12 अक्टूबर 1999 की तारीख गवाह है कि कैसे पाकिस्तान में हुआ था तख्ता पलट

12 अक्टूबर 1999 की तारीख गवाह है कि कैसे पाकिस्तान में हुआ था तख्ता पलट

संपादकीय: खाकी और सियासत के बीच उलझा लोकतंत्र—12 अक्टूबर, 1999 का तख्तापलट

इतिहास के पन्नों में 12 अक्टूबर, 1999 की तारीख पाकिस्तान के राजनीतिक और लोकतांत्रिक सफर का एक ऐसा काला अध्याय है, जिसने यह साबित कर दिया कि वहाँ की वास्तविक सत्ता कभी चुने हुए संसदों या प्रधानमंत्रियों के हाथों में नहीं, बल्कि रावलपिंडी के जनरल मुख्यालय (GHQ) की तिजोरी में सुरक्षित रही है। इस दिन देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्फ़ के बीच वर्चस्व की जो खूनी-अदृश्य जंग छिड़ी, उसका अंत एक सनसनीखेज सैनिक तख्तापलट (Coup d'état) के रूप में हुआ।

इस ड्रामे की पटकथा बहुत पहले लिखी जा चुकी थी। मई-जुलाई 1999 के कारगिल युद्ध के बाद से ही सिविल और सैन्य नेतृत्व के बीच अविश्वास की खाई गहरी हो चुकी थी। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और सेना के बीच इस बात को लेकर ठन गई थी कि इस सामरिक और कूटनीतिक फजीहत के लिए असल में जिम्मेदार कौन है? शरीफ सरकार खुद को बचाने और सेना पर अपनी पकड़ मजबूत करने की फिराक में थी, जबकि जनरल मुशर्फ़ अपने प्रभाव को खोने को तैयार नहीं थे।

चरम सीमा तब आई जब 12 अक्टूबर 1999 को जब जनरल मुशर्फ़ श्रीलंका की यात्रा से अपने देश लौट रहे थे, तब पीछे से नवाज शरीफ ने उन्हें उनके पद से बर्खास्त कर दिया और उनकी जगह खुफिया एजेंसी ISI के तत्कालीन प्रमुख ख्वाजा जियाउद्दीन बट को नया सेना प्रमुख नियुक्त करने का आदेश जारी कर दिया। साथ ही, मुशर्फ़ के विमान को पाकिस्तान की जमीन पर उतरने से रोकने के लिए कराची एयरपोर्ट के एयर ट्रैफिक कंट्रोल को निर्देश दे दिए गए।

वह वाकया किसी फिल्मी थ्रिलर से कम नहीं था। हवा में मंडराते जनरल मुशर्फ़ के विमान में ईंधन कम हो रहा था और नीचे पाकिस्तान के हुक्मरान उन्हें गिरफ्तार करने की चाल चल रहे थे। लेकिन, पलक झपकते ही पासा पलट गया। सेना के वरिष्ठ जनरलों और वफादार रेजीमेंट्स ने फौरन हरकत में आते हुए प्रधानमंत्री हाउस, सरकारी टेलीविजन और प्रमुख संचार माध्यमों को अपने कब्जे में ले लिया। कराची एयरपोर्ट पर विमान सुरक्षित उतरा और चंद घंटों के भीतर चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार को बेदखल कर दिया गया। यह एक 'रक्तहीन तख्तापलट' था, जिसने पाकिस्तान को एक बार फिर से प्रत्यक्ष सैन्य शासन की बेड़ियों में जकड़ दिया।

इस घटना के बाद जनरल मुशर्फ़ ने खुद को 'चीफ एग्जीक्यूटिव' घोषित कर दिया और बाद में राष्ट्रपति की कुर्सी पर भी काबिज हो गए। आश्चर्यजनक रूप से, उस वक्त पाकिस्तान की आम जनता ने शुरुआती दौर में इस तख्तापलट का कोई खास विरोध नहीं किया, क्योंकि देश की अवाम राजनेताओं की कथित भ्रष्ट नीतियों और आर्थिक बदहाली से त्रस्त हो चुकी थी। जनता ने यह मान लिया था कि शायद 'वर्दी' ही देश को बचा सकती है—यही पाकिस्तान के लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी रही है।

12 अक्टूबर की घटना सिर्फ नवाज शरीफ की विफलता नहीं थी, बल्कि यह उस व्यवस्था की हार थी जहाँ संस्थान कभी परिपक्व नहीं हो सके। यह तख्तापलट इस बात का गवाह है कि जब राजनेता अपने निजी हितों के लिए संस्थाओं को कमजोर करते हैं, तो तानाशाही ताकतों को स्वतः ही रास्ता मिल जाता है। आज दशकों बाद भी पाकिस्तान की सियासत उसी चौराहे पर खड़ी है, जहाँ लोकतंत्र हर मोड़ पर खाकी की छांव तले सांस लेने को मजबूर दिखाई देता है।