एनआइटी राउरकेला में मंगल ग्रह के दो दशकों के सैटलाइट डेटा का अध्ययन

एनआइटी राउरकेला में मंगल ग्रह के दो दशकों के सैटलाइट डेटा का अध्ययन

प्रेस विज्ञप्ति - राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राउरकेला। 

एनआईटी राउरकेला के शोध से मंगल ग्रह के मौसम का अधिक सटीक पूर्वानुमान मिलने की संभावना, इससे मंगल के रोबोटिक और मानव मिशन की बेहतर योजना बनेगी

शोधकर्ताओं ने दो दशकों के सैटेलाइट डेटा का अध्ययन किया, जिसकी मदद से मंगल ग्रह के मौसम पूर्वानुमान मॉडलों में सुधार होगा

इन मॉडलों से इस बारे में भी समझ बढ़ेगी कि क्या मंगल ग्रह पर कभी जीवन था ।
राउरकेला, 30 जून 2025 - राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला (एनआईटी राउरकेला) के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया है कि मंगल ग्रह का वातावरण वहां तेजी से घूमते डस्ट डेविल्स, शक्तिशाली धूल के तूफान और सर्वव्यापी पानी बर्फ के बादल से किस तरह प्रभावित हो सकता है। यह अध्ययन यूएई विश्वविद्यालय और चीन के सन यात-सेन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के साथ मिल कर किया गया। रिसर्च टीम ने भारत के मार्स ऑर्बिटर मिशन (एमओएम) सहित कई अन्य मंगल मिशनों से एकत्र 20 से अधिक वर्षों के डेटा का अध्ययन किया है, कि कैसे धूल और पानी बर्फ आपसी प्रतिक्रिया से इस ग्रह की जलवायु और तापमान को प्रभावित करते हैं।
इन प्रक्रियाओं को समझने से मंगल ग्रह के लिए खोजी मिशनों की तैयारी करने में भी मदद मिलेगी। वहां मौसम की प्रक्रिया जान लेने से कई लाभ मिलेंगे जैसे अंतरिक्ष यान की सुरक्षा, भावी अंतरिक्ष यात्रियों की सहायता और फिर इस बारे में बेहतर समझ कि क्या मंगल ग्रह पर कभी जीवन था।

इस शोध के निष्कर्ष शोधपत्र के रूप में एक प्रतिष्ठित पत्रिका न्यू एस्ट्रोनॉमी रिव्यूज़ (इम्पैक्ट फैक्टर 26.8) में प्रकाशित किए गए हैं। यह शोधपत्र पृथ्वी और वायुमंडलीय विज्ञान विभाग के प्रोफेसर जगबंधु पांडा और एनआईटी राउरकेला में उनके शोध छात्र श्री अनिरबन मंडल ने मिल कर लिखा है। इसमें यूएई विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी केंद्र के डॉ. बिजय कुमार गुहा और डॉ. क्लॉस गेबर्ड्ट और चीन के सन यात-सेन विश्वविद्यालय में वायुमंडलीय विज्ञान स्कूल के डॉ. झाओपेंग वू (वर्तमान में चीन विज्ञान अकादमी के भूविज्ञान और भूभौतिकी संस्थान में कार्यरत) का सहयोग रहा है।
मंगल लाल ग्रह के रूप में प्रसिद्ध है और यहां सौर मंडल में मौसम की कुछ सबसे चकित करने वाली घटनाएं होती हैं। स्थानीय और क्षेत्रीय तूफानों से उड़ कर धूल दूर तक जा सकती है और इससे हवा का पैटर्न बिगड़ सकता है। इसके चलते तापमान में बदलाव होता है और कुछ मामलों में मंगल ग्रह के वातावरण में आकस्मिक परिवर्तन भी हो सकता है। एनआईटी राउरकेला के शोधकर्ताओं की प्रमुखता में आयोजित अध्ययन में मंगल ग्रह पर मौसम के तीन प्रमुख तत्वों पर ध्यान केंद्रित किया गया –

डस्ट डेविल्स - ये हवा के छोटे-छोटे घूमते हुए कॉलम हैं जो गर्मियों में आम तौर पर दिखते हैं और उत्तरी गोलार्ध में अधिक बार उत्पन्न होते हैं। हालांकि ये बड़े तूफ़ानों से छोटे होते हैं, लेकिन इनकी धूल  वातावरण में बनी रहती है और इससे सतह की बनावट बदल सकती है।
 बड़े धूल के तूफ़ान - मंगल ग्रह पर बड़े धूल के तूफ़ान उठने की जानकारी है, जो पूरे क्षेत्र या यहाँ तक कि पूरे ग्रह को आच्छादित कर सकते हैं। ये तूफ़ान एक लूप की वजह से आगे बढ़ते हैं जिसमें सूरज की रोशनी धूल को गर्म करती है। इससे वातावरण गर्म होता है, जोरदार हवाएं चलती हैं और इस तरह ज्यादा धूल उड़ती है।
 पानी-बर्फ के बादल - ये पानी के बर्फ कणों से बने पतले, लच्छेदार बादल होते हैं। ये बादल कुछ खास मौसमों में मुख्य रूप से भूमध्य रेखा के पास, ओलंपस मॉन्स जैसे ऊंचे ज्वालामुखियों पर और ध्रुवों के आसपास दिखाई देते हैं।
ये पानी-बर्फ के बादल दो तरह के होते हैं जो अलग-अलग मौसमों में बनते हैं। अपहेलियन क्लाउड बेल्ट गर्मियों में बनते हैं जब मंगल सूर्य से सबसे दूर होता है और पोलर हुड क्लाउड
सर्दियों में बनते हैं। इनका बनना बर्फ पर मौसम के बदलाव और वातावरण में धूल की मात्रा पर निर्भर करता है।
प्रो. जगबंधु पांडा ने इस अध्ययन की अहमियत और प्रभाव के बारे में बताया, ‘‘मंगल के मौसम की आधुनिक भविष्यवाणी करना सिर्फ़ एक वैज्ञानिक शोध नहीं है। इससे लाल ग्रह के भावी मिशनों की सफलता और वहां अतीत और भविष्य में जीवन की जानकारी की बुनियाद समझ सुनिश्चित होगी। बहुत अच्छा होगा कि मंगल के लिए इसरो के अधिक मिशन हों और वह इस तरह के शोध के लिए विश्वविद्यालय व्यवस्था में अधिक निवेश करे। इससे विज्ञान और प्रौद्योगिकी का अधिक विकास होगा।’’
शोधकर्ताओं ने इसके लिए 20 से अधिक वर्षों के इमेजिंग डेटा से पता लगाया है कि कैसे मंगल पर बदलते मौसम के कारण धूल और बादल बनते और चलते हैं। इस निष्कर्ष से मंगल की जलवायु के बारे में मनुष्य के ज्ञान और समझ की नई परिभाषा हो रही है और इसका लाभ लेकर मंगल ग्रह के भावी मौसम का बेहतर पूर्वानुमान मिल सकता है।
लाल ग्रह के लिए मिशनों की संख्या बढ़़ रही है। इसलिए वहां के वातावरण में होते निरंतर बदलावों की महत्वपूर्ण जानकारियां चाहिए, जो इस तरह के दीर्घकालिक अध्ययन से मिलती है।