रक्त चाप (ब्लड प्रेशर )के कारण

वर्तमान समय में उच्च रक्तदाब एक गंभीर समस्या बन चुकी है, इस समस्या से पीड़ित कुछ मरीज ऐसे भी हैं जिन्हे चिकित्सक अजीवन औषधि सेवन की सलाह देते हैं।

रक्त चाप (ब्लड प्रेशर )के कारण

वर्तमान समय में उच्च रक्तदाब एक गंभीर समस्या बन चुकी है, इस समस्या से पीड़ित कुछ मरीज ऐसे भी हैं जिन्हे चिकित्सक अजीवन औषधि सेवन की सलाह देते हैं।

प्रश्न यह उठता है कि क्या यह मर्ज ला ईलाज है ।

किसी भी बीमारी को पूरी तरह से ठीक करने के लिए उस बीमारी की जड़ तक जाना /वजह को जानना जरूरी होता है।

 आइए जानते हैं ,उच्च रक्तचाप क्या है और इसके कारण क्या हैं।

जब किसी व्यक्ति का रक्तदाब सामान्य से अधिक हो जाता है तब उसे उच्च रक्तदाब कहा जाता है।
 किसी भी स्वस्थ्य व्यक्ति का समान्य रक्तदाब पारा के 120 से 130 मिलीमीटर सिस्टोलिक प्रेशर और पारा के 80 से 90 मिलीमीटर डायस्टोलिक प्रेशर होता है।

 किसी व्यक्ति में इससे अधिक रक्तदाब का होना उच्च रक्तदाब कहलाता है ।

कारण :-

•जो व्यक्ति मदिरा, चाय, तंबाकू ,काफी आदि का अधिक मात्रा में तथा अधिक समय तक सेवन करते रहता हैं ,उनका रक्तदाब बढ़ जाता है ।

•बहुत से व्यक्तियों की दांतों की जड़ों में पूय (पस)एकत्रित हो जाता है या शरीर के किसी अंग में पूय रहता है तो उसके दुष्प्रभाव से भी रक्तदाब बढ़ जाता है ।

•बहुत से व्यक्तियों की रक्त में किसी प्रकार के विषैले द्रव्य के देर तक रहने से भी रक्तदाब बढ़ जाता है ।

•एलोपैथिक औषधियां-एड्रीनलीन तथा इफेड्रीन का अधिक प्रयोग किया जाता है तो रक्तदाब बढ़ जाता है।

 •शरीर में यूरिक एसिड की वृद्धि अर्थात गठिया की  प्रवृत्ति होने पर भी रक्तदाब बढ़ जाता है ।

•धमनियो में काठिन्य का रोग प्रयाः 50 से 60 वर्ष की आयु में होता है ।संम्भवतः हाइपोथैलमस तथा उसके कारण नाडियों के उत्तेजित रहने से पहले तो बृक्क (किडनी)की धमनियों में जीर्णता का रोग विशेष रूप से आरंभ हो जाता है तदुपरान्त  बृक्क के उपद्रव में रक्तदाब बृद्धि का रोग हो जाता है ।

•इस रोग की उत्पत्ति पैतृक परम्परागत कारणों से भी होती देखी गई है ।

•जब थायराइड ग्रन्थि किसी कारण से अधिक क्रियाशील या निष्क्रिय हो जाती है तब भी रक्त का भार बढ़ जाता है।

 •पिट्यूट्री ग्रन्थि की प्रबलता से भी धमनी संकोच होकर यह रोग उत्पन्न हो जाता है ।

•महिलाओ में रजोधर्म बंद होने पर डिम्ब ग्रन्थियों का स्राव मंद पड़ जाने के कारण भी रक्तदाब बढ़ जाता है।

•बृक्कोचरीय ग्रन्थि के कोटेंक्स में कैंसर या अबुर्द होने अथवा कोई आघात हो जाने से उसके एल्डेस्टेरोन हार्मोन्स की अधिकता के कारण भी शरीर में जल एवं लवण अधिक रुक जाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप रक्तदाब अधिक बढ़ जाता है।

• बड़ी आयु में जब धमनियों का लचीलापन कम हो जाता है तो वे हृदय संकोच के समय फैल नहीं पाती जिससे रक्तभार बढ़ जाता है।

 •जो लोग ब्यायामशील तथा अत्यधिक चिन्तनशील एवं आवेश प्रधान होते हैं उनमे  पैरासिम्पेशिटिक की अपेक्षा सिम्पेशिटिक नाडीयों की प्रबलता रहती है जिससे उसमें रक्तदाब बढ़ जाता है।

 •कपाल के अंदर स्थान घेरने वाले किसी रोग से (चाहे वह अबुर्द हो  अथवा विद्रधि रक्तदाब बढ़ जाता है ।

•वृक्क के लगभग सभी रोगों में जिनमें वृक्क के बहुत बड़े भाग का नाश हो जाता है,उच्च रक्तदाब उत्पन्न हो जाता है ।

•बिना वृक्क, रोग गठिया आदि अर्थात बिना किसी विशेष कारण के होने वाले रक्त भार को असेन्शियल हाइपरटेन्शन कहा जाता है ।यह 30 से 35 वर्ष की आयु के मध्य में होता है।

प्राथमिक उच्च रक्तचाप

प्राथमिक (आवश्यक) उच्च रक्तचाप, 
उच्च रक्तचाप का सबसे आम रूप है, उच्च रक्तचाप के सभी मामलों में 90-95% यही होता है।
लगभग सभी समकालीन समाजों में, उम्र बढ़ने के साथ रक्तचाप बढ़ता है तथा बाद के जीवन में उच्च रक्तचाप से ग्रस्त होने का खतरा काफी बढ़ जाता है।
 जीन और पर्यावरणीय कारकों के एक जटिल मिलाप से उच्च रक्तचाप होता है। रक्तचाप पर हल्का प्रभाव डालने वाली कई आम जीनों की पहचान की गयी है, साथ ही रक्तचाप पर अधिक प्रभाव डालने वाली कुछ दुर्लभ जीन भी पता चली हैं, लेकिन उच्च रक्तचाप का आनुवंशिक आधार अभी भी बेहद कम समझा गया है।
 कई पर्यावरणीय कारक रक्तचाप को प्रभावित करते हैं। जीवन शैली से संबंधित कुछ कारक हैं जो रक्तचाप कम करते हैं। जिनमें आहार में नमक की मात्रा कम करना, फल और कम वसा वाले उत्पादों को आहार में बढ़ाना (उच्च रक्तचाप को रोकने के लिये आहार संबंधी दृष्टिकोण (DASH आहार) शामिल हैं। 
व्यायाम, वजन घटाना और शराब का कम सेवन भी रक्तचाप कम करने में मदद करते हैं। अन्य कारकों जैसे तनाव, कैफीन की खपत, और विटामिन डी की कमी  की संभावित भूमिका, कम स्पष्ट है। 
इंसुलिन प्रतिरोध, जो मोटापे में आम है और सिंड्रोम एक्स (या उपापचयी सिंड्रोम) का एक घटक है, भी उच्च रक्तचाप के लिए योगदान देने वाला माना जाता है।
 हाल के अध्ययनों से यह भी पता चला है कि प्रारंभिक जीवन की घटनाएं (उदाहरण के लिए, जन्म के समय कम वजन, धूम्रपान करने वाली माँ तथा स्तनपान की कमी) आवश्यक उच्च-रक्तचाप के लिये जोखिम कारक होती हैं। हालांकि, इन जोखिमों को वयस्कों में उच्च रक्तचाप की समस्या से जोड़ने वाले तंत्र अस्पष्ट है।

द्वितीयक उच्च-रक्तचाप

द्वितीयक उच्च रक्तचाप किसी पहचाने जा सकने वाले कारण का परिणाम है। गुर्दे का रोग उच्च रक्तचाप के द्वितीयक कारणों में सबसे आम है।

 उच्च रक्तचाप, अंतःस्रावी स्थितियों जैसे कुशिंग सिन्ड्रोम, हाइपरथायराडिज्म (अतिगलग्रंथिता), हाइपोथायराडिज्म(अल्पगलग्रंथिता), एक्रोमिगेली, कॉन सिन्ड्रोम (अतिकायता) या हाइपरएल्डोस्टरोनिज्म (रक्त में एल्डोस्टरोन हार्मोन की अधिकता) तथा हाइपरपैराथायराइरॉडिज्म (अतिपरजीविता) या फियोक्रोमोसाइटोमा (एपाफ्राइन के अतिस्राव के कारण सतत उच्च रक्तचाप) के कारण भी हो सकता है।
द्वितीयक उच्च रक्तचाप के अन्य कारणों में मोटापा, नींद के समय अल्पश्वसन, गर्भावस्था, महाधमनी का निसंकुचन, अत्यधिक लिकोरिस खपत और कुछ पर्चे वाली दवाएं, हर्बल उपचार और अवैध दवाएं शामिल हैं।