विनोद खन्ना: फिल्मी सितारे से केंद्रीय मंत्री तक

विनोद खन्ना: फिल्मी सितारे से केंद्रीय मंत्री तक

सिनेमा के पर्दे पर अभिनय से लेकर संसद के सदन तक—एक ऐसी शख्सियत जिसने जीवन में कई भूमिकाएं निभाईं।

विशेष लेख | सारांश दैनिक

6 अक्टूबर 1946 को पेशावर में जन्मे विनोद खन्ना भारतीय सिनेमा के उन चुनिंदा सितारों में रहे, जिनकी पहचान केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अभिनेता के रूप में लोकप्रियता हासिल की, अपने करियर के शिखर पर अचानक आध्यात्मिक जीवन की ओर मुड़े, फिर फिल्मों में वापसी की और अंततः राजनीति में प्रवेश कर केंद्रीय मंत्री तथा सांसद के रूप में भी अपनी पहचान बनाई।

विनोद खन्ना ने 1968 में ‘मन का मीत’ से फिल्मी दुनिया में कदम रखा। शुरुआती दौर में उन्हें सहायक और नकारात्मक भूमिकाएं मिलीं, लेकिन उन्होंने इन्हीं किरदारों को अपनी ताकत बना लिया।

‘मेरे अपने’, ‘मेरा गांव मेरा देश’ और ‘अचानक’ जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय की गंभीरता और विविधता को सामने रखा। इसके बाद ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘कुर्बानी’, ‘इनकार’, ‘कुदरत’ और ‘दयावान’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा के प्रमुख सितारों की कतार में ला खड़ा किया। उनकी खासियत यह थी कि वे केवल एक प्रकार के किरदार में बंधकर नहीं रहे। कभी पुलिस अधिकारी, कभी संवेदनशील व्यक्ति, कभी कठोर चरित्र और कभी रोमांटिक नायक—उन्होंने अलग-अलग भूमिकाओं में अपनी छाप छोड़ी।

विनोद खन्ना के जीवन का सबसे असाधारण अध्याय वह था जब उन्होंने 1982 में अपने फिल्मी करियर के शिखर पर फिल्मों से दूरी बना ली और ओशो के आध्यात्मिक समुदाय से जुड़ गए। उस समय वे हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय अभिनेताओं में गिने जाते थे।

उनका यह निर्णय फिल्म उद्योग और उनके प्रशंसकों के लिए अप्रत्याशित था। लेकिन कुछ वर्षों बाद उन्होंने फिर फिल्मों में वापसी की। ‘इंसाफ’, ‘सत्यमेव जयते’, ‘दयावान’, ‘चांदनी’ और ‘जुर्म’ जैसी फिल्मों के माध्यम से उन्होंने साबित किया कि एक कलाकार का सफर किसी एक दौर पर समाप्त नहीं होता। बाद के वर्षों में उन्होंने चरित्र भूमिकाएं भी निभाईं और नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाए रखी। उनकी अंतिम फिल्मी उपस्थिति ‘दिलवाले’ (2015) में रही।

1997 में विनोद खन्ना भारतीय जनता पार्टी से जुड़े और 1998 में पंजाब के गुरदासपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। उन्होंने 1999 में भी यह सीट जीती। 2004 में फिर लोकसभा पहुंचे, 2009 में चुनाव हार गए और 2014 में दोबारा गुरदासपुर से निर्वाचित हुए। यह बदलाव केवल पेशे का बदलाव नहीं था। एक अभिनेता, जिसे करोड़ों लोग पर्दे पर देखते थे, अब जनता के बीच एक जनप्रतिनिधि के रूप में उपस्थित था।

2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में विनोद खन्ना को संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री बनाया गया। बाद में उन्हें विदेश राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी मिली।

विदेश राज्य मंत्री के रूप में उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच सांस्कृतिक संपर्क तथा फिल्म उद्योग के माध्यम से संवाद की संभावनाओं पर भी जोर दिया। सिनेमा की दुनिया से आए होने के कारण वे सांस्कृतिक संवाद की ताकत को अच्छी तरह समझते थे।

विनोद खन्ना की राजनीतिक यात्रा यह भी बताती है कि प्रसिद्धि और जनसेवा एक समान नहीं हैं। अभिनेता के रूप में दर्शकों का प्रेम मिलता है, लेकिन सांसद के रूप में जनता की अपेक्षाओं का सामना करना पड़ता है। उनके राजनीतिक जीवन को लेकर प्रशंसा और आलोचना दोनों हुईं। उनके संसदीय कार्य, क्षेत्र में उनकी उपस्थिति और राजनीतिक सक्रियता पर समय-समय पर सवाल भी उठे। यही लोकतांत्रिक राजनीति की वास्तविकता है—लोकप्रिय व्यक्ति भी जनता और विपक्ष के सवालों से ऊपर नहीं होता।

विनोद खन्ना की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही रही कि उन्होंने जीवन को एक ही पहचान में सीमित नहीं रखा।

अभिनेता—फिर आध्यात्मिक साधक—फिर अभिनेता—और अंततः सांसद व केंद्रीय मंत्री।

उन्होंने लोकप्रियता का शिखर देखा, उससे दूरी बनाई, फिर वापसी की और सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया। यह यात्रा आसान नहीं थी, लेकिन इसी उतार-चढ़ाव ने उनके जीवन को असाधारण बनाया।

27 अप्रैल 2017 को 70 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। भारत सरकार के तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने उन्हें महान फिल्म व्यक्तित्व और सांसद बताते हुए उनके निधन को अपूरणीय क्षति बताया। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी उन्हें बहुआयामी व्यक्तित्व, प्रतिष्ठित अभिनेता, सांसद और केंद्रीय मंत्री के रूप में याद किया।

2018 में उन्हें मरणोपरांत दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया—भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान।

विनोद खन्ना की कहानी केवल एक फिल्म स्टार की कहानी नहीं है। यह उस व्यक्ति की कहानी है जिसने सफलता के बीच स्वयं को तलाशने का निर्णय लिया, फिर अपने पुराने क्षेत्र में लौटकर नई शुरुआत की और अंततः राजनीति के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में अपनी जगह बनाई। उनकी फिल्मों के किरदार आज भी दर्शकों की स्मृति में हैं, लेकिन उनका जीवन इससे बड़ा संदेश देता है—

मनुष्य की पहचान केवल उसके पेशे से नहीं बनती। पहचान बनती है उसके निर्णयों, संघर्षों, बदलावों और समाज के प्रति उसकी भूमिका से।

विनोद खन्ना ने पर्दे पर अनेक किरदार निभाए, लेकिन वास्तविक जीवन में भी उन्होंने कई भूमिकाएं निभाकर एक ऐसी विरासत छोड़ी, जिसमें सिनेमा, आध्यात्मिक खोज और राजनीति—तीनों के रंग दिखाई देते हैं।

विनोद खन्ना आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन भारतीय सिनेमा और सार्वजनिक जीवन के इतिहास में उनका नाम एक ऐसे कलाकार-राजनेता के रूप में दर्ज है, जिसने जिंदगी को केवल एक भूमिका में नहीं जिया।