नीरीह आदिवासी कैसे बने अपराधी
इतिहास गवाह है, जब भी बाहरी व्यक्ति को तबज्जो दी गई है, वही से सिलसिला शुरू होता है, हमारी, संस्कृति, समाज और परिवार, के बिनाश का।
ओडिशा का सुंदरगढ़ जिला प्रकृतिक संपादाओ से परिपूर्ण है, यह जिला चारो ओर जंगल, पहाड़, नदी, पहाडी झरनो,से घिरा हुआ है।
एक वक्त ऐसा भी था जब इस जिले के निवासी भोलेभाले प्राकृती की उपासना करने वाले थे।
प्रकृती द्वारा प्रदत्त, जल, जंगल से ये अपनी रोज मर्राओ की जरुरतो को पूरा करते थे।
एक ओर जहाँ नदी, तालाबो, पहाडी झरनो से इन्हे मछली, केकड़ा, आदि मिल जाता था, वही दूसरी ओर जंगल से आम, अमरूद, बेर, चिरंजी, हर्रे , बहेडा़, महुआ, नीम, कचनार, सहजन, कटहल, बांस, जलावन व घर निर्माण के लिए लकडियां आदि मिल जाती थी।
फिर इस जिले में आगमन हुआ बाहरी व्यक्तियों का जिनमें कुछ ऐसे लोग थे जिन्होंने अपनी स्वार्थ पुर्ति के लिए जिले के निवासीयो को इनकी जरूरतो को व्यवसाय में बदलना सिखाया।और फिर शुरू हुआ तस्करी का काम।
जिसके कुछ उदाहरण आपके समक्ष रखना चाहुँगा।
1.महुआ शराब - यहाँ के निवासी दिन भर की थकान मिटाने के लिए संध्या के समय महुआ के फूल से निर्मित शराब का सेवन करते थे,इसे स्थानीय लोग स्वंय ही अपने घरो में तैयार करते थे। किसी मेहमान के आगमन पर यह शराब मेहमान नवाजी का भी अभिन्न अंग हुआ करती थी और आज भी यह प्रचलन में है।
बाहरी व्यक्तियो ने यहाँ इस शराब को बहुत सस्ते में पाया और फिर वे लोग अपने फायदे के लिए स्थानीय वासिंदो से लेकर शहरो में ऊँचे दामो में बेचकर पैसा बनाने लगे और धिरे धिरे थकान मिटाने वाली महुआ का पानी व्यवसाय का रूप लेने लगी।
और ग्रामीण बाहरी व्यक्तियों के चंगुल में फंसकर अधिक आमदनी के लालच में अंधाधुंध शराब निर्माण में लग गए और इसतरह महुआ शराब संस्कृति से निकल कर अब व्यवसाय में तबदील हो गया।
2.लकडी़ की तस्करी - अपनी जरुरतो को पूरा करने के लिए जंगलो से लकडीयाँ काटकर लाने वालो ग्रामीणो से वाहरी व्यक्तियो ने पहले जलावन के लिए लकडियां ली, फिर मांग बढने लगी, और जब ग्रामीणो ने देने से मना कर दिया तो इसकी कीमत लगाई गई।
अब कुछ ग्रामीणो में भी धन का लालच दिखने लगा, लकडियां बेचने पर आमादा ग्रामीणो को इस धन के लालच ने ग्राम के बुद्धिजीवीयो के सलाह को दर किनार कर उनका विरोध करने लगे और यही से शुरू हुआ लकडीयो की तस्करी जो जलावन से आरम्भ हुई और इमारती लकडीयो तक जा पहुँची।
और अब धन के लालच में साल, सागवन, नीम, शीशम,आदि जैसे मूल्यवान हरेभरे पेडो़ को काटा जाने लगा,फलस्वरूप जंगल उजडते गए।
जैसे जैसे मांग बढ़ती गई लकडी़ की किमतो में बढोत्तरी होती गई, कभी पूरे पेड़ की किमत दी जाती थी आज वहीं एक एक इंच के हिसाब से बिकती है।
3.जंगली पशु - सुंदरगढ़ जिला से लगे पडोसी राज्य झारखण्ड विशाल सारंडा वन से अण्छादित है। इस वन क्षेत्र में रहनेवाले निवासी अपने मनोरंजन और मांस के लिए जंगली जानवरो का शिकार करते थे।
जब बाहरी लोगो को यह पता चला तो वन के निवासीयो से संपर्क साधार जंगली जानवरो के खाल की मांग करने लगे। वैसे भी जानवरो के मांस को खाने के बाद बची हुई चीजे वनवासीयो के लिए बेकार की वस्तु थी सो उसे दे देते। धीरे धीरे ये वाहरी लोग स्थानीय लोगो से संपर्क बनाकर उनसे हिरण, भालू, जंगली भैसो, बाघ, आदि के खालो के साथ साथ हाथी के दांत की भी मांग करने लगे बदले में इन्हे इनके मुताबिक मेहनाताना दिया जाने लगा और इस तरह स्थानीय वनवासीयो का शौक अपराध में बदल गया।
स्थानीय ग्रामीण / वनवासी कैसे बने अपराधी -
बाहरी लोगो ने अपने स्वार्थपुर्ति और बिना मेहनत अधिक आमदनी करने के इरादे से स्थानीय भोलेभाले नीरीह नौजवानो को अपने जाल में फासना शुरू किया, उनके साथ दोस्ती कर उन्हे शहर बाहर की चमकधमक से रूबरू करवाया ,इस तरह इन भोलमाले नवजवानो के मन में धन का लालच भरा और फिर शुरु हुआ अपनी शौक, परंपरा, जरूरत का व्यौहायी करण का खेल।
हालांकि गाँव के बुज़ुर्ग इन नवजवानो का बिरोध करते थे पर नवजवानो के आगे इनकी एक ना चली और धीरे धीरे समय बितने के साथ साथ ये निरीह अधिवासी कब अपराधी बन गए इन्हे खुद इस बात का जन ना हो पाया।





