मदनवाड़ा नक्सल हमले की 14वीं बरसी
नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार)
आज मदनवाड़ा नक्सल हमले की 14वीं बरसी है,,,
मदनवाड़ा के उन तमाम शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए,,
हमले के परिपेक्ष्य में कुछ पंक्तियां,मेरी तरफ से..
12 जुलाई 2009 के दिन मतलब आज से ठीक 14 साल पहले छत्तीसगढ़ राज्य के राजनांदगांव जिले में पड़ने वाले मदनवाड़ा नाम के एक गांव के करीब नक्सलियों ने पुलिस बल पर एक बड़ा हमला किया था । इस हमले में राजनांदगांव के तत्कालीन एस पी विनोद चौबे समेत 29 पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे।
सबसे दुखद यह रहा कि 27 जवान अपने शहीद साथियों का शव वापस लाते समय मारे गए थे। नक्सल हमलों के इतिहास में यह पहला मौका था,जब किसी नक्सल हमले में एसपी रैंक के किसी जांबाज असफर की शहादत हुई हो।
पुलिस या सुरक्षा बलों पर कोई भी नक्सल या आतंकी हमला यूं ही नहीं होता। मदनवाड़ा से लेकर पुलवामा तक 22 बड़े नक्सली या आतंकी हमले के पीछे यही दो बड़े कारण आपको देखने को मिलेंगे।।।*
पहला हमले के पीछे किसी विभागीय विभीषण की संदिग्ध भूमिका होती है या उच्चाधिकारियों को प्राप्त गोपनीय सूचनाओं को अनदेखा करने की भूल जरूर होती है।।।
मदनवाडा घटना की जांच रिपोर्ट बताती है कि इस मामले में इन दोनो तरह की गलतियां एक साथ की गई थी।।
जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से निलंबित आईपीएस मुकेश गुप्ता की संदिग्ध भूमिका का उल्लेख किया है।।
जस्टिस शंभुनाथ श्रीवास्तव न्यायिक जांच आयोग
हमले को लेकर में चौकाने वाले तथ्य सामने लाए, उनके अनुसार मदनवाड़ा घटना के समय आईजी जोन की मौजूदगी में भी नक्सलियों ने शहीद एस पी और अन्य पुलिस जवानो के *मृत शरीर से बुलेट प्रूफ जैकेट,हथियार और बाकि चीजें निकाल कर रख ली थीं,,यह कैसे संभव है??* रिपोर्ट के मुताबिक गवाहों ने बताया है कि पुलिस जवानों ने भी नक्सलियों पर गोली चलाई थी,लेकिन उन गोलियों का माओवादियों पर कोई प्रभाव नहीं हुआ।
आयोग ने रिपोर्ट में यह भी कहा है कि इन बयानों के आधार पर यह बात विश्वास करने योग्य नहीं है। बयानों से ऐसा लगता है, उस समय या तो नक्सलियों पर फायर ही नहीं किया था अथवा फिर टारगेट को भटकाया जा रहा था। इस बात में कोई बहादुरी नहीं मानी जा सकती है कि जवान माओवादियों के सामने मूक दर्शक बनकर खड़े थे। अगर पुलिस गोली चलाती ,तो निश्चित ही माओवादी भी घटना में हताहत होते ,क्योंकि यह स्पष्ट है कि इस घटना में कोई नक्सली नहीं मारा गया था,जो घटना का सबसे दुखद पहलू है।
मदनवाड़ा जांच आयोग ने आगे कहा है,अगर हमले के समय पुलिस कमांडर या आईजी जोन साहस दिखाते तो अंजाम कुछ और ही होता। आयोग ने रिकॉर्ड किया है कि उन्हें ऐसा लगता है कि जब एसपी विनोद चौबे को नक्सलियों से मुकाबला करने के लिए आगे कर दिया गया था तो पुलिस बल की तरफ से बैकप सपोर्ट क्यों नही दिया गया??
इस घटना को लेकर साफ़ तौर पर साक्ष्य सामने आया है कि उस समय तत्कालीन आईजी मुकेश गुप्ता अपनी बुलेटप्रूफ कार में बैठे हुए थे। उन्होंने मुकदर्शक बनकर घटना को घटित होते देखा था। शंभुनाथ श्रीवास्तव जांच आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक कि माओवादियों ने मदनवाड़ा हमले का वीडियो भी बनवाया था ,जिसमे में दिखाया गया है कि नक्सली जवानों की हत्या करने के बाद उनका सामान लूटकर,खुलेआम निर्मम उत्सव मना रहे थे । यह वीडियो इतना बताने के लिहाज से काफी था कि आई जी मुकेश गुप्ता की घोर लापरवाही और असावधानी बरती थी।
*ख़ुफ़िया विभाग ने पहले ही दे दी थी सूचना....*
आयोग की जांच में एक बात और पता चली है,कि मोटरसाइकिल से मदनवाड़ा की तरफ जाने वाले पुलिसकर्मी बड़ी आसानी से नक्सलियों की गोलियों का शिकार बन गए थे। नक्सलियों की तरफ से आने वाले इस खतरे की चेतावनी एस पी विनोद चौबे ने पहले ही दे दी थी, लेकिन एम्बुश लगाए जाने की सूचना उन्हें नहीं दी जा सकी थी। चौकाने वाली बात यह भी है कि खुफिया तंत्र ने पहले ही गृह विभाग को मानपुर और मदनवाड़ा इलाके में बड़ी संख्या में नक्सलियों के मौजूदगी की सूचना दी थी। इसकी जानकारी आईजी मुकेश गुप्ता को भी थी। लेकिन उन्होंने इसके लिए कोई योजना नहीं बनाई और शहीद एस पी सहित अन्य पुलिस जवानों को गलत रणनीति के तहत झोंक दिया।।





