शिलानंद लकड़ा: ओलिंपिक खेलने  का सपना मन में है

शिलानंद लकड़ा: ओलिंपिक खेलने  का सपना मन में है

सतीश शर्मा (उप संपादक) 

इसी महीने जापान में संपन्न 20वें एशियाई खेलों में भारतीय हॉकी दल के सदस्य के रूप में ओडिशा के तीन (एक महिला व दो पुरुष)  हॉकी खिलाड़ी स्वर्ण पदक जीतकर लौटे हैं। राउरकेला स्थित सेल हॉकी एकेडमी में प्रशिक्षित शिलानंद लकड़ा के लिए वर्षों के संघर्ष के बाद मिली यह स्वर्णिम सफलता उनके करियर की अबतक की सबसे बड़ी उपलब्धि है। 
 अपने आक्रमक खेल और घुंघराले बालों पर बांधे हेडबैंड की वजह से मैदान में अलग दिखने वाले शिलानंद स्वर्ण पदक से बहुत खुश हैं पर संतुष्ट नहीं है। उनकी निगाहें अब इससे आगे 2028 के लॉस एंजिलिस ओलंपिक में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व के लक्ष्य पर टिक गई हैं। 
उनका कहना है, "आप कितने भी अंतरराष्ट्रीय मैच खेल लें, ओलिंपिक  में खेले बिना सब कुछ अधूरा लगता है।"

प्रतिभा के बावजूद लंबा संघर्ष

सुंदरगढ़ जिले के कलीजापत्थर गांव (कुतरा प्रखंड) में जन्मे शिलानंद 2015 में राउरकेला स्थित सेल हॉकी अकादमी में प्रवेश करने के बाद प्रशिक्षण प्राप्त किया। दो वर्ष बाद 2017 में भारतीय जूनियर टीम में पदार्पण करने के बाद उन्होंने सुल्तान जोहोर कप (मलेशिया)  में कांस्य और 2018 में रजत पदक जीता। एक वर्ष बाद ही 2018 में उन्हें सीनियर भारतीय टीम में खेलने का अवसर मिला। वर्ष 2025 में राजगीर (बिहार) में आयोजित एशिया कप में स्वर्ण पदक विजेता  भारतीय टीम का भी वे हिस्सा रहे।
अब तक वह जूनियर भारतीय टीम के लिए 18 और सीनियर टीम के लिए 81 अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुके हैं। प्रो लीग और विश्व कप जैसी प्रतियोगिताओं में भागीदारी ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय हॉकी का महत्वपूर्ण अनुभव दिया है।

ओडिशा के आदिवासी समुदाय ने  भारतीय हॉकी को अनेक प्रतिभाशाली खिलाड़ी दिए हैं। परंपरागत रूप से आदिवासी  खिलाड़ियों ने रक्षापंक्ति और मिडफील्ड में अपनी पहचान बनाई है। लेकिन इसी समुदाय के 27 वर्षीय शिलानंद लकड़ा भारतीय हॉकी की अग्रिम पंक्ति में अपनी आक्रामक खेल शैली से अलग पहचान बना रहे हैं। उनकी असली ताकत तेज रफ्तार, फुर्ती,
आक्रामक खेल और विरोधी रक्षापंक्ति को भेदते हुए गोल करने की क्षमता में छिपी हुई है। परंतु प्रचुर प्रतिभा के बावजूद सीनियर टीम में स्थायी स्थान बनाने के लिए उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ा। कभी चयनकर्ताओं की अनदेखी तो कभी चोटों ने उनकी राह में बाधा डाली। वर्ष 2021 के टोक्यो ओलंपिक के समय उन्हें कम अनुभवी माना गया, जबकि 2024 के पेरिस ओलंपिक से पहले चोटिल होने के कारण वह अवसर गंवा बैठे। इन घटनाओं की कसक आज भी उनके मन में है।

फिटनेस पहली प्राथमिकता

अब शिलानंद के सामने अपनी फिटनेस बनाए रखने, लगातार बेहतर प्रदर्शन करने और चयनकर्ताओं का विश्वास जीतने की चुनौती है। एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक उनके सफर का महत्वपूर्ण पड़ाव है, मंजिल नहीं। वह उस सपने को पूरा करना चाहते हैं, जो हर खिलाड़ी के दिल में बसता है—ओलंपिक में भारतीय जर्सी पहनकर देश का प्रतिनिधित्व करना।
एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के साथ भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने लॉस एंजिलिस ओलंपिक के लिए सीधे प्रवेश हासिल किया है। भारतीय पेट्रोलियम निगम में मैनेजर के पद पर कार्यरत शिलानंद के सामने अपना सपना पूरा करने का एक और अवसर आया है।
वह कहते हैं, "फिटनेस मेरी पहली प्राथमिकता है। मुझे अगले दो वर्षों तक पूरी तरह फिट रहना है, ताकि लॉस एंजिलिस में खेल सकूं।"

राउरकेला की सेल हॉकी अकादमी में उनके प्रशिक्षक रहे राजूकांत सैनी भी उनकी प्रतिभा और महत्वाकांक्षा के प्रशंसक हैं। उनका मानना है कि शिलानंद जैसे तेजतर्रार खिलाड़ी को भारतीय टीम में काफी पहले स्थायी स्थान मिल जाना चाहिए था।" शिलानंद इसी महीने जालंधर-मोहाली में आयोजित होने वाले एशियाई चैम्पियन्स ट्रॉफी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले दल में चुने गए हैं। यंहा स्वर्ण पदक जीतना फिलहाल उनका पहला लक्ष्य है और फिर ओलिंपिक का सपना तो साथ चल ही रहा है।