाबदेही तय न हो।

क्या सरकार बदलना ही परिवर्तन है?

1947 से अब तक केंद्र में 17 बार सरकारें बदलीं। राज्यों में तो गिनती मुश्किल है। पर क्या तहसील का बाबू रिश्वत लेना बंद हुआ? क्या थाने में बिना सिफारिश एफआईआर लिखी जाती है? क्या जिला पंचायत की सड़क बनने के बाद टूटनी बंद हुई? इसका जवाब ‘नहीं’ है। क्योंकि हमने सरकारें बदलीं, व्यवस्था नहीं। 

राजनीतिक परिवर्तन के तीन स्तर होते हैं —

पहला: सत्ता परिवर्तन,

दूसरा: नीति परिवर्तन, और

तीसरा: नीयत परिवर्तन।

हम अक्सर पहले स्तर पर रुक जाते हैं। दल बदलता है, चेहरा बदलता है, पर फाइल की गति वही रहती है। असली परिवर्तन तब होगा जब ‘ट्रांसफर-पोस्टिंग उद्योग’, ‘ठेका कमीशन तंत्र’ और ‘तारीख पर तारीख’ की संस्कृति टूटेगी।

भ्रष्ट तंत्र बनाम लोकतंत्र: कौन किस पर भारी?

लालफीताशाही अंग्रेजों की देन थी — नियंत्रण के लिए। आजादी के 78 साल बाद भी वही लालफीता मंत्री की कुर्सी को बांधे हुए है। एक पुल बनाने में 11 विभागों की NOC लगती है। एक गरीब को विधवा पेंशन लेने में 6 महीने लगते हैं। क्यों? क्योंकि तंत्र ने खुद को ‘सुविधा’ से ‘सत्ता’ में बदल लिया है।

राजनेता भी इस जाल में फंसे हैं। चुनाव लड़ने के लिए करोड़ों चाहिए। वो पैसा ठेकेदार, बिल्डर, शराब माफिया देता है। जीतने के बाद मंत्री को उन्हीं का काम करना पड़ता है। इस तरह भ्रष्ट तंत्र राजनेता को कठपुतली बना देता है। फिर मंत्री भाषण देता है — “जीरो टॉलरेंस”, और नीचे जेई उसी ठेकेदार से 10% ले रहा होता है। तंत्र ने लोकतंत्र को हाईजैक कर लिया है।

बयान, वादे और हकीकत: कब तक चलेगा?

लोक-लुभावन वादे लोकतंत्र का हिस्सा हैं। फ्री बिजली, फ्री राशन, सालाना 1 लाख खाते में — ये सब राहत दे सकते हैं, विकास नहीं। विकास का पैमाना है: प्रति व्यक्ति आय, मानव विकास सूचकांक, नवाचार, रोजगार की गुणवत्ता। 

बयान से पेट नहीं भरता। किसान को MSP की कानूनी गारंटी चाहिए, भाषण नहीं। बेरोजगार को स्किल और फैक्ट्री चाहिए, पकौड़ा ज्ञान नहीं। महिला को सुरक्षा और बराबर वेतन चाहिए, सिर्फ ‘नारी शक्ति’ का टैग नहीं। जब तक डिलीवरी मैकेनिज्म ठीक नहीं होगा, जनता 5 साल बाद नया बयानवीर चुन लेगी। पर देश वहीं खड़ा रहेगा।

पड़ोसी देशों से सबक: कौन क्या सिखाता है? 

चीन: एक दल, पर जवाबदेही कड़ी। भ्रष्टाचार पर फांसी तक। नतीजा — 30 साल में 80 करोड़ लोग गरीबी से बाहर। सबक: नीति में निरंतरता और अफसर पर लगाम जरूरी।

बांग्लादेश कपड़ा निर्यात में हमसे आगे निकल गया। कारण — महिला श्रम, सस्ती बिजली, सिंगल विंडो क्लियरेंस। सबक: लोकलुभावन से ज्यादा ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ चाहिए।

श्रीलंका  लोकलुभावन सब्सिडी, बिना राजस्व प्लान। नतीजा — दिवालिया। सबक: फ्री की रेवड़ी से देश चलता नहीं, डूबता है।

पाकिस्तान सेना-राजनीति-धर्म का कॉकटेल। नतीजा — अस्थिरता, कटोरा लेकर IMF के दरवाजे। सबक: संस्थाओं को कमजोर करोगे तो देश कमजोर होगा।

भारत को न चीन बनना है, न श्रीलंका। पर सबक यह है कि लोकतंत्र तभी मजबूत है जब संस्थाएं मजबूत हों — CAG, EC, CBI, न्यायपालिका। अगर इन्हें ‘पिंजरे का तोता’ बनाया, तो खानदानी राज ही चलेगा, नाम चाहे किसी दल का हो।

 खानदानी राज बनाम कैडर राज

आजादी के बाद कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार, राज्यों में क्षेत्रीय क्षत्रपों के परिवार। भाजपा में भी बेटे-बेटियों को टिकट की लाइन लगी है। समाजवादी पार्टी, राजद, डीएमके, शिवसेना — सब जगह वंशवाद। क्यों? क्योंकि पार्टी कार्यकर्ता की जगह ‘परिवार’ सुरक्षित निवेश लगता है।

खानदानी राज का इलाज ‘आंतरिक लोकतंत्र’ है। अमेरिका में प्राइमरी होते हैं, ब्रिटेन में स्थानीय यूनिट सांसद चुनती है। भारत में टिकट दिल्ली/लखनऊ से फिक्स होता है। जब तक बूथ अध्यक्ष को प्रधानमंत्री उम्मीदवार चुनने का अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक लोकतंत्र नाम का रहेगा, काम वंश का होगा।

तो रास्ता क्या है?

शिक्षा = बराबरी की सीढ़ी, सरकारी स्कूलों में कोडिंग, अंग्रेजी, स्किल लैब अनिवार्य। DM की जवाबदेही — हर तिमाही रिपोर्ट सार्वजनिक। निजी स्कूल फीस रेगुलेशन अथॉरिटी।
समान नागरिक संहिता: ड्राफ्ट सार्वजनिक, 6 महीने बहस, फिर संसद। धर्म नहीं, लिंग-न्याय केंद्र में। गोवा मॉडल को आधार बनाएं।
सबका विकास = डेटा विकास हर योजना का सोशल ऑडिट। लाभार्थी का मोबाइल पर SMS — “आपका पैसा आया”। बिचौलिया खत्म।
भ्रष्टाचार पर सर्जिकल स्ट्राइक‌ लोकपाल को जांच-चार्जशीट-जब्ती तीनों का अधिकार। 1 साल में ट्रायल। दोषी की संपत्ति नीलाम कर सड़क बने।
लालफीताशाही की कैंची: एक काम, एक विभाग, एक समयसीमा।  30 दिन में जवाब नहीं तो मंजूर। अफसर की ACR से लिंक।
राजनीतिक फंडिंग सुधार: इलेक्टोरल बॉन्ड खत्म। केवल डिजिटल चंदा, 2000 से ऊपर सब सार्वजनिक। स्टेट फंडिंग ऑफ इलेक्शन शुरू।
नागरिक चार्टर कानूनी: पासपोर्ट 7 दिन, एफआईआर 24 घंटे, पेंशन 30 दिन। देरी पर मुआवजा अफसर की सैलरी से कटे।

जनता की भूमिका: दर्शक से हिस्सेदार तक

लोकतंत्र सिर्फ 5 साल में एक दिन वोट नहीं है। वह रोज का पहरा है। आरटीआई डालिए, सोशल ऑडिट में बैठिए, ग्राम सभा में सवाल पूछिए। बेंदीपुर की सड़क तभी टिकेगी जब गांव के 10 लोग माप लेने जाएं। नाली तभी बहेगी जब मोहल्ला कमेटी ठेकेदार से रजिस्टर मांगे।याद रखिए — नेता डरता है जागरूक वोटर से, न कि विपक्ष से। क्योंकि विपक्ष को मैनेज किया जा सकता है, जनता को नहीं — अगर वह एक हो जाए।बस इतना कहना देश को नारों से चलाने वाले दलों को कुछ तो सोचना ही होगा।
नारा स्वप्न बने, इसके लिए नींद तोड़नी पड़ेगी समान शिक्षा, समान नागरिक संहिता, सबका साथ-सबका विकास’ जुमला भी बन सकता है और युग-परिवर्तन का मंत्र भी। अंतर सिर्फ ‘डिलीवरी’ का है। सरकारें पड़ोस से सबक लें — फ्री की राजनीति से श्रीलंका बनेंगे, कड़े सुधार से चीन-बांग्लादेश।राजनीतिक परिवर्तन केव दल बदलने से नहीं, DNA बदलने से आएगा — तंत्र का, नेता का और हमारा। जब तक फाइल रिश्वत मांगती रहेगी, तब तक खानदानी राज किसी न किसी चेहरे में जिंदा रहेगा।
देश बयानों से नहीं, जवाबदेही से चलता है। अब फैसला हमें करना है — क्या हम अगले 25 साल भी नारे सुनकर ताली बजाएंगे, या स्वप्न को हकीकत बनाने के लिए सरकार की कॉलर पकड़ेंगे?क्योंकि लोकतंत्र में मालिक जनता है। और मालिक सोता है तो नौकर घर बेच देता है।