डीबीएफ और नाबार्ड की परियोजना से 400 से ज्यादा किसान लाभान्वित
डालमिया भारत फाउंडेशन और नाबार्ड की वाडी परियोजना ओडिशा में 400 से अधिक किसानों को सक्षम करेगी l - आदिवासी विकास निधि के तहत परियोजना किसानों के लिए स्थायी आजीविका का निर्माण करती है l - आम, काजू और सब्जियों की विभिन्न किस्मों का रोपण प्रयासों का हिस्सा है l
रामप्रवेश चौधरी (संपादक)
डालमिया सीमेंट (भारत) लिमिटेड (डीसीबीएल) की कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व विभाग (सी.एस.आर) की शाखा डालमिया भारत फाउंडेशन (डीबीएफ) ने नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) के साथ साझेदारी में 9 ग्राम पंचायतों के 400 से अधिक किसानों को लाभान्वित करने के लिए वाडी परियोजना ओडिशा के राजगंगपुर और कुत्रा ब्लॉक में संयुक्त रूप से शुरू की गई है । मुख्य रूप से, भारत में आदिवासी समुदाय अपनी आजीविका के लिए कृषि, वन और पशुधन पर निर्भर हैं और विकास के लिए संसाधनों तक उनकी न्यूनतम पहुंच है। आदिवासी विकास निधि (टीडीएफ) के तहत वाडी परियोजना का उद्देश्य स्थायी कृषि प्रथाओं पर ध्यान देने और स्थायी आजीविका के लिए बेहतर अवसर पैदा करने पर जोर देने के साथ आदिवासी किसानों का एकीकृत विकास करना है।
इस पहल के तहत, किसानों को बागवानी में आम और काजू के बाग उगाने और इंटरक्रॉप्स के रूप में सब्जियां उगाने में सहायता प्राप्त हुई है। जिससे उन्हें 55,000 रुपये की औसत वार्षिक आय प्राप्त होती है और हर साल इसे बढ़ाया जाता है। डीबीएफ ने इन गांवों में आदिवासी विकास और किसानों के गरीबी उन्मूलन में मूल्य श्रृंखला में सुधार के लिए वित्तीय वर्ष 2023-24 में इस कार्यक्रम का विस्तार करने की योजना बनाई है।
डीबीएफ और नाबार्ड इस परियोजना में किसानों को शामिल करने को बढ़ावा देने के लिए ग्राम पंचायतों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करते हैं। डीबीएफ उच्च उपज वाले बीज, ग्राफ्टेड प्लांट, सिंचाई, जीआई मेस वायर फेंसिंग के साथ-साथ वाड़ी विकास और सब्जी की खेती के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करता है। किसानों के लिए प्रशिक्षण कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), सुंदरगढ़ और अन्य सलाहकार प्रशिक्षकों के वैज्ञानिकों द्वारा आयोजित किया जाता है। अब तक आम्रपाली, दसारी, लेंगड़ा जैसे आम के पौधों और V4 किस्मों के काजू की पौधों को बाग विकास के हिस्से के रूप में लगाया गया है। इंटरक्रॉपिंग गतिविधि के लिए बैंगन, टमाटर, लौकी, भिंडी, साग, ककड़ी, धनिया और सूरजमुखी जैसे उच्च उपज वाले बीज प्रदान किए गए हैं। सीमांत फसल के रूप में नींबू, सहजन व सागौन के पौधे रोपे गए हैं। किसानों को विभिन्न गांवों में किसान उत्पादक संगठन के माध्यम से सामूहिक विपणन के माध्यम से अपनी उपज बेचने में भी सहायता प्राप्त होती है।
कुत्रा ब्लॉक के कुआपानी गांव के निवासी सुरेंद्र मालवार इस परियोजना की सफलता की कहानियों में से एक हैं। शारीरिक रूप से अक्षम और एक आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाले सुरेंद्र अपने पांच सदस्यों के परिवार का भरण-पोषण करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। अपने गांव में टीडीएफ वाडी परियोजना के कार्यान्वयन के बाद, उन्होंने उचित बीज और कौशल प्रशिक्षण के साथ वाडी और सब्जी की खेती करने का फैसला किया। उन्होंने अपने पिछले साल के उत्पादन से 27000 रुपये की आय प्राप्त की और इस वर्ष अधिक उपज की उम्मीद कर रहे हैं। आज न केवल उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है बल्कि उनकी उपलब्धि क्षेत्र के कई अन्य किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।
इस पहल पर प्रकाश डालते हुए श्री चेतन श्रीवास्तव, डीसीबीएल के कार्यनिर्वाही निदेशक व राजगांगपुर के ईकाई प्रमुख ने कहा, “डालमिया भारत में, हम जमीनी स्तर पर सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं और सभी के लिए एक स्थायी भविष्य के अवसरों का निर्माण करते हैं। वाडी परियोजना का उद्देश्य इन वंचित आदिवासी समुदाय किसानों की आजीविका में सुधार करना, उनकी खेती की क्षमताओं के साथ-साथ प्रौद्योगिकी और नवाचार को अपनाना है। इससे उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनने और अपने परिवारों के कल्याण में सुधार करने में सहायता मिल सकती है। इस पहल को सफल बनाने में सहयोग के लिए हम नाबार्ड के आभारी हैं। हमें उम्मीद है कि यह परियोजना क्षेत्र के कई और किसानों के जीवन को बेहतर बनाएगी।”
डालमिया भारत फाउंडेशन इस क्षेत्र में वंचित समुदायों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए ओडिशा में कौशल विकास और सतत आजीविका पर ध्यान केंद्रित करते हुए विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है। इनमें स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के माध्यम से किसानों, युवाओं और महिलाओं के लिए सशक्तिकरण कार्यक्रम शामिल हैंl प्रशिक्षण, कौशल विकास, आय-सृजन कार्यक्रम जैसे बकरी पालन, सुअर पालन, मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन, केंचुआ पालन, सामुदायिक नर्सरी आदि भी शामिल हैं।





