जन सुनवाई पोर्टल और फर्जी निस्तारण: न्याय की आस में दम तोड़ती जनता
डिजिटल भारत के इस दौर में सरकार और जनता के बीच की दूरी को पाटने के लिए जन सुनवाई पोर्टल (या समाधान पोर्टल) जैसी व्यवस्थाएं वरदान साबित होनी चाहिए थीं। उम्मीद थी कि एक क्लिक पर आम आदमी की शिकायत सीधे संबंधित अधिकारी तक पहुंचेगी और त्वरित न्याय मिलेगा। लेकिन विडंबना यह है कि यह पोर्टल आज कई जगहों पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही का एक नया अखाड़ा बन चुका है। धरातल पर समस्या का समाधान किए बिना ही 'फर्जी रिपोर्ट' लगाकर शिकायतों का मनगढ़ंत निस्तारण कर देना एक आम प्रवृत्ति बन गई है, जो लोकतंत्र की मूल भावना पर सीधा प्रहार है।
कागजी घोड़ों की दौड़ और जमीनी हकीकत
जब कोई पीड़ित नागरिक अपनी गाढ़ी कमाई का हिस्सा बचाकर या तमाम दुश्वारियां झेलकर अपनी फरियाद पोर्टल पर दर्ज कराता है, तो वह व्यवस्था से आखिरी उम्मीद लगाए बैठा होता है। इसके विपरीत, कई मामलों में निचले स्तर के अधिकारी और कर्मचारी जनता की समस्याओं को सुनने के बजाय फाइलों में जादूगरी दिखाने में जुट जाते हैं।
बिना मौके पर जाए, बिना किसी जांच-पड़ताल के, और अक्सर तो बिना शिकायतकर्ता से संपर्क किए ही पोर्टल पर रटी-रटाई भाषा में लिख दिया जाता है— "शिकायत का निस्तारण कर दिया गया है" या "मामला संज्ञान में नहीं है/आरोप निराधार हैं।" या एक मनगढंत फर्जी रिपोर्ट लगाकर फाईल बंद कर दी जाती है। यह कागजी औपचारिकता न केवल शासन की मंशा को पलीता लगाती है, बल्कि पीड़ित को मानसिक रूप से और अधिक प्रताड़ित करती है।
खोता विश्वास और प्रशासनिक संवेदनहीनता
इस तरह के फर्जी निस्तारण से सबसे बड़ा आघात आम नागरिक के उस विश्वास पर लगता है जो वह लोकतांत्रिक संस्थाओं और शासन तंत्र पर रखता है। जब एक बार, दो बार या बार-बार शिकायत करने के बावजूद पोर्टल पर फर्जी क्लोजर रिपोर्ट लगा दी जाती है, तो नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। यह प्रवृत्ति इस बात का प्रतीक है कि कुछ प्रशासनिक तंत्रों में उत्तरदायित्व (Accountability) और संवेदनहीनता का भारी संकट है। कर्मचारियों के लिए यह महज एक 'टारगेट' पूरा करने या पोर्टल के आंकड़ों को दुरुस्त दिखाने का माध्यम भर बनकर रह गया है, जबकि एक आम इंसान के लिए वह उसकी रोजी-रोटी, जमीन, सुरक्षा या बुनियादी हक का सवाल होता है।
सुधार की सख्त दरकार
इस नासूर को रोकने के लिए अब केवल ऑनलाइन व्यवस्था पर भरोसा करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि इसके क्रियान्वयन में कड़े सुधारों की जरूरत है:
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सख्त जवाबदेही तय हो: जिन मामलों में फर्जी निस्तारण या गलत रिपोर्ट की पुष्टि हो, वहां संबंधित अधिकारी और जांचकर्ता पर अनुशासनात्मक कार्रवाई और जुर्माने का प्रावधान होना चाहिए।
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फीडबैक और क्रॉस-वेरिफ़िकेशन: शिकायत बंद करने से पहले शिकायतकर्ता की संतुष्टि अनिवार्य की जानी चाहिए। यदि नागरिक संतुष्ट नहीं है, तो मामला स्वतः उच्चाधिकारी के संज्ञान में जाना चाहिए।
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थर्ड-पार्टी ऑडिट: समय-समय पर जन सुनवाई पोर्टल की शिकायतों और उनके निस्तारण की जमीनी स्तर पर स्वतंत्र जांच (थर्ड-पार्टी ऑडिट) कराई जानी चाहिए।
जन सुनवाई पोर्टल केवल एक तकनीकी सॉफ्टवेयर नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र में जनता के विश्वास का थर्मामीटर है। यदि शिकायतों के फर्जी निस्तारण की इस बीमारी का समय रहते इलाज नहीं किया गया, तो यह डिजिटल व्यवस्था जनता के लिए समाधान कम और उत्पीड़न का जरिया अधिक बन जाएगी। शासन और प्रशासन को यह समझना होगा कि आंकड़ों की बाजीगरी से फाइलों को तो साफ किया जा सकता है, लेकिन जनता के दिलों में उपजे असंतोष को दबाया नहीं जा सकता।