राष्ट्रीय जूनियर महिला हॉकी ओड़िशा ने फिर निराश किया
सतीश शर्मा (उप संपादक)
पुणे में चल रही 16वीं राष्ट्रीय जूनियर महिला हॉकी चैंपियनशिप में ओडिशा का अभियान एक बार फिर क्वार्टर फाइनल में समाप्त हो गया। 20 अगस्त को पड़ोसी झारखंड ने उसे टाईब्रेकर में 4-3 से हराकर टूर्नामेंट से विदा कर दिया। विडंबना यह है कि पिछले वर्ष भी ओडिशा की टीम क्वार्टर फाइनल में ही बाहर हो गई थी। ओड़िशा केवल क्वार्टर फाइनल में नहीं हारी बल्कि लीग चरण में भी उसे हरियाणा के हाथों 3-0 की हार झेलनी पड़ी थी। अगले मैच में प.बंगाल को 6-0 से हराकर ओड़िशा क्वार्टर फाइनल में प्रवेश कर पाई थी।
छह वर्षों का प्रदर्शन चिंता बढ़ाता है
कोविड महामारी के बाद 2021 से अब तक के जूनियर राष्ट्रीय मुकाबलों पर नजर डालें तो तस्वीर उत्साहजनक नहीं है। पिछले छह वर्षों में ओडिशा की टीम केवल दो बार सेमीफाइनल तक पहुंच सकी है। चार बार उसका सफर क्वार्टर फाइनल में समाप्त हुआ। इस दौरान राज्य के खाते में केवल एक पदक—2022 का कांस्य—आया।यंहा उल्लेखनीय है कि जब राज्य में अधिक सुविधाएं नहीं थी तब 1994, 1999, 2000 और 2002 में ओड़िशा ने ट्रॉफी पर कब्जा किया था।
संसाधनों की कमी नहीं, फिर कमी कहां है?
ओडिशा ने पिछले एक दशक में हॉकी के बुनियादी ढांचे पर जिस तरह निवेश किया है, वह देश में मिसाल है। सुंदरगढ़ जिले के विभिन्न प्रखंडों में सिंथेटिक हॉकी टर्फ तैयार किए गए हैं। गांवों से लेकर शहरों तक बच्चों को खेलने के लिए मैदान मिल रहे हैं। राउरकेला में विश्वस्तरीय बिरसा मुंडा हॉकी स्टेडियम सहित आधुनिक खेल सुविधाएं मौजूद हैं। उच्च प्रदर्शन प्रशिक्षण केंद्र खिलाड़ियों को अत्याधुनिक प्रशिक्षण का अवसर देते हैं। ऐसे में ओडिशा की जूनियर महिला टीम का प्रदर्शन केवल सुविधाओं के अभाव से नहीं समझाया जा सकता। फिर सवाल उठता है—इन तमाम सुविधाओं के बावजूद ओडिशा की जूनियर महिला हॉकी टीम राष्ट्रीय स्तर पर लगातार क्यों पिछड़ रही है? दूसरी ओर झारखंड ने निरंतरता दिखाई है। उसकी टीम पिछले दो वर्षों से राष्ट्रीय चैंपियन बनती आ रही है और इस बार भी सेमीफाइनल में पहुंच गई है। इस वर्ष छत्तीसगढ़ का सेमीफाइनल तक पहुंचना भी ओडिशा के लिए एक और चेतावनी है।
ओडिशा से घटता महिला हॉकी प्रतिनिधित्व
ओडिशा की स्थिति की तुलना भारतीय महिला हॉकी में उसके पुराने योगदान से करें तो तस्वीर और भी गंभीर दिखाई देती है। 2016 रियो ओलंपिक में भारतीय महिला हॉकी टीम में ओडिशा की चार खिलाड़ी थीं। लेकिन आज बेल्जियम और नीदरलैंड में आयोजित विश्व कप में ओडिशा की केवल एक खिलाड़ी भारतीय टीम का हिस्सा है, जबकि झारखंड की चार खिलाड़ी राष्ट्रीय टीम में जगह बना चुकी हैं।
दिलीप तिर्की के सामने बड़ी चुनौती
ओडिशा हॉकी की कमान पूर्व ओलंपियन दिलीप तिर्की जैसे अनुभवी खिलाड़ी के हाथों में है। उनके नेतृत्व में राज्य में हॉकी के लिए संसाधनों और अवसरों की कमी नहीं कही जा सकती।तो फिर राष्ट्रीय जूनियर प्रतियोगिता में बार-बार क्वार्टर फाइनल की बाधा क्यों नहीं टूट रही?इस संबंध में दो पूर्व हॉकी प्रशिक्षकों से बात करने पर दोनों ने ओड़िशा में हॉकी प्रतिभाओं की सराहना करते हुए व्यवस्था में सुधार पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि टीम तैयार करने की प्रक्रिया में ओडिशा को कहीं न कहीं अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा। एक कोच ने कहा कि दल को केवल राष्ट्रीय टूर्नामेंट में जाने से पहले एक दो अन्य राज्यों का दौरा कर वंहा अभ्यास मैच जरूर खेलना चाहिए। ताकि दल की खामियों को परखा जा सके। ओडिशा के पास हॉकी की सबसे बड़ी पूंजी—प्रतिभा और परंपरा—आज भी मौजूद है। जरूरत केवल उस प्रतिभा को सही दिशा देने की है। हॉकी की धरती ओडिशा के पास मैदान बहुत हैं। अब जरूरत उन मैदानों से फिर से ऐसी बेटियों को निकालने की है, जो भारतीय हॉकी की पहचान बन सकें।





