सरंडा में काटे गए पेड़ व की गई कार्यवाही का सच क्या है
गोवर्धन ठाकुर (संवाददाता)
पश्चिम सिंहभूम जिला अंतर्गत आनेवाले मनोहरपूर प्रखंड़ के कोलभंगा गाँव से लगभग 3 किलोमीटर दूर सरंडा में पेडो की कटाई का मामला धीरे धीरे साफ होने लगा है।
खबर है कि सारंडा के अंकुआ कम्पार्टमेंट के जंगलों की कटाई के मास्टरमाइंड को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है। मनोहरपुर प्रखंड के कांडी गांव से चलाई जा रही है, जंगल कटाई का नेटवर्क ,सारंडा वन प्रमंडल के कम्पार्टमेंट संख्या-48 में कोलभंगा गांव से लगभग 3 किलोमीटर पूर्व दिशा के जंगलों को काटकर मैदान, खेत व घर बनाकर बाहरी लोगों को कब्जा दिलाने का मास्टरमाइंट आनंदपुर प्रखंड के हरता पंचायत अन्तर्गत कांडी गांव निवासी एक वृद्ध है। कांडी गांव से ही इस अवैध जंगल कटाई का पूरा नेटवर्क चलाया जा रहा है.श। इसी वृद्ध के संरक्षण व आदेशानुसार सारंडा के हरे-भरे जंगलों को काटकर न सिर्फ मैदान बनाकर पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है, बल्कि वन भूमि पर अवैध कब्जा जमाने का कार्य किया जा रहा है. हालांकि वन विभाग, पुलिस व केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल ( सीआरपीएफ )की संयुक्त कार्यवाही के बाद इस कार्य पर तो तात्कालिक विराम लग गया है, लेकिन बिभिन्न सूत्रों के माध्यम से जो बाते छनकर सामने आ रही है, उसके अनुसार यह स्थायी विराम नहीं है।कहा जा रहा है कि कांडी गांव निवासी उक्त वृद्ध को इस काम में एक बडे़ व प्रभावशाली राजनैतिक नेता का संरक्षण प्राप्त है. जिस वजह से उसे ऐसा कृत्य करने के प्रति कानून का थोड़ा भी भय नहीं है। उल्लेखनीय है कि सरकार ने वर्ष 2005 से पहले जंगलों में जंगल काटकर बसे लोगों को वनाधिकार कानून के तहत वन भूमि का पट्टा जीविकोपार्जन हेतु देने का प्रावधान किया है। वर्ष 2005 के बाद अगर कोई जंगल काटता है, या वन भूमि पर कब्जा करता है तो उसे इसका लाभ नहीं मिलेगा, बल्कि वन विभाग के कडे़ कानूनों के तहत ऐसे लोगों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने का प्रावधान है. वन अधिकार अधिनियम में यह भी प्रावधान किया गया है कि वर्ष 2005 से पहले जंगल काट कर बसे गांव के ग्रामीण और वनों की कटाई नहीं करेंगे. वह आसपास के जंगलों की खुद रक्षा करेंगे एवं बाहरी माफियाओं से जंगलों को काटने से बचायेंगे, उन्हें भगायेंगे. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उनके खिलाफ भी जबाबदेही तय करते हुये उन्हें दी गई वन भूमि का पट्टा रद्द करने की कार्यवाही वन विभाग कर सकती है। हालांकि सारंडा में दर्जनों इन्क्रोचमेंट गांव वर्ष 2005 से बसे हैं, जिनको सरकार आज तक वनाधिकार का पट्टा नहीं दे पायी है कांडी गांव के उक्त वृद्ध जिसने व्यक्तिगत लोभ के कारण दर्जनों भोले भाले ग्रामीण को गुमराह कर जंगल कटाई के अपराध में झोंककर उनका आर्थिक व श्रम शक्ति का भारी नुकसान करा रहा है, क्या वह गारंटी लेगा कि इन ग्रामीणों को वह वर्ष 2005 के बाद जंगल काटने के एवज में काटे गये वन भूमि पर कब्जा अथवा वनाधिकार का पट्टा दिला देगा! ऐसा किसी भी स्थिति में संभव नहीं होगा, क्योंकि सरकार व वन विभाग सेटेलाइट इमेजरी व जीपीएस आदि तकनीक के माध्यम से पहले ही सारंडा समेत सारे जंगलों का सर्वे कर चुकी है. सरकार व वन विभाग के पास पूरा आंकड़ा है कि वर्ष 2005 से पहले कितनै जंगल काटे गये, जंगल में कहां-कहां अवैध बस्ती बसाये गये हैं.दूसरी तरफ कोलभंगा के जंगलों को बाहर से आये लोगों द्वारा काटे जाने से आसपास के गांवों जैसे गिंडुंग, कोलभंगा, लाईलोर आदि के ग्रामीणों में भारी आक्रोश है. ग्रामीण सूत्रों का कहना है कि यह जंगल हमारे सीमाना में है, जिसपर पहला अधिकार हमारा है. भविष्य में हमारा परिवार, बाल-बच्चों की संख्या बढे़गी. हम कहां जायेंगे. ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग जंगल काटने वाले लोगों पर सीधे कार्यवाही नहीं कर उनके साथ बैठकर वार्ता कर सिर्फ हटाने का काम किया। इससे ऐसे तत्वों का मनोबल बढे़गा. वन विभाग जंगल जंगल वनों को काटने वालों की खोज करती है. जब एक साथ काटने वाले लोग पारम्परिक औजार, मोटरसाईकल आदि के साथ पकडे़ गये तो उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया।यह दुर्भाग्य की बात है।जबकि कोई अगर एक हरे पेड़ भी काट दे तो वन विभाग उसे गिरफ्तार कर जेल भेज देती है। इस जंगल कटाई का मास्टरमाइंड समेत इसमें शामिल सभी को नामजद आरोपी बनाकर कानूनी कार्यवाही करे। अन्यथा सारंडा जंगल की कटाई की घटना विभिन्न कम्पार्टमेंट व हिस्सों में बढ़ सकती है. ग्रामीणों ने कहा कि वन अधिकार समिति का गठन गांव गांव स्तर पर सरकार करवा रही है. फिर पहले से वनों में रहने वालों को वनाधिकार का पट्टा क्यों नहीं दे रही है. उन्हें पट्टा देकर बाकी बचे वनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उन गांवों के ग्रामीणों के हाथों सौंपने का कार्य करे, जिससे जंगलों की अवैध कटाई को रोका जा सके।





