एनआईटी राउरकेला ने कराया टेराकोटा पर पेटेंट
एनआईटी राउरकेला ने भारत की ब्लैक-पॉटरी ( काला-टेराकोटा शिल्पकला) को पुनर्जीवित करने के लिए ग्रीन टेक्नोलॉजी का पेटेंट कराया,
- *यह उत्पादन प्रक्रिया मिट्टी के पात्रों को पकाने (फायरिंग) की अवधि को 2 दिनों से घटाकर 7 घंटे से भी कम कर देती है, और इस दौरान न तो श्रमिकों के स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, न ही जलवायु पर।
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला (एनआईटी राउरकेला) के शोधकर्ताओं ने काले टेराकोटा उत्पादों के निर्माण की एक पर्यावरण-अनुकूल विधि विकसित की है। यह प्रक्रिया पारंपरिक शिल्पकारों के ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर काले टेराकोटा का सहज और शीघ्र उत्पादन संभव बनाती है।
शोध दल में एनआईटी राउरकेला के सिरेमिक इंजीनियरिंग के प्रोफेसर प्रो. स्वदेश कुमार प्रतिहार के नेतृत्व में वरिष्ठ तकनीकी सहायक श्री शिव कुमार वर्मा और शोध स्नातक डॉ. रूपेश मंडल शामिल हैं जिन्होंने विकसित प्रक्रिया के लिए पेटेंट (पेटेंट संख्या 572754, आवेदन संख्या 202531008090) प्राप्त किया है।
“टेराकोटा” शब्द इटालियन भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है “पकाई की गई मिट्टी”। भारत में इसका व्यापक उपयोग रसोई के बर्तनों, मंदिरों की मूर्तियों, खिलौनें और छत की टाइलों, आदि के निर्माण में किया जाता रहा है। आमतौर पर लाल टेराकोटा के पात्र ज़्यादा प्रचलित है, जो सामान्य मिट्टी को हवा की उपस्थिति में पकाने (फायरिंग) से बनता है। मिट्टी में मौजूद लौह तत्व आग के संपर्क में आने पर ऑक्सीकरण की प्रक्रिया से लाल रंग उत्पन्न करता है। रासायनिक दृष्टि से, फेरिक ऑक्साइड इस लाल रंग के निर्माण के लिए जिम्मेदार होता है। दूसरी ओर, काला टेराकोटा अपने विशिष्ट काले रंग और दर्पण जैसी चमकदार सतह के लिए जाना जाता है।

भारत और इसके पड़ोसी क्षेत्रों में काले मिट्टी के बर्तन (ब्लैक पॉटरी) पीढ़ियों पुरानी तकनीकों से बनाए जाते हैं। ऐसा ही एक उदाहरण उत्तर-प्रदेश की “निज़ामाबाद ब्लैक पॉटरी” है जिसे भारत सरकार द्वारा GI Tag भी प्राप्त है , जहाँ तैयार कच्चे बर्तनों पर स्थानीय मिट्टी और वनस्पति पदार्थों से बने एक विशेष ग्लेज़ की परत चढ़ाई जाती है, जिसे “कबीज़” कहा जाता है। सरसों के तेल से पॉलिश करने पर बर्तनों की सतह पर दर्पण जैसी चमक आ जाती है। इसके बाद इन्हें बंद लोहे के बर्तन में गोबर, भूसा और लकड़ी के बुरादे के साथ पकाया जाता है। सुंदर ब्लैक टेराकोटा बर्तन बनाने के लिए समय, परिश्रम, सतत निगरानी, विशेष प्रकार की मिट्टी, कुशल कारीगरों और ठोस रूप में जैव ईंधन की आवश्यकता होती है।
तिब्बत के निक्सी गाँव में कारीगर मोटे लाल मिट्टी को सफेद रेत और पिसे हुए काले पके क्वार्ट्ज के साथ मिलाकर बर्तन बनाते हैं। पकाने (फायरिंग) की प्रक्रिया के दौरान इन बर्तनों को लकड़ी के लठ्ठों से ढका जाता है, और जब आवश्यक तापमान प्राप्त हो जाता है, तो लकड़ी का बुरादा(सॉ – डस्ट) डालकर आग बुझा दी जाती है। इस अंतिम चरण में उत्पन्न धुआँ मिट्टी के बर्तनों को काला रंग प्रदान करता है।

मौजूदा उत्पादन प्रक्रिया में आमतौर पर खुले गड्ढे में पकाने (ओपन पिट फायरिंग) की प्रक्रिया पूरी करने में लगभग दो दिन लगते हैं। इस दौरान निकलने वाले धुएँ में सल्फर ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें होती हैं, जो पर्यावरण और वहाँ कार्यरत श्रमिकों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालती हैं जैसे, सांस लेने में कठिनाई, आदि।
पीढ़ियों से चली आ रही इन पारंपरिक उत्पादन प्रक्रियाओं की प्रमुख कमियों को दूर करने के साथ-साथ सहज और सस्टेनेबल उत्पादन प्रक्रिया के विकास पर ध्यान केंद्रित करने के उद्देश्य से, प्रो. स्वदेश कुमार प्रतिहार और उनकी टीम द्वारा विकसित पेटेंट की गई उत्पादन विधि ने पूरी फायरिंग प्रक्रिया की अवधि को घटाकर 7 घंटे से भी कम कर दिया है। यह प्रक्रिया श्रमिकों के स्वास्थ्य और जलवायु पर किसी भी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालती।
पेटेंट की गई इस प्रक्रिया के बारे में बताते हुए, एनआईटी राउरकेला के सिरेमिक इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर प्रो. स्वदेश कुमार प्रतिहार ने कहा, “यह सस्टेनेबल उत्पादन प्रक्रिया पारंपरिक शिल्पकारों के ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ती है। इस उत्पादन प्रक्रिया की कुंजी, तैयार किए गए बर्तनों को एक बंद वैक्यूम (वायु-रहित) चैम्बर में अप्रत्यक्ष रूप से पकाने में है। इस पकाने की प्रक्रिया के दौरान कार्बनयुक्त तेल का पाइरोलिसिस (अपघटन) होता है, जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन कालिख उत्पन्न होती है। यह एक अपचायक वातावरण (reducing atmosphere) तैयार करती है, जो बर्तनों के काले रंग के विकास के लिए आवश्यक होता है।”
यह विधि एक-समान रूप से काला रंग और चमकदार सतह प्रदान करती है और इसके लिए खुले चूल्हे, कुशल श्रमिक या विशेष मिट्टी की आवश्यकता नहीं होती। यह प्रक्रिया फायरिंग चक्र की अवधि को काफी कम करती है और बड़ी मात्रा में जैविक पदार्थों को जलाने से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण को समाप्त करती है। पारंपरिक विधियों के विपरीत, यह तकनीक कहीं भी ब्लैक टेराकोटा उत्पादों के निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी साबित हो सकती है।
एनआईटी राउरकेला के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित यह प्रक्रिया पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देती है।





