टैक्स के मकड़जाल में उलझता आम नागरिक

टैक्स के मकड़जाल में उलझता आम नागरिक

नये यूपीआई नियम को लेकर हमारे देश में बहस छिड़ गई है। इस बिषय पर हर जगह चर्चा आम हो गई है, वही शोसल मिडिया में भी इस बिषय को लेकर तरह तरह के सवालों वाले रील और बातें काफी वायरल हो रही है। सवाल अब भी वही- आखिरकार हमें कितने टैक्स देंने होगें। पहले कमाई पर टैक्स और फिर गाढी कमाई और पाई पाई जोड़ कर जमा किये हुए पैसे खर्च करने पर टैक्स। आईए इसे एक आसान उदाहरण में समझते है।

कर-जाल में उलझा आम नागरिक: कमाई से लेकर खर्च तक, आखिर कितने टैक्स?

सुबह आँख खुलने से लेकर रात को सोने तक और जन्म से लेकर मृत्यु तक, एक आम नागरिक अनगिनत करों (Taxes) के जाल में उलझा हुआ है। आज की अर्थव्यवस्था में यह सवाल हर नागरिक के मन में बार-बार उठता है कि— *"आखिर हमें जीवन में कितने प्रकार के टैक्स देने होंगे?"* इस व्यवस्था को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे सांस लेने के अलावा लगभग हर गतिविधि पर सरकार को कर चुकाना पड़ रहा है। इस व्यवस्था की विडंबना को समझने के लिए एक आम आदमी द्वारा कार खरीदने और उसे चलाने की यात्रा को देखना सबसे बेहतरीन उदाहरण है।

कमाई पर पहला प्रहार: इनकम टैक्स

कर चुकाने की यह कहानी व्यक्ति की जेब में पैसे आने से पहले ही शुरू हो जाती है। जब कोई व्यक्ति अपनी मेहनत से नौकरी करता है या व्यवसाय चलाता है, तो सबसे पहले उसकी कमाई पर आयकर (Income Tax) लगाया जाता है। यानी, धन कमाने के लिए ही सरकार को उसका हिस्सा पहले ही देना पड़ता है।

बचत के पैसों से खरीदारी: जीएसटी (GST) का चक्रव्यूह

जब कोई व्यक्ति अपनी ही मेहनत की कमाई को जोड़कर एक कार खरीदने शोरूम जाता है, तो उसे उस पर भारी-भरकम वस्तु एवं सेवा कर (GST) चुकाना पड़ता है। वाहन के प्रकार और आकार के आधार पर यह टैक्स 28% तक और उस पर अतिरिक्त सेस (Cess) के रूप में हो सकता है। यानी, जिस पैसे पर पहले ही इनकम टैक्स चुकाया जा चुका है, उसी बचे हुए पैसे से खरीदारी करते वक्त एक बार फिर से बड़ा हिस्सा सरकार के खाते में चला जाता है।

सड़क पर उतरते ही करों की बौछार

कार शोरूम से बाहर निकलते ही करों का सिलसिला थमता नहीं है, बल्कि नए रूपों में शुरू हो जाता है:

1. रोड टैक्स (Road Tax): वाहन को राज्य की सड़कों पर चलाने के योग्य बनाने के लिए एकमुश्त रोड टैक्स देना पड़ता है।

2. टोल टैक्स (Toll Tax): जब आप अपनी ही खरीदी हुई कार से एक जिले से दूसरे जिले या एक शहर से दूसरे शहर की यात्रा करते हैं, तो हर कुछ किलोमीटर पर बने टोल प्लाज़ा पर आपको 'टोल टैक्स' चुकाना पड़ता है। यहाँ तक कि खुद द्वारा बनाई गई सड़कों पर चलने के लिए भी नागरिकों को बार-बार कर देना होता है।

3. ईंधन पर कर (Fuel Tax): गाड़ी चलाने के लिए जब आप पेट्रोल या डीज़ल भरवाते हैं, तो उसकी कीमत का एक बहुत बड़ा हिस्सा केंद्रीय उत्पाद शुल्क (Excise Duty) और राज्य वैट (VAT) के रूप में सरकार के पास जाता है। यहाँ विडंबना यह है कि कर चुकाए गए पैसों से खरीदे गए धन (पैसे) से, फिर से कर युक्त ईंधन खरीदा जाता है।

4. बीमा और सर्विसिंग पर कर: गाड़ी की सुरक्षा के लिए बीमा (Car Insurance) करवाना अनिवार्य है, जिस पर 18% की दर से जीएसटी लगता है। इसके बाद गाड़ी की सर्विसिंग और रिपेयरिंग करवाने पर भी लेबर चार्ज और स्पेयर पार्ट्स पर अलग से जीएसटी देना पड़ता है।

आखिर यह सिलसिला कहाँ जाकर थमता है?

यह तो केवल एक कार का उदाहरण है। इसके अलावा घर खरीदने पर स्टाम्प ड्यूटी और प्रॉपर्टी टैक्स, बिजली का बिल भरने पर टैक्स, यहाँ तक कि बाजार से रोजमर्रा की खाने-पीने की चीजें खरीदने पर भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कर वसूला जाता है। एक नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वह जीवन भर सिर्फ कर चुकाने के लिए ही कमा रहा है? नागरिकों को एक तरफ कल्याणकारी योजनाओं और बुनियादी ढांचे (सड़कें, पुल आदि) के विकास के लिए कर देना जरूरी लगता है, वहीं दूसरी ओर हर कदम पर लगने वाले करों का यह बोझ जीवन को भारी और पेचीदा बना देता है।

कर प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जो विकास में सहयोग करे, लेकिन जब वह नागरिकों के लिए हर कदम पर एक परीक्षा बन जाए, तो पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस होती है। सवाल यह है कि क्या विकास और सहूलियत के नाम पर करों का यह अंतहीन चक्र कभी कम होगा, या नागरिक इसी तरह करों के जाल में उलझे रहेंगे?