दो आदिवासी महिला सरकारी अधिकारियों की मौत और सियासत
डा.हरहर शम्भु चौधरी (मुख्य संपादक)
आदिवासी महिला प्रशासनिक अधिकारी सहायक जिला अधिकारी सुष्मिता मिंज और अतिरिक्त सहायक निरीक्षक एलीसा नार्मी लुगुन की रहस्मय मौत ने राउरकेला वासियों के मन में, खासकर आदिवासी समुदाय में बहुत ज्यादा आक्रोश पैदा करने का काम किया है। दूसरी तरफ परिजन इनकी मौत को हत्या बता रहे है।
मीडिया की सुर्खी बनी ये दोनों मौतो को लेकर मीडिया रोज नये नये तथ्यों को सामने ला रहा है तो दूसरी ओर जिले के राजनैतिक गलियारो में बीजद सरकार घिरती नजर आ रही है। कांग्रेस, जार्ज सेना, भाजपा आदि विपक्षी पार्टियां हो या जिला सरपंच संघ, सभी इन दोनों की मौत के जिम्मेदार लोगों के प्रति कडी कार्यवाही और उच्चस्तरीय जाँच की मांग कर रहे है।
राजनैतिक पार्टियाँ जिस तरह प्रशासन और राज्य सरकार पर प्रश्न खड़े कर रहे है, यह सच में न्याय चाहते है या आनेवाले चुनाव की तैयारी में राजनैतिक रोटियाँ सेकने में लगे है यह तो वक्त ही बताएगा।
सहायक जिला अधिकारी सुस्मिता मिंज के परिजन जिसतरह इसे एक सोची समझी हत्या बता रहे है, और इस मामले में प्रशासनिक अधिकारीयों की चुप्पी कई प्रश्न खड़ी कर रहा है। एक ओर पूर्व बिरमित्रापुर विधायक जर्ज तिर्की ने जिसतरह सहायक जिला अधिकारी की डूबकर मरने की बात पर सवाल उठाया है कि उनके पेट के भीतर पानी का न होना, शव का न फूलना, और मृतक के शरीर में चोट के निशान, हत्या की आशंका को मजबूती प्रदान करता है।
दूसरी ओर भाजपा जिला महिला मोर्चा ने एक पत्रकार सम्मेलन का आयोजन कर इसकी उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
वहीं पुलिस कर्मी एलिसा नार्मी लुगुन की रहस्मय मौत पर नाना प्रकार से अटकले लगाई जा रही है।पर उनकी मौत अब भी रहस्य बना हुआ है।
इन दोनों मौतो पर परिजन के आखों से बहते आँसू तो वास्तविक है पर विपक्षी राजनैतिक गलियारों में परिजनो के प्रति सहानुभूति और प्रशासन, एवं राज्य सरकार के प्रति आक्रोश दिखाई दे रही है। यह देखना दिलचस्प होगा की अगर चुनाव होने तक सच्चाई सामने न आई तो चुनाव के बाद भी उनकी उंगली इसी तरह उठी रहती है या शोभायात्रा, विक्षोभ प्रदर्शन और पत्रकार सम्मेलन का आयोजन कर इसे राजनैतिक रोटियाँ सेकने के लिए चूल्हे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह वाक्या ठीक उसी प्रकार है, जैसे वर्षो पहले राउरकेला में बहु-बेटी दुकान की महिला कर्मचारी खुशबू राउत की मौत पर परिजनो ने हत्या का आरोप लगाय था। प्रथम दृष्टा साक्ष्य और हालात से खुशबू की मौत एक सोची समझी हत्या लग रही थी तो पुलिस प्रशासन के अनुसार यह आत्महत्या थी। खुशबू के परिजन, और कुछ सामाजिक संगठन ने इसकी उच्चस्तरीय जाँच की मांग की थी, यहाँ तक की बड़ी वहन अर्चना राउत अपनी माँ को लेकर न्याय की आस में दिल्ली तक गई। पर राउरकेला के उन कथाकथित समाजसेवको ने भी जो समाज के दुखो का पर्वत अपने सर पर उठाकर लोगों का दुःख हरने का दावा ठीक उसी तरह करते है, जैसे कृष्ण भगवान ने गोकुल वासियों का दुःख हरने के लिए गोवर्धन पर्वत एक उंगली में उठा ली थी। एक समय के बाद खुशबु के परिजनो का साथ छोड़ दिया।
इन दोनों घटनाओं में फर्क इतना है कि खुशबू के लिए कुछ कथाकथित समाज सेवक आगे आए तो सुष्मिता मिंज और एलीस लुगुन के लिए राजनेता। अब देखना यह है कि इंसाफ की लडाई में कौन कितना वफादार है। निर्णय होने तक कौन किस पाले में कितने दमखम से टिका रहता है।
वरना यह मान के चलिए की कथा कथित समाजसेवक खर्चा मिलने तक और राजनेता चुनाव होनेतक ही आपके साथ है। ठीक वैसे जैसे स्वास्थ्य मंत्री नवोदास की मौतपर सियासत बहुत गर्म हुई और वक्त के साथ धीरे धीरे सभी ने इस हादसे को एक सपना की तरह भुला दिया। कहीं ऐसा ना हो कि दोनों सरकारी महिला अधिकारियों की मौत के रहस्यमय से कभी पर्दा ही ना उठ पाए इसलिए इन सभी मौतो का उच्चस्तरीय जाँच की मांग जायज है। वरना ये मौते एक रहस्य बन कर ही रह जाएगी।





